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कभी-कभार : वर्षारंभ पर

अशोक वाजपेयी जाहिर है कि ये बातें हाशिये से कही जा रही हैं: लगभग हमेशा की तरह साहित्य और कलाएं हाशिये पर हैं। केंद्र पर, या कहें कि लगातार खिसकते केंद्र पर हाशिये से कही बातों का असर होना कब का बंद हो चुका। फिर भी अगर कहने का मन होता है और विवक्षा शिथिल […]

Author January 4, 2015 11:20 PM

अशोक वाजपेयी

जाहिर है कि ये बातें हाशिये से कही जा रही हैं: लगभग हमेशा की तरह साहित्य और कलाएं हाशिये पर हैं। केंद्र पर, या कहें कि लगातार खिसकते केंद्र पर हाशिये से कही बातों का असर होना कब का बंद हो चुका। फिर भी अगर कहने का मन होता है और विवक्षा शिथिल नहीं हुई है तो इसका कारण यही हो सकता है कि हमें अपना सच हर समय किसी न किसी तरह कहना चाहिए और यह खरा संदेह भी बराबर करते रहना चाहिए कि वह सच है भी कि नहीं। यों आजकल सच है क्या? अगर खबरों को सच्चाई का विश्वसनीय इजहार मानें तो इन दिनों ‘लव-जिहाद’, ‘घरवापसी’, ‘गोडसे का मूर्तिस्थापन’, ‘चर्च विध्वंस’, तरह-तरह के धार्मिक नेताओं के भड़काऊ वक्तव्य आदि हमारी यकायक सक्रिय और शोर मचाती सच्चाई हैं। हम इन दिनों स्वच्छता अभियान में लगे हैं, जिसकी सच्चाई यह है कि भौतिक स्तर पर साफ-सुथरे दिखो, लेकिन धार्मिक-सांप्रदायिक स्तरों पर जितनी गंदगी जितनी जल्दी और फुर्ती से फैला सकते हो फैलाओ! आखिर असी घाट से उठाई गई गंदगी कहीं तो रखनी होगी। समरसता डगमगा-सी रही है, एकात्मता का आतंक बढ़ रहा है। अच्छे दिन आ गए हैं।

मुश्किल यह है कि साहित्य और कलाएं, शायद दुर्भाग्य से, अच्छे दिनों में बुरी खबर ही देते हैं। बुरी खबर यह है कि कितना ही सत्ता, धन-दौलत, बाहुबल आदि का प्रयोग किया जाए, हमारी सदियों से विकसित और फलती-फूलती रही बहुलता, समरसता की सच्चाई और समता-न्याय-स्वतंत्रता की हमारी आकांक्षाओं को किसी एकतान एकात्मकता से दबाया, नष्ट या ध्वस्त नहीं किया जा सकता। आप भले दस सालों का खेल खेल रहे हैं, हम यह बताने को विवश हैं कि बहुलता का खेल सदियों पुराना है और हम अब भी उसे खेलेंगे। यह बहुलता अनेक बार क्षत-विक्षत, थोड़े अरसे के लिए अवरुद्ध हुई है, पर वह निरंतर सक्रिय, सजग और सशक्त, कभी-कभार अंत:सलिल रही है। वह हमारी कालजयी पहचान है और उसे कोई भी राजनीति और सत्ता मिटा या ज्यादा देर के लिए बिगाड़ नहीं सकती।

हम एकवचन कभी नहीं रहे हैं- न धर्म में, न भाषा में, न देवता में, न विचार और दर्शन में, न भोजन और पहरावे में, न रीति-रिवाज में। हम इन सबमें बहुवचन हैं: हम एकवचन को बहुवचन के परिसर में जगह देते हैं, पर बहुवचन को आक्रांत किए बिना। इस सच को हमारे समय की सच्चाई के बरक्स बचाए रखना, उस पर इसरार करना इस समय साहित्य और कलाओं का असली धर्म है। यह मानने का कोई कारण नहीं है कि इस धर्म से हमें कोई विरत कर पाएगा, प्रलोभन भले बहुत हों! यही बहुलता साहित्य और कलाओं का स्थायी घर है- हमें किसी घर वापस नहीं जाना है, इसी घर में बने-जमे रहना है और उसकी खिड़कियां और दरवाजे खुले रखना है। उन सबके लिए इसी घर में कुछ गुड़-पानी हमेशा होगा जो लंबी यात्रा या कड़े संघर्ष से थके-हारे आएंगे और जिनके लिए यह घर हमेशा भरोसेमंद शरण्य रहेगा। हमने सदियों से यह घर बनाया है और हम सदियों तक उसकी पहरेदारी भी करते रहेंगे।
सामाजिक मान्यता और सत्ता-विभूषण

लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता जब-तब या नियमित रूप से हर क्षेत्र के मूर्धन्यों को अलंकृत और विभूषित करे इसकी भारत में ही नहीं, अनेक देशों में सुप्रतिष्ठित परंपरा है। चयन को लेकर हमेशा विवाद होते हैं, जो कि लोकतंत्र का ही एक तरह का इजहार हैं। कई बार विवाद किसी चयन को अधिक ध्यानाकर्षक बना देता है, जबकि विवाद न होता तो उस पर ध्यान न जाता। ऐसे अलंकरण आमतौर पर व्यापक सामाजिक मान्यता की अभिव्यक्ति भी होते हैं, हालांकि कभी-कभी ऐसे चयन होते रहते हैं, जिन्हें इस तरह की मान्यता से पुष्ट नहीं कहा जा सकता।

सत्ता और उसके अधिकरणों से अलग समाज स्वयं अपने मूर्धन्यों को पहचानने का उपक्रम करता रहता है। उसकी कोई बंधी-बंधाई प्रक्रिया नहीं है। शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में किसी संगीतकार को उस्ताद या पंडित कहने की प्रथा है। कोई औपचारिक संगठन या अधिकरण नहीं है, जो यह तय करता कि कब कोई संगीतकार उस्ताद या पंडित कहने योग्य हो गया। यह ‘पीयर्स ग्रुप’ द्वारा दी गई मान्यता है। कहते हैं कि अमीर खां बरसों तक सार्वजनिक मंच से अनुपस्थित रह कर अपनी साधना में लगे रहे और जब उन्होंने पहली बार गाया तो उसका ऐसा व्यापक प्रभाव पड़ा कि सभी ने उन्हें उस्ताद मान लिया। भोपाल में बरसों पहले हमने वहां के सारंगी-वादक अब्दुल लतीफ खां की सलाह से एक सारंगी मेला आयोजित किया था: उसमें उनके सारंगी-वादन की इतनी व्यापक प्रशंसा हुई कि हमने बिना किसी संकोच के उनके नाम के आगे उस्ताद शब्द का प्रयोग करना शुरू किया और वह आगे जाकर सर्वमान्य हो गया।

स्वतंत्रता से पहले ब्रिटिश राज कुछ लोगों को ‘सर’ या ‘राय बहादुर’ आदि के खिताब देता था। इससे मिलने वालों का रौब और रुतबा कुछ बढ़ भी जाता था। पर उसी के समांतर स्वयं व्यापक भारतीय समाज ने मोहनदास करमचंद गांधी को महात्मा गांधी, रवींद्रनाथ ठाकुर को गुरुदेव, मदनमोहन मालवीय को महामना, मैथिलीशरण गुप्त को राष्ट्रकवि कहना शुरू किया। वह इन लोगों के नाम से लगभग२ अविच्छिन्न रूप से जुड़ गया। जवाहरलाल नेहरू को पंडित, वल्लभभाई पटेल को सरदार, जयप्रकाश नारायण को लोकनायक, विनोबा भावे को संत आदि समाज ने ही कहना शुरू किया। किसी भी सत्ता द्वारा दिए गए अलंकरण आदि को ऐसी लोकप्रियता न तब मिली और न अब स्वतंत्र भारत में मिल पाई है। अटल बिहारी वाजपेयी और मदनमोहन मालवीय को भारत रत्न से विभूषित करना सर्वथा उचित है, अतिविलंबित है पर समाज में कोई उन्हें इस विभूषण के साथ शायद ही याद करे। शास्त्रीय संगीत आदि क्षेत्रों में अनेक को पद्म अलंकरण मिले हैं और उनके प्रति उनका आकर्षण थोड़ा विचित्र है। लेकिन अंतत: संगीत-समाज में अधिक मान्यता पंडित या उस्ताद कहलाने की है, इन अलंकरणों की नहीं। जाहिर है कि सत्ता से अधिक समाज से मिली मान्यता ही अधिक टिकाऊ और लोकप्रिय तथा लोकमान्य होती है। जो लोग सत्ता के अलंकरणों को पाने के लिए बहुत नीचे जाकर भी कोशिश करते रहते हैं, उन्हें इस सच्चाई पर सोचना चाहिए।
प्रसाद के एक सौ पचीस वर्ष

इस वर्ष जनवरी के अंत में हिंदी के महाकवि जयशंकर प्रसाद के जन्म को एक सौ पचीस वर्ष होना शुरू होगा। इधर बनारस पर हमारे मीडिया, राजनीति, बुद्धिजीवियों, शिक्षाशास्त्रियों आदि का बहुत ध्यान जा रहा है। पर उसी बनारस में रहे इस कवि की किसी ने याद की हो, ऐसा प्रतीत नहीं होता। कुछ बरस पहले प्रसाद के मित्र और सहचर रहे प्रेमचंद के एक सौ पचीस वर्ष बहुत व्यापक ढंग से मनाए गए थे। प्रसाद हिंदी के श्रेष्ठ कवि, उसके कालजयी महाकाव्य ‘कामायनी’ के रचयिता, श्रेष्ठ कथाकार, श्रेष्ठ नाटककार, गंभीर चिंतक और सभ्यता-समीक्षक हैं: उन्हें भुला देना अपनी जातीय परंपरा के साथ लगभग विश्वासघात करना होगा। इधर अपनी परंपरा की दुर्व्याख्या और दुर्विनियोजन होते देख-जान कर हमारी प्रतिरोध की प्रतिभा और क्षमता कुछ कुंद हो गई लगती है। प्रसाद के ही शब्दों में, ऐसे कठिन समय में हम ‘विकल बिखरे हैं हो निरुपाय’।

प्रसाद में, प्रेमचंद के बरक्स, पूर्व-पश्चिम के द्वंद्व और भेद की चेतना अधिक गहरी और प्रखर थी। भारतीय इतिहास और संस्कृति का उनका अध्ययन भी अधिक विशद और संपुष्ट था। उनमें भारतीय प्रज्ञा का वैभव, लालित्य और सूक्ष्म जटिलता लगभग मूर्तिमान थे। आज जब हमारी परंपरा की अनेक अंधेरी शक्तियां अनेक स्तरों पर मनमानी और संकीर्ण व्याख्या बहुत उत्साह और हेकड़ी के साथ कर रही हैं तब प्रसाद एक गंभीर और सुचिंतित प्रतिरोध बन कर उभर सकते हैं। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि बनारस अगर उत्सवधर्मी नगरी है तो वह बौद्धिक और वैचारिक प्रतिरोध का केंद्र भी रहा है। जुलूसों और जलसों में हमें उसकी प्रतिरोध की शक्ति को भूल नहीं जाना चाहिए। हारी सही, पर होड़ प्रसाद ने वहीं से लगाई थी। हम यह भी याद रखें कि हमारे समय के दो मूर्धन्यों अज्ञेय और मुक्तिबोध ने जिस एक छायावादी कवि को अपनी आकांक्षा और संवाद का केंद्र बनाया था वे प्रसाद ही थे।

मुक्तिबोध ने तो एक पूरी पुस्तक ही लिखी ‘कामायनी: एक पुनर्विचार’। अज्ञेय अपने पहले कविता संग्रह की भूमिका प्रसाद से लिखवाना चाहते थे। प्रसाद ने ‘चेतना का उज्ज्वल वरदान’ का उल्लेख किया है- दरअसल हिंदी में ऐसा उज्ज्वल वरदान वे स्वयं थे। वे ‘बुद्धि के वैभव’ में रहने वाले लेखक थे और हालांकि उनके यहां भावोच्छवास का अभाव नहीं है, उनका साहित्य गहरी बौद्धिकता में रसा-पगा है। इन दिनों तरह-तरह के भावोच्छवास बनारस को स्वच्छ करने में लगे हैं। ऐसे में वहीं नहीं, अन्यत्र भी इस पर आग्रह करना जरूरी है कि हम बुद्धि का विसर्जन नहीं कर सकते। उसे सामने लाते ही प्रतिरोध अनिवार्य लगने लगता है। मानो प्रसाद की दीप्ति और कांति नए दीपक जलाने का उत्साह हमें दे सकती है। जाहिर है कि परिस्थिति जटिल है और सारी चकाचौंध के बावजूद अंधेरे बढ़ और गाढ़े हो रहे हैं। उसमें कुछ लौ जगा सकने के लिए, कुछ रौशनी लाने के लिए हमें बुद्धि और विचार का बल, उद्देश्य की स्पष्टता और ईमानदारी, परंपरा का संबल सब कुछ चाहिए। प्रसाद इस समय काल के पार दमकती दीपशिखा हैं, जिनसे कुछ आलोक हम उधार ले सकते हैं!

 

 

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