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शिक्षा : जड़ता के परिसर

रमेश दवे राजनीतिक दल सत्ताधारी होते ही अधिकार प्रमत्त हो जाते हैं। शिक्षा में, जो संस्कार और विचार की प्रतीक है, अहंकार की गंध आने लगती है। राजनीति विचारधारा से संचालित होती है, जबकि शिक्षा जीवन से, नीति, विचार, शोध और विनम्रता से संचालित होती है। सत्ता बदलते ही नीति, पाठ्यक्रम, प्रणाली या संस्थाओं के […]
Author March 29, 2015 07:47 am

रमेश दवे

राजनीतिक दल सत्ताधारी होते ही अधिकार प्रमत्त हो जाते हैं। शिक्षा में, जो संस्कार और विचार की प्रतीक है, अहंकार की गंध आने लगती है। राजनीति विचारधारा से संचालित होती है, जबकि शिक्षा जीवन से, नीति, विचार, शोध और विनम्रता से संचालित होती है। सत्ता बदलते ही नीति, पाठ्यक्रम, प्रणाली या संस्थाओं के नाम बदलने की जो राजनीतिक कवायद होती है, उससे किसी भी राष्ट्र के शैक्षिक और शिक्षित चरित्र का निर्माण नहीं होता। उच्च शिक्षा में होने वाले हस्तक्षेप नवीनतम विचार और संस्कार के लोकधर्मी कम, पदों के हस्तक्षेप अधिक हैं। इसलिए शिक्षा देश भर में वैचारिक जड़ता या क्षुद्र राजनीतिक अराजकता बनती जा रही है।

देश में राष्ट्रीय स्तर पर स्कूली शिक्षा, उच्च शिक्षा और अध्यापक शिक्षा की अलग-अलग संस्थाएं हैं। ये स्वायत्त कम, सत्ताजीवी अधिक हैं। नीतियों का पालन बुरा नहीं, लेकिन उन पर जब राजनेताओं के आदेश-निर्देश और विचार लादे जाते हैं, तो वे आत्महत्या करने लगती हैं। आज तक शिक्षा को लेकर कोई सर्वमान्य लोकोन्मुखी और जनसशक्तीकरण का ऐसा पाठ्यक्रम नहीं बना, जिसमें राष्ट्र की आकांक्षाएं झलकती हों। कोठारी आयोग ने जरूर शिक्षा के सशक्त स्वरूप की चर्चा की थी। कोठारी आयोग ने कॉमन स्कूल और पड़ोसी स्कूल का विचार दिया था। शिक्षा नीति में पेस कीपर स्कूल और एक्सीलेंस की नीति दी गई, लेकिन विडंबना यह है कि कागज पर कागज 1947-48 से आज तक पैदा होते रहे, लेकिन देश उतना भी नहीं बदला, जितना कागज पर लिखा था। कागजों से शिक्षा बदलती, उत्कृष्ट हो जाती तो अब तक पूरा देश पढ़-लिख कर विकसित, चेतनाशील और कर्तव्यनिष्ठ हो जाता। आज स्कूलों की हालत यह है कि वहां कई तरह की गंदगियां व्याप्त हैं। इन्हें साफ करने के लिए केवल जमीन झाड़ने की नहीं, दिमाग झाड़ने वाली झाड़ू भी चाहिए। शिक्षा परिसर को स्वच्छ बनाने के लिए दिमाग का परिसर स्वच्छ बनाना जरूरी है।

जॉर्ज डेनीसन ने अपनी पुस्तक ‘बच्चों का जीवन’ में कहा है कि अधिकतर शिक्षक बच्चों को कहां पढ़ाते हैं, वे तो पाठों और पाठ्यक्रमों को पढ़ाते हैं। बच्चों को पढ़ाने वाले शिक्षक थे किसी जमाने में, जब हम जैसे लोग सरकारी स्कूलों में पढ़ते थे। उस समय हिंदी, संस्कृत, उर्दू का या अंगरेजी माध्यम का कोई विवाद ही नहीं था। न कोई विवाद था, न शिक्षा के हिंदूकरण या मदरसाकरण का जलजला। अब प्रश्न है कि पहले का स्कूल धर्मनिरपेक्ष या सर्वधर्म समभाव वाला था या अब है, जब कहा जा रहा है शिक्षा का तालिबानीकरण, भगवाकरण, कांग्रेसीकरण, समाजवादीकरण आदि हो गया है।

सरकार बदलते ही पहला हमला इतिहास और भाषा पर होता है। गणित, ज्यामिति और विज्ञान पर हमले कम होते हैं, मगर अब हर विषय का इतिहास भारतीय बता कर संस्कृति-गान किया जा रहा है। इतिहास तो सत्य का दस्तावेज है, विचारधारा का नहीं। जो इतिहास स्कूल और उच्चशिक्षा में पढ़ाया जाता है, वह न हिंदू का हो, न मुसलमान, सिख, ईसाई या अन्य धर्मों का। इतिहास निजी आस्थाओं और कट््टरताओं का प्रतीक नहीं होता, और स्मृति में जो श्रेष्ठतम, मानवीय, संवेदनशील और प्रेरक है वह पढ़ाया जाए न कि आर्य कब, कहां से आए, क्यों आए या वे कहीं से नहीं आए के नाम पर विवाद। क्यों न शांति, प्रेम, अहिंसा, श्रम, सत्य और मनुष्यता का इतिहास पढ़ाया जाए? प्रतिशोध, प्रतिहिंसा, युद्ध और आतंक, मांसाहार-शाकाहार आदि का इतिहास पढ़ा कर या साम्यवादी, समाजवादी, हिंदुत्ववादी, धर्मवादी इतिहास पढ़ा कर क्या हम अपनी भविष्य की पीढ़ी को संकीर्णता की अंधेरी सुरंग में नहीं धकेल रहे हैं?

जहां तक भाषा का प्रश्न है, वह भी विज्ञान है, जिसका कोई धर्म या पंथ नहीं होता। जब हम शब्द और भाषा में राजनीति या अपनी संकीर्णता के अर्थ भरने लगते हैं, तो उत्कृष्ट साहित्य और विचार का सृजन बाधित होता है। भाषा इतनी विराट और उदात्त है कि उसमें जो रचा जाए, उसे वह स्वीकार कर लेती है। इसलिए भाषा की इस उदारता को संवेदना के स्तर पर बरतना होगा, यह बहुत नाजुक चीज है। इसमें गाली भी है और प्रार्थना भी, विवेक भी है विचार भी, आजादी भी और आत्मानुशासन भी। इसलिए भाषा की पुस्तक किसी भी प्रकार की राष्ट्रीयता, क्षेत्रीयता, आस्थाबद्ध जड़ता से परिचालित होकर नहीं लिखी जानी चाहिए।

विद्यालयों से विश्वविद्यालयों तक शिक्षा भी एक निरंतर धारा है। यह कैसे कहा जा सकता है कि ज्यामिति, गणित, पायथागोरस की प्रमेय, भूगोल, भौतिकी आदि विषय अगर दुनिया में अन्यत्र खोजे गए या भारतीय नहीं हैं, तो उनका या तो भारतीयकरण किया जाएगा या उन्हें पढ़ाया ही नहीं जाएगा? यूनानी सभ्यता, अरब की सभ्यता, चीन की सभ्यता या माया सभ्यता मानवीय विकास की सभ्यताएं हैं, उन्हें भारतीय-अभारतीय कह कर हम विकास के सत्य को झुठला नहीं सकते। जिस प्रकार विज्ञान, गणित, भूगोल, प्राणिशास्त्र, वनस्पतिशास्त्र, प्रौद्योगिकी आस्था-निरपेक्ष हैं, उसी तरह इतिहास या भाषा क्यों नहीं हो सकते? कंप्यूटर हो या सूचना-प्रौद्योगिकी, वे मशीनी उपकरण हैं, मनुष्य और मनुष्यता का विकास नहीं। वे धर्म-अधर्म नहीं जानते, न उनके पास मनुष्यता-पाशविकता का भेद है। वे तो यंत्र-संचालित हैं और यंत्र का कोई धर्म नहीं होता। मनुष्य के पास यांत्रिकता न होकर संवेदना है, बाजार न होकर संस्कार है, इसलिए स्कूल यंत्र की सुरक्षा के साथ संवेदना की सुरक्षा के स्थान होने चाहिए।

इवान इलिच ने सही कहा था कि शिक्षा ‘चेतना के उत्सव’ की तरह होनी चाहिए। शिक्षा के संस्थानीकरण ने जड़ता पैदा की है। हमारे अधिकतर राष्ट्रीय स्तर के संस्थानों की भूमिका चेतना के स्तर पर क्या है? न हम नागरिक-चेतना जगा सके, न इतिहास चेतना, न भौतिक रूप से स्वच्छता की चेतना। यहां तक कि राष्ट्रीय स्तर के संस्थान विचार-जड़ भी हैं। वे एक मंत्री, एक निदेशक या एक दल की सरकार के प्रति वफादार जल्दी हो जाते हैं, जबकि शिक्षा का चरित्र तो निर्दलीय, निष्पक्ष और तटस्थ होना चाहिए।

अगर साम्यवादी वामपंथी विचार की सरकार आती है तो हमें अतीत झूठा लगने लगता है, भाषा की परंपरा और साहित्य सांप्रदायिक लगता है और हम सब कुछ बदल कर साम्यवादी नजरिए से अपनी प्रगतिशीलता का तथाकथित लोकतंत्र निभाने लगते हैं, क्या ऐसा कट््टरपन शिक्षा की साम्यवादी सांप्रदायिकता नहीं है? इसी प्रकार जब दक्षिणपंथी सत्ता आती है तो नीति-निर्माताओं, मंत्रियों, निदेशकों, प्राध्यापकों, पाठ्यपुस्तक निर्माताओं आदि सबमें हिंदुत्व जागृत हो जाता है और देशभक्ति के नाम पर ऐसी भारतीयता जागृत हो जाती है कि हिंदू को छोड़ कर बाकी सब या तो विदेशी, अभारतीय या हिंदू-विरोधी लगने लगते हैं। राष्ट्रीय शिक्षा संस्थानों या राज्य संस्थानों में अगर एक विचारधारा वाले कार्यकाल में कुछ विशेषज्ञ पाठ्यक्रम-पाठ्यपुस्तक के कार्य में बुलाए जाते हैं, तो दूसरे के कार्यकाल में वे विशेषज्ञ अयोग्य और अनावश्यक हो जाते हैं। जब उच्च संस्थानों की ऐसी मानसिकता है, तो हम अपने बच्चों, किशोरों, युवाओं को क्या संदेश दे रहे हैं? जो शिक्षा सत्य कहने का साहस छीन ले, उच्च संस्थाओं को मात्र नौकर बना दे, उससे स्वाभिमान कैसे पैदा होगा?

हम शैक्षिक परिसरों को बाजारवादी बना कर, शिक्षा को भी व्यापार बना रहे हैं। स्कूलों के संसाधन टूट-फूट और चोरी के शिकार हैं। हम अंगरेजी माध्यम के स्कूलों से उठ कर विश्वविद्यालय तक पहुंच कर भी न सही अंगरेजी या हिंदी लिख पाते हैं, न बोल पाते हैं न अंगरेजी या हिंदी के आवेदन-पत्र ठीक से भर पाते हैं। हम अपनी भाषा पढ़ना और उसमें पढ़ाना तौहीन मानने लगे हैं। क्या सरकारें और नीतियां इतनी कायर हैं कि वे बाजार की ताकत का मुकाबला न कर सकें? ऐसा भारत में है अन्य यूरो-अमेरिकी देशों या एशिया के अन्य देशों में तो नहीं। शिक्षा सारे पृथ्वी के मनुष्यों के चरित्र-निर्माण का सूत्र देती है, लेकिन देखा यह गया है कि सर्वाधिक शिक्षित, ज्ञानी-विद्वान भी चरित्र भ्रष्ट और बेईमान हैं। किसान खेत से बेईमानी नहीं करता, एक दुकानदार दुकान से बेईमानी नहीं करता, लेकिन एक सरकारी शिक्षक, प्राध्यापक या कर्मचारी-अधिकारी अपनी सरकार, अपने दायित्व, अपने व्यवसाय से बेईमानी करता है। संस्थानों में अधिकार-संपन्न अधिकारी हैं, लेकिन कर्तव्यनिष्ठ लोकसेवक नहीं हैं या हैं तो मुट्ठी भर, जिनकी आवाज राजनीति के ढोल की आवाज में सुनाई नहीं देती।

शिक्षा केवल पाठ्यक्रम-पाठ्यपुस्तक और परीक्षा का त्रिभुज नहीं है, उसे तो प्रवाहमयी त्रिवेणी होना चाहिए, जो अपने तटबंध से लेकर मंझधार तक स्वच्छ हो। संस्थान पदों की प्रतियोगिता और विचारधाराओं की वफादारी के लिए नहीं हैं। उनसे ऐसा मनोविज्ञान प्रकट हो; जो ज्ञान, कौशल और भावना के साथ देश में एक स्वाभिमानी, स्वावलंबी और सेवाभावी पीढ़ी रचे। बाजार कितना भी व्यापक, असरदार हो, वह तभी जीतता है, जब संस्कार या राष्ट्र का शैक्षिक मनोबल हारता है। अगर हम अधिकारों का शैक्षिक बंटवारा ठीक से कर दें तो कर्तव्य निर्वाह अपने आप होने लगेगा और शिक्षा वास्तव में मुक्ति का अभ्यास बन सकेगी।

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