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मतांतर : संस्कृति के स्वयंभू सिपाही

प्रताप दीक्षित तरुण विजय की टिप्पणी ‘जनधन, जनमन’ (29 मार्च) में भारत को आस्था का प्रथम बिंदु कहने पर प्रत्यक्ष रूप से किसी को असहमति नहीं होनी चाहिए। पर यह प्रश्न जरूर उठता है कि किसका भारत? निश्चित रूप से वह भारत, जिसमें सभी जाति, धर्म, संप्रदाय के लोगों को समानता और सम्मान के साथ […]

Author April 5, 2015 11:00 PM

प्रताप दीक्षित

तरुण विजय की टिप्पणी ‘जनधन, जनमन’ (29 मार्च) में भारत को आस्था का प्रथम बिंदु कहने पर प्रत्यक्ष रूप से किसी को असहमति नहीं होनी चाहिए। पर यह प्रश्न जरूर उठता है कि किसका भारत? निश्चित रूप से वह भारत, जिसमें सभी जाति, धर्म, संप्रदाय के लोगों को समानता और सम्मान के साथ भय-रहित रहने का अधिकार है!

देश का अर्थ इसकी भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं होता। देश में भिन्न-भिन्न संस्कृतियों को मानने वाले अपने-अपने धर्मों, विश्वासों और संस्कृति पर आस्था के साथ स्वतंत्रता पूर्वक रहते हुए इसका अनिवार्य हिस्सा होते हैं। पर जब यह स्वाधीनता बाधित या नियंत्रित होती है तो देश का अर्थ उनके लिए बदल जाता है। आजादी के पहले शासकों और शासितों के लिए देश का मतलब अलग-अलग था। पिछले दिनों हिंदू राष्ट्रवादी तत्त्वों ने राजनीतिक क्षेत्र में विजय-दुंदुभी के तुमुल-घोष के बाद गैर-राजनीतिक क्षेत्रों में वर्चस्व स्थापित करने के लिए अपनी रणनीति का विस्तार किया है। इसके तहत समाज में व्यापक अविश्वास, संशय, संकट की तरफ से ध्यान हटाने के साथ अन्य धर्मावलंबियों के अंदर पनप रही असहमति को भी दबाने के प्रयास तेज हुए हैं।

इतिहास और मिथक, संस्कृति और धर्म, राष्ट्र और सत्ता को जब एक-दूसरे का पर्याय मान लिया जाता है तब ‘यह बात अपराक्रम्य है’, कथन का निहितार्थ एक पुनरुत्थानवादी उपक्रम और उन वक्तव्यों का गैर-राजनीतिक रूपांतरण ही प्रतीत होता है। इसके अंतर्गत हिंदू राष्ट्र की अवधारणा के पक्ष में- जिसमें प्रत्येक भारतवासी के डीएनए टेस्ट कराने, उन्हें पांच बच्चे पैदा करने, गोडसे के महिमा मंडन से लेकर उसके मंदिर बनाने की घोषणा की जाती है।

लेख में उठाए गए मुद्दे न केवल एकांगी, बल्कि विरोधाभासी भी हैं। निश्चित रूप से ‘हम गरीब हमेशा से नहीं थे’, पर यह अकूत धन राजमहलों, मंदिरों, सौदागरों की हवेलियों में कैद था, जिसे ‘लूटने के लिए’ आक्रमण किए गए। आम आदमी तो रोजी-रोटी की फिक्र में तब भी रहा होगा। हालांकि अपने स्वामियों और उन मंदिरों की रक्षा के लिए सैनिकों के साथ प्राणों का उत्सर्ग उसे भी करना पड़ा होगा, जिनमें उसे प्रवेश की अनुमति नहीं थी।

इतिहास और मिथक में अंतर होता है। महत्त्वपूर्ण होता है यह जानना कि इतिहास का स्रोत क्या अप्रासंगिक हो गया, इतिहास मनुष्य की स्वतंत्रता के वर्तमान यथार्थ से सामंजस्य नहीं स्थापित करता, मनुष्यता की प्रगति में बाधक बनता है, ऐसी स्थिति में उसकी स्वीकार्यता संदिग्ध ही होती है। जब इतिहास को तोड़-मरोड़ कर प्रायोजित तरीके से अपने पक्ष में प्रस्तुत किया जाता है, तब स्थिति और विषम हो जाती है। क्या विलियम बैंटिक, कर्नल स्लीमैन, राजा राममोहन राय का योगदान भुलाया जा सकता है, जिन्होंने सती प्रथा, नर-बलि के खिलाफ आवाज उठाई, कानून बनवाया, ठगों के संजाल को ध्वस्त किया।

रही बात धर्मांतरण की तो धर्मांतरित लोगों में बहुसंख्य हमारे समाज के दलित, उत्पीड़ित, शोषित, हाशिये के लोग ही क्यों होते हैं? सम्मान तो दूर, उन्हें मनुष्य की तरह जीने का अधिकार भी नहीं है। गांव के बाहर गंदी बस्तियों में रहने, सिर पर मैला ढोने, बेगार करने, दलित स्त्रियों से बलात्कार, प्रतिवाद करने पर नग्न करके उन्हें घुमाने, सिर मुंड़ा देने जैसी अनेक यातनाओं से अगर किसी इतर धर्म में राहत की आश्वस्ति मिलती है, तो यह उनका अपना निर्णय और प्रजातंत्र में अर्जित आजादी के तहत अधिकार है। धर्मपरिवर्तन पर हाय-तौबा मचाने से अधिक जरूरी है कि जिस वर्ग को हिंदू धर्म में अस्पृश्य मान लिया गया, उन्हें किंचित सम्मान, सुविधाएं और बराबरी के अधिकार देने का अहसास मुहैया करा सकें।

बात केवल जूलियो रिबेरो की नहीं है। ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त लेखक अनंतमूर्ति की देश छोड़ने की घोषणा, एके रामानुजन की पुस्तक को विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम से निकलवाने, लेखक पेरूमल मुरुगन का विरोध और उनके अपने उपन्यास ‘मथारूभगन’ को वापस लेने और भविष्य में लेखन से विरत रहने की घोषणा, चित्रकार हुसेन के निर्वासन, वेलेंटाइन-डे पर जोड़ों के प्रति गुंडागर्दी, खाप पंचायतों और सती प्रथा के समर्थन, ड्रेस कोड और स्त्रियों की स्वतंत्रता के विरोध में वक्तव्य, अन्य धर्मावलंबियों के उपासना स्थलों पर हमले आदि के पीछे ‘एकाध, सिरफिरे, अधपढ़े’ नहीं, बल्कि ‘अपने धर्म’ की श्रेष्ठता के दंभ में विधर्मियों को सबक सिखाने के छिपे एजेंडे के तहत संस्कृति को धर्म में बदलने की सुनियोजित कार्रवाई का एक अनिवार्य हिस्सा ही है, जिसके सूत्रधार सत्ता प्रतिष्ठानों से लेकर अकादमियों, मीडिया तक घुसपैठ बना चुके हैं।

जब भी चर्चों पर हमले, बाबरी ध्वंस, गुजरात के कत्लेआम की बात की जाती है, कश्मीर मुद्दे को बचाव में पेश कर दिया जाता है। जबकि दोनों समस्याएं अलग हैं। कश्मीर की समस्या राजनीतिक है, जो देश के बंटवारे से जुड़ी हुई है। वहां के उत्पीड़ितों में केवल पंडित नहीं, वे मुसलिम भी हैं, जो अलगाववादियों से सहमत नहीं हैं। जबकि ये हमले अपने धर्म को महान मान कर, विधर्मियों को सबक सिखाने, नियंत्रित करने, हिंदू राष्ट्र की स्थापना के पूर्वाभास के तहत किए जाते हैं।

पूरनचंद्र जोशी के अनुसार मनुष्य जाति की समस्त सामाजिक विरासत या संचित सृष्टि का ही नाम संस्कृति है। इस प्रकार संस्कृति में मूल्य, मान्यता चेतना, विश्वास, विचार, भावना, रिवाज, भाषा, ज्ञान, कर्म सभी अमूर्त रूप में और भोजन, आवास, पहनावा आदि भौतिक मूर्त वस्तुएं शामिल होती हैं। सांस्कृतिक दृष्टि से उन्नत समाज में समानता, शिक्षा, चेतना का विकास, स्वतंत्रता, स्त्री का सम्मान और उसके स्व-निर्णय की आजादी, अपने धर्म के पालन और उसके चुनने की आजादी पाई जाती है। यह तभी संभव होता है जब एक ऐसी संवेदनशील, उदार, सहिष्णु सभ्यता का विकास हो, जिसमें विभिन्न विचारधाराओं, धर्मों, जीवन-पद्धतियों को एक साथ पनपने का अवसर मिले, साथ ही असहमति और देश-काल के अनुसार इनकी समीक्षा का भी।

संस्कृति के स्वयंभू प्रवक्ताओं द्वारा जब अतीत के यशोगान के साथ भारतीय संस्कृति की बात की जाती है तब उसका अर्थ हिंदू धर्म होता है, जिसका मूल आधार वर्ण व्यवस्था है। धर्म की अवधारणाएं युगों से उसके दिमाग में ठूंस दी गई हैं। हिंदू धर्म के जिन शाश्वत मूल्यों- उदात्तता की बात की जाती है, उनका वास्तविक स्वरूप वे सामंती मूल्य हैं, जिनके पीछे बेबस चीखें, कराहें, शोषण और मनुष्य की अमानवीय स्थिति में रहने की विवशताएं हैं। बहुलतावादी कहा जाने वाला हिंदू धर्म जब अपने ही लोगों के प्रति असहिष्णु, अमानवीय और नृशंस है, ऐसी स्थिति में म्लेच्छों और विधर्मियों को कैसे सहन किया जा सकता था।

संस्कृति के अलंबरदार सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक बहुलता, अतीत के गौरव के नाम पर राष्ट्र की परिकल्पना को राज्य पर वर्चस्व कायम कर लागू करने के प्रयास करते हैं। आज का सबसे बड़ा सत्य यह है कि यह अर्द्धसत्यों का युग है। लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में भी यह कट््टरवादी शक्तियां अतीत के अंधेरे खंडहरों से आधे-अधूरे सत्यों द्वारा भावनाओं के दोहन, भय के संचार-प्रचार, उन्माद पैदा करके सत्ता पर काबिज हो जाते हैं। फासिज्म संस्कृति के कंधों का सहारा लेकर ही लोगों के बीच आता है।

समाज के भविष्य को लेकर चिंता हमें मानवीय बनाती है। इसके मूल में सामाजिक परिवर्तन की आकांक्षा है। इसके लिए ‘राष्ट्र’ से ज्यादा जरूरी गरीबी, विषमता, जातिवाद, सांप्रदायिकता, अशिक्षा, स्त्रियों को हीन मानने की मानसिकता जैसी समस्याओं का समाधान है। इतिहास के इस मोड़ पर चुप्पी और उदासीनता एक गहरे अंधकार भरे भविष्य की ओर ही ले जाएगी।

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