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जीवन-दृष्टि ही विचार-दृष्टि है

रचना में विचारक साहित्यकार और रचनाकार साहित्यकार के बीच जो द्वंद्व दिखाई देता है वह वास्तव में विचारधारा बनाम विचार-दृष्टि का ही द्वंद्व होता है। सूफी जायसी और कवि जायसी का द्वंद्व तथा मार्क्सवादी मुक्तिबोध और कवि मुक्तिबोध के बीच का द्वंद्व विचारधारा बनाम विचार-दृष्टि का ही द्वंद्व है। जिस कृति में विचारधारा के ऊपर विचार-दृष्टि या जीवन-दृष्टि की जीत होती है वह कृति महत्त्वपूर्ण होती है।

प्रतीकात्मक फोटो

इस बात पर प्राय: सहमति है कि कोई रचनाकार बड़ा तभी बनता है जब वह सृजन-कर्म में अपनी विचारधारा का अतिक्रमण करता है। भक्तिकाल में इस बात के सबसे बड़े उदाहरण जायसी हैं, तो आधुनिक काल में मुक्तिबोध। सूफी मतवाद का अतिक्रमण करके ही जायसी पद्मावत जैसी श्रेष्ठ रचना लिख पाए और मुक्तिबोध मार्क्सवादी विचारधारा का अतिक्रमण करके ही आधुनिक हिंदी कविता के पूरे मिजाज और बुनावट को बदल पाए। सूफी जायसी और मार्क्सवादी मुक्तिबोध की रचनाओं को समझने के लिए सूफीवाद और मार्क्सवाद अपर्याप्त है। स्पष्ट है कि विचारधारा के आधार पर न तो श्रेष्ठ रचना संभव है और न ही उसका मूल्यांकन। ऐसे में एक बड़ा प्रश्न यह उठता है कि लेखक की विचारधारा और उसकी रचना में अभिव्यक्त यथार्थ के बीच समानधर्मिता क्यों नहीं होती? कोई भी अच्छी रचना अपने लेखक की विचारधारा से आगे कैसे निकल जाती है? किसी साहित्यकार के विचारक रूप और उसके रचनाकार रूप में भिन्नता कैसे आ जाती है? ऐसा प्राय: क्यों होता है कि किसी भी महान रचना में विचारक साहित्यकार पर रचनाकार साहित्यकार की जीत दिखाई देती है?

फ्रेडरिक एंगेल्स ने बालजाक का उदाहरण देते हुए एक पत्र में लिखा है कि यथार्थवाद लेखक के विचारों के बावजूद प्रकट हो सकता है। बालजाक अपनी रचनाओं में अपने राजनीतिक विचारों और वर्गीय सोच के विरुद्ध जाने को मजबूर होता है। एंगेल्स इसे यथार्थवाद की महान विजय के रूप में परिभाषित करते हैं। कहने का तात्पर्य यह कि लेखक के राजनीतिक विचार के आधार पर उसके साहित्य का मूल्यांकन विकृत आलोचना है। ऐसी विकृत आलोचना के उदाहरण हिंदी में भरे पड़े हैं।

दरअसल, हिंदी आलोचना रचना केंद्रित होने की जगह लेखक केंद्रित अधिक रही है। रचना के माध्यम से लेखक को समझने की जगह लेखक के माध्यम से रचना को समझने की प्रवृत्ति हावी रही है। आलोचना की यह प्रवृत्ति रचना के मूल्यांकन में सबसे बड़ी बाधक सिद्ध हुई है। रचना की तुलना में रचनाकार का मूल्यांकन करना किसी भी आलोचक के लिए बहुत आसान होता है। वह रचनाकार की सामाजिक-राजनीतिक मान्यताओं को उसकी रचना पर आरोपित करके उसे पसंद या खारिज कर देता है। जबकि होना यह चाहिए कि आलोचक रचनाकार से अधिक रचना पर भरोसा करे। यह महत्त्वपूर्ण नहीं है कि रचनाकार क्या कह रहा है, बल्कि महत्त्वपूर्ण यह है कि रचना क्या कह रही है?

हिंदी में सैद्धांतिक आलोचना के विकसित न होने के पीछे भी यही कारण है कि यहां रचना के सत्य की जगह रचनाकार के विचारों को अधिक महत्त्व दिया गया। जब आलोचना रचनाकार-केंद्रित होगी तब उसका सैद्धांतीकरण हो ही नहीं सकता है। इसका सबसे सुंदर उदाहरण मुक्तिबोध और रामविलास शर्मा द्वारा ‘नई कविता’ की आलोचना है। रामविलास शर्मा की आलोचना जहां कवि केंद्रित है वहीं मुक्तिबोध की आलोचना कविता केंद्रित। रामविलास जी जहां कवियों की विचारधारा के आधार पर समूची नई कविता को खारिज करते हैं वहीं मुक्तिबोध कविताओं के आधार पर नई कविता में दो दल होने की बात करते हैं और उसके प्रगतिशील तत्त्वों की व्याख्या करते हैं। मुक्तिबोध की अधिकतर सैद्धांतिक अवधारणाएं ‘नई कविता’ के मूल्यांकन के संदर्भ में ही विकसित हुई हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के बाद हिंदी में सैद्धांतिक आलोचना के क्षेत्र में मुक्तिबोध थोड़ा-बहुत काम इसीलिए कर पाए कि उन्होंने रचनाकार की ऊपरी विचारधारा की जगह रचना की आंतरिक विचारधारा पर अपना ध्यान केंद्रित किया।

सवाल यह भी है कि अगर लेखक रचना में अपनी मान्यताओं का अतिक्रमण करता है तो फिर रचना के मूल्यांकन में उसकी विचारधारा को निर्णायक क्यों माना जाए? रचना का मूल्यांकन करते समय लेखक के विचारों को किनारे रख देना चाहिए। यह हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि लेखक का सत्य और रचना का सत्य अलग-अलग हो सकता है। इस विरोध का कारण लेखक की विचारधारा और उसके जीवन-सत्य के बीच का विरोध है। किसी लेखक की जीवन-दृष्टि या विश्व-दृष्टि के निर्माण में विचारधारा की कम, जीवन-सत्य की निर्णायक भूमिका होती है और रचना में लेखक की इसी जीवन-दृष्टि या विश्व-दृष्टि की अभिव्यक्ति होती है। इसलिए सृजन-कर्म में जीवन-दृष्टि की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। यह जीवन-दृष्टि ही विचार-दृष्टि है। रचना में विचारक साहित्यकार और रचनाकार साहित्यकार के बीच जो द्वंद्व दिखाई देता है वह वास्तव में विचारधारा बनाम विचार-दृष्टि का ही द्वंद्व होता है। सूफी जायसी और कवि जायसी का द्वंद्व तथा मार्क्सवादी मुक्तिबोध और कवि मुक्तिबोध के बीच का द्वंद्व विचारधारा बनाम विचार-दृष्टि का ही द्वंद्व है। जिस कृति में विचारधारा के ऊपर विचार-दृष्टि या जीवन-दृष्टि की जीत होती है वह कृति महत्त्वपूर्ण होती है।

दरअसल, विचारधारा और विचार-दृष्टि या जीवन-दृष्टि में बुनियादी फर्क है। जब विचारधारा चेतना के स्तर से उतर कर अनुभूति के स्तर पर आती है, तो जीवन-दृष्टि बनती है। जीवन-दृष्टि का रिश्ता आचरण से है, जबकि विचारधारा का चिंतन से। विचारधारा ‘कागद लेखी’ है, जबकि जीवन-दृष्टि ‘आंखिन देखी’ है। विचारधारा को हम बाहर से अपनाते हैं, जबकि जीवन-दृष्टि हमारे भीतर से निकलती है। विचारधारा तार्किक सत्य है, जबकि जीवनदृष्टि अनुभूत सत्य है। कोई भी विचारधारा संपूर्ण जीवन-सत्य को अभिव्यक्त नहीं कर सकती है। जीवन किसी विचारधारा की परिधि में नहीं समा सकता है। आचरण के स्तर पर तो उसका दायरा और सिकुड़ जाता है। कोई भी बड़ा रचनाकार विचारधारात्मक सत्य से जीवन-सत्य को अधिक तरजीह देता है। जीवन-सत्य को तरजीह देने के कारण ही उसकी रचनाओं में कई विचारधारात्मक अभिव्यक्तियां मिलती हैं। दरअसल, ये विचारधारात्मक अभिव्यक्तियां जीवन-सत्य का खंड-खंड रूप होती हैं, जिनसे मिलकर संपूर्ण जीवन-सत्य बनता है। इस बात को न समझ पाने के कारण ही आलोचक विचारधारा के अनुरूप रचना से कुछ अंशों को छांट कर उस लेखक को अपनी विचारधारा का सिद्ध करने की कोशिश करता है। उदाहरण के लिए प्रेमचंद को कोई आर्यसमाजी, तो कोई गांधीवादी, तो कोई मार्क्सवादी सिद्ध करने का प्रयास करता रहता है। हमें यह समझना चाहिए कि प्रेमचंद को एक खास वैचारिक फ्रेम में देखना उन्हें छोटा बनाना और उनका अवमूल्यन करना है। प्रेमचंद का रचनात्मक कद इन वैचारिक सारणियों से अधिक व्यापक है।

रेणु वैचारिक रूप से सोशलिस्ट पार्टी के साथ थे। पर उनका ‘मैला आंचल’ कहीं से भी सोशलिस्ट सिद्धांतों का थीसिस उपन्यास नहीं है। वे सभी विचारधाराओं को स्थानीयता यानी जीवन की कसौटी पर कसते हैं और उन्हें अधूरा और दोषपूर्ण पाते हैं। सभी विचारधाराएं अनुभूति के स्तर पर उतर कर किस कदर विकृत हुई हैं, इसका वे जीवंत चित्रण करते हैं। किसी भी विचारधारा के साथ सहानुभूति न दिखा कर उन्होंने रचनात्मक ईमानदारी का परिचय दिया है। यह देखना दिलचस्प है कि विचारक रेणु की सोशलिस्ट विचारधारा से सहानुभूति है, लेकिन रचनाकार रेणु की सोशलिस्ट विचारधारा से कोई सहानुभूति नहीं है। मैला आंचल में यथार्थ की सच्ची अभिव्यक्ति हुई है और वहां लेखक का अपना कोई वैचारिक हस्तक्षेप नहीं है। ‘मैला आंचल’ की महानता में इस तटस्थता की बड़ी भूमिका है। शायद इसीलिए जार्ज लुकाच ने ईमानदारी को सच्चे यथार्थवाद की कसौटी माना है।

इसलिए, महत्त्वपूर्ण यह नहीं है कि लेखक के पास कोई विचारधारा है कि नहीं, बल्कि महत्त्वपूर्ण यह है कि लेखक के पास कोई जीवन-दृष्टि या विश्व-दृष्टि है कि नहीं। विश्व-दृष्टि के बिना कोई महान कृति नहीं हो सकती। यह ध्यान रखना चाहिए कि यह विश्व-दृष्टि वर्ग चेतना से अलग है। विश्व-दृष्टि की अवधारणा के प्रणेता लूसिएं गोल्डमान ने इसके निर्माण में वर्ग की जगह समूह की भूमिका को निर्णायक माना है। उनका स्पष्ट मत है कि लेखक की विश्व-दृष्टि इस बात से निर्धारित होती है कि वह किस समूह (ग्रुप) से जुड़ा है। इस विश्व-दृष्टि को भारतीय संदर्भ में हम जीवन-दृष्टि कह सकते हैं। और यही जीवन-दृष्टि रचनाकार के लिए अपरिहार्य है।

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