ताज़ा खबर
 

कब तक मिटेगा कुष्ठ का कलंक

कुष्ठ उन्मूलन का लक्ष्य 2005 में हासिल कर लिया गया था। राष्ट्रीय स्तर पर कई संस्थानों और कई महान, अथक, सार्थक कोशिशों से यह संभव हुआ। कुष्ठ उन्मूलन का अर्थ पूरी तरह खात्मा नहीं, बल्कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की परिभाषा के मुताबिक प्रति दस हजार आबादी पर एक से कम रोगी की दर को हासिल कर लिया गया। कुष्ठ की बीमारी अब भी है, पर अब उसका बेहतर इलाज भी है। लेकिन कुष्ठ का कलंक कुछ हद तक अब भी बना हुआ है।

प्रतीकात्मक फोटो

अखिलेश अवस्थी

कुष्ठ उन्मूलन का लक्ष्य 2005 में हासिल कर लिया गया था। राष्ट्रीय स्तर पर कई संस्थानों और कई महान, अथक, सार्थक कोशिशों से यह संभव हुआ। कुष्ठ उन्मूलन का अर्थ पूरी तरह खात्मा नहीं, बल्कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की परिभाषा के मुताबिक प्रति दस हजार आबादी पर एक से कम रोगी की दर को हासिल कर लिया गया। कुष्ठ की बीमारी अब भी है, पर अब उसका बेहतर इलाज भी है। लेकिन कुष्ठ का कलंक कुछ हद तक अब भी बना हुआ है। संस्थागत स्तर पर कुष्ठ को लेकर बने हुए भेदभाव वाले नियम-कानूनों को अब जाकर दूर किया जा रहा है। पिछले साल तक दंपति में से किसी एक को कुष्ठ रोग होना, दूसरे के लिए तलाक का एक वैधानिक आधार बना हुआ था। जनवरी 2019 में संसद ने इस कानूनी विसंगति को खत्म कर दिया और अब कुष्ठ तलाक लेने का कानूनी आधार नहीं रह गया है। कुष्ठ के प्रति भेदभाव करने वाला ब्रिटिश लेपर्स एक्ट भी तीन बरस पहले- 2016 में खत्म किया गया। 1898 में लेपर्स एक्ट बना था, जो कुष्ठ रोग पीड़ित को अलग बस्तियों में रखे जाने की इजाजत देता था। उस समय इस बीमारी का कोई इलाज नहीं था और इसका फैलाव रोकने के लिए ऐसा किया गया था। लेकिन पूरी तरह इलाज आने के दशकों बाद तक कुष्ठ का कलंक कानून की किताब में बना रहा।

रोगी के लिए मृत्यु से भी बदतर जीवन स्थितियों के कारण कोढ़ नाम से कई सदी तक पुकारी जाने वाली यह बीमारी अभिशाप बन गई। इसके नाम से ही ऐसा कलंक जुड़ा था कि कुष्ठ मिटाने के अभियान से जुड़े रणनीतिकारों ने सबसे पहले इसका नाम कुष्ठ करने का सुझाव दिया। कुष्ठ की भयावह पीड़ा के कारण ही सेवा के कई अनुपम उदाहरण इस बीमारी के साथ जुड़े। महात्मा गांधी ने कुष्ठ रोगियों की पीड़ा को एक सदी पहले ही समझ लिया था, जब इसका कोई उपचार नहीं था। यही वजह है कि प्रतीकात्मक तौर पर कुष्ठ उन्मूलन दिवस महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर मनाया जाता है। गांधीजी को बहुत अच्छा संवादधर्मी कहा जाता है। वे अपनी जीवनचर्या से ही संदेश देते थे। कुष्ठ रोगियों की सेवा कर उन्होंने इसके पीड़ितों के तिरस्कार नहीं, बल्कि उनसे सहानुभूति की जरूरत पर जोर दिया। महात्मा गांधी के कदमों पर चल कर बाबा आमटे ने भी कुष्ठ रोगियों की सेवा में अपना जीवन समर्पित किया। कुष्ठ पीड़ित को जीवित रह कर इस बीमारी का अभिशाप झेलना होता था। अपनों से अलग रह कर, विकलांगता में दूसरों के भरोसे जीवनयापन करना पड़ता था। कुष्ठ रोगी का जीवन नारकीय हो जाता था। बाबा आमटे ने कुष्ठ रोगियों के पुनर्वास और उनको स्वालंबी बनाने के लिए काम किया।

ईसा पूर्व से कुष्ठ बीमारी के इतिहास की जानकारी मिलती है। भारत में आयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथ सुश्रुत संहिता में कुष्ठ का उल्लेख है। कई सदियों के अभिशाप के बाद दुनिया में 1970 के दशक में इसके संपूर्ण इलाज की पद्धति मल्टी ड्रग थेरेपी (एमडीटी) आई। देश में 1980 के दशक में एमडीटी से इलाज लेकर कुष्ठ बीमारी से पूरी तरह मुक्त होना संभव हो गया। 1982 में एमडीटी से व्यापक तौर पर भारत में कुष्ठ का इलाज शुरू हुआ। उस समय देश में प्रति दस हजार आबादी पर औसतन रोगी दर 57.8 थी।

मगर समस्या इससे जुड़े कलंक की रही है। पूरा इलाज आने के बाद भी लोग खुल कर सामने आकर सरकारी केंद्रों पर बिना किसी दाम के मिल रही दवाएं लेने को तैयार नहीं थे। समाज में तिरस्कार का डर समाया हुआ था। घर-परिवार से अलग किए जाने या बहिष्कार का भय था। लोग परिवार में ही बीमारी छिपाए रहते थे या परिवार अपने सदस्य की बीमारी को सामने लाने को तैयार नहीं था कि कहीं समाज से उनको अलग-थलग न कर दिया जाए।

ऐसे में कुष्ठ रोग उन्मूलन कार्यक्रम के अमले का काम चिकित्सा न होकर सामाजिक ज्यादा हो गया। शरीर की बीमारी के इलाज से पहले दिमागों में बैठे डर और शर्म का इलाज जरूरी हो गया। पहले सामाजिक जागरूकता पैदा करने की जरूरत महसूस की गई, जिससे रोगी खुल कर सामने आएं और इलाज कराएं। स्वस्थ होकर कहें कि हां मैं कुष्ठ रोगी था और इलाज पाकर ठीक हो गया हूं। परिवारों में रहते हुए कुष्ठ रोगी का इलाज कराने और भले-चंगे होने का संदेश देने की कोशिश हुई।

छत्तीसगढ़ राज्य एमडीटी का इलाज आने के बाद कुष्ठ उन्मूलन के अलग तरह के अभियान का भी उदाहरण बना, जिसे कुष्ठ उन्मूलन क्षेत्र में राजनांदगांव (प्रदेश का एक जिला) मॉडल कहा गया। इसे दूसरी जगहों पर भी अपनाया गया। उस समय स्वास्थ्य सेवाओं के समांतर कुष्ठ रोग उन्मूलन कार्यक्रम चलाया गया। इलाज तो आ गया था, लेकिन इसका लाभ लेने वाले रोगियों को सामने लाने की समस्या थी। शुरुआत में ही बीमारी को पहचान लेने और निस्संकोच होकर इलाज के लिए लोगों को आगे लाना था। समाज के बीच से ही जन भगीदार तैयार किए गए, जिन्होंने लोगों में कुष्ठ को लेकर जानकारी का प्रचार-प्रसार किया। इससे रोगी भी सामने आए और समाज में उनको अलग-थलग करने की बुराई भी कुछ हद तक दूर हुई। इस जागरूकता में यह संदेश भी छिपा था कि कुष्ठ के पीड़ितों को अब घर-परिवार से अलग करने की नहीं, बल्कि साथ में रखने और उनका पूरा इलाज कराने की जरूरत है। बेहतर इलाज से वह अब परिवार के बीच ही रह सकते हैं।

कुष्ठ का इलाज लेकर भले-चंगे होने के उदाहरण जब समाज के सामने आने आरंभ हुए तो इसने समाज पर सीधा असर डाला और सामाजिक जागरूकता आई। रोगी घर में रह कर इलाज कराने लगे। इलाज से रोग में कमी आनी शुरू हो गई। यह दर 1992 में 24 और 2001 में 3.7 हो गई। 2016 में यह घट कर 0.66 रह गई है। इसी साल एक सदी से अधिक पुराना कानून लेपर्स एक्ट भी खत्म हुआ। इस भयावह कानून ने सदियों से कुष्ठ रोगियों को अलग और बहिष्कृत करने की व्यवस्था को संस्थागत रूप दे दिया था।

पर सदियों से चले आ रहे कुष्ठ के कलंक को मिटने में समय लग रहा है। आज भी इस बीमारी का मरीज खुल कर इलाज कराने में संकोच और शर्म से पूरी तरह मुक्त नहीं हुआ है। शायद यही कारण है कि आज भी इक्का-दुक्का राज्य और कई जिले रोग उन्मूलन की दर हासिल नहीं कर पाए हैं। छत्तीसगढ़ में आज भी प्रदेश स्तर पर प्रति दस हजार आबादी पर 2.25 रोगी हंै जो कि केंद्र शासित क्षेत्र दादर-नगर हवेली की दर 4.85 के बाद सबसे ज्यादा है। कई प्रदेशों में यह अभियान पिछड़ा हुआ है। राष्ट्रीय कुष्ठ उन्मूलन कार्यक्रम के 2018 के आंकड़ों के मुताबिक लक्षद्वीप, ओडिशा, बिहार और झारखंड में भी यह दर एक से ज्यादा है। सौ से ज्यादा जिलों में दस हजार की आबादी पर एक से ज्यादा रोगी हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक दुनिया में अब भी हर साल कुष्ठ रोग के दो लाख मामले सामने आ रहे हैं, जिनमें से आधे से अधिक भारत से ही होते हैं। यानी कि अब भी हर साल एक लाख से ज्यादा कुष्ठ के मामले देश में सामने आ रहे हैं। यह चिंता की बात नहीं है, क्योंकि इनका इलाज हो सकेगा। चिंता उन मामलों की होनी चाहिए, जो सामने नहीं आ रहे और अंदर ही अंदर बीमारी को बढ़ा सकते हैं। तन का कुष्ठ मिटाना तो सरल हो गया है, लेकिन मन का कुष्ठ मिटाने का काम अब भी पूरे देश में करने की बहुत जरूरत है। जब इसे सामान्य बीमारी की तरह ही मान लिया जाएगा और इसके नाम से कोई सहमेगा नहीं, तभी इस बीमारी से देश-दुनिया को निजात मिल सकेगी।

Next Stories
1 समावेशी शिक्षा से बहिष्कृत बच्चे
2 बाखबर: खेल पलटने का खेल
3 वक्त की नब्ज: गरीबी बांटने की परंपरा
चुनावी चैलेंज
X