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समावेशी शिक्षा से बहिष्कृत बच्चे

यों कोई भी समाज पूरी तरह विसंगतियों से मुक्त नहीं होता, पर हमारे यहां कई विसंगतियां जागरूकता के अभाव और जड सोच-समझ की वजह से बनी हुई हैं। अनेक विसंगतियों के उन्मूलन के लिए सरकारी स्तर पर भी प्रयास होते रहते हैं, कानून बने हैं, पर सामाजिक जागरूकता की कमी और प्रशासनिक शिथिलता के चलते उन्हें दूर करना आज भी कठिन बना हुआ है। इसी वजह से दिव्यांग बच्चों को सामान्य विद्यालयों में शामिल कर पाना और कुष्ठ रोग पर पूरी तरह काबू पाना चुनौतीपूर्ण काम है। इस बार की चर्चा इसी पर। - संपादक

प्रतीकात्मक फोटो

हमारे व्यक्तित्व के दो हिस्से हैं- आंतरिक और बाह्य। इन्हीं बुनावटों के आधार पर बच्चा व्यवहार करता है। अगर स्कूल और कक्षा में बैठा बच्चा शिक्षक की बातों को सुन नहीं पा रहा है या फिर सुन कर उस पर या तो प्रतिक्रिया नहीं दे रहा या फिर देर लगाता है, तो हमें समझने की आवशकता है क्या बच्चा सामान्य है या फिर इसके व्यक्तित्व में कहीं कोई कमी है। कई बार हमें कमियां नजर आ जाती हैं। मसलन आंख, कान, नाक, पैर आदि की दिव्यांगता दिखाई देती है। लेकिन जो दिखाई नहीं देती है वह है बच्चों की मानसिक दिव्यांगता। ऐसे बच्चों की पहचान और उनके निदान के क्या तरीके हो सकते हैं? इसकी समझ शिक्षक को होनी चाहिए। यानी शिक्षकों को ऐसा प्रशिक्षण मिलना चाहिए कि वह बच्चों की मानसिक दिव्यांगता की पहचान और उसके अनुरूप अपने शिक्षण-प्रशिक्षण के तरीके प्रयोग कर सकें। पर स्कूलों में जहां सामान्य शिक्षकों की कमी हजारों और लाखों में है, वहां विशेष शिक्षकों की कमी की बात करना नक्कारखाने में तूती जैसा है।

फिर, जरा हम स्कूलों पर नजर दौड़ाएं। क्या उनमें दिव्यांग बच्चों के लिए कक्षाएं, खेल के मैदान, लाइब्रेरी, रिसोर्स सेंटर या पीने का पानी और शौचालय सहज इस्तेमाल के योग्य होते हैं। क्या दिव्यांग बच्चों को सामान्य बच्चों के दोहरे व्यवहार का सामना नहीं करना पड़ता? कुछ और सवाल हैं, जिन्हें लेकर अगर सरकारी स्कूलों में प्रवेश करें, तो निराशा होती है। कहने और दिखाने को दिव्यांग बच्चों के लिए शौचालय का निर्माण किया जाता है, लेकिन कई स्कूलों में ताले लगे होते हैं। या फिर उपयोग में नहीं होते हैं। कक्षाओं में जहां तथाकथिक दिव्यांग बच्चे हैं, क्या उनके शिक्षण के लिए विशेष शिक्षण-अधिगम-सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है या उन तमाम बच्चों को सामान्य बच्चों की शिक्षण प्रविधियों के डंडे से हांक दिया जाता है।

सामान्य बच्चों के बीच रहते हुए इन बच्चों को कई प्रकार के भेदभाव का सामना करना पड़ता है। कई बार शिक्षक भी परोक्षत: उनमें शामिल हो जाते हैं। दिव्यांग बच्चों के साथ किस प्रकार का बर्ताव किया जाए या फिर उनके लिए किस प्रकार की शिक्षण प्रविधि का प्रयोग किया जाए, ताकि उन बच्चों को शिक्षा की मुख्याधारा में शामिल किया जा सके। आज विमर्श का मुद्दा यह होना चाहिए कि कैसे हम दिव्यांग बच्चों को भी सामान्य स्कूलों में स्थान दे सकें। उन्हें किसी खास वर्ग में बांट कर विशेष स्कूलों के हवाले कर देने से बेहतर है उन्हें विशेष शिक्षकों द्वारा स्कूली तालीम दी जाए।

सतत विकास लक्ष्य के तहत घोषणा की गई थी कि 2015 तक सभी बच्चों को बुनियादी शिक्षा मुहैया करा देंगे। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि अब भी करोड़ों में बच्चे स्कूल से बाहर हैं। ऐसे में दिव्यांग बच्चों की संख्या काफी बड़ी है, जो सामान्य स्कूलों से बाहर हैं। उन्हें किसी न किसी वजह से बहिष्कृत किया गया है। जमीनी हकीकत यह है कि जब एक ओर सामान्य स्कूलों से बच्चे बाहर हैं, वहीं दूसरी ओर दिव्यांग बच्चों की क्या स्थिति होगी। हालांकि स्कूलों में विशेष प्रशिक्षित शिक्षक नियुक्त किए गए हैं, लेकिन उन्हें न तो समाज में और न ही स्कूलों में सामान्य शिक्षकों की श्रेणी में शामिल किया जाता है। यहां तक कि सामान्य स्कूलों में विशेष दिव्यांग बच्चों को पढ़ाने वालों की स्वीकार्यता कम है। सामान्य स्कूलों में शिक्षकों के बीच भी खास बच्चों और शिक्षकों के लिए संवेदनशीलता होनी चाहिए। जब एक विशेष शिक्षक बच्चों को तैयार कर सामान्य कक्षाओं में भेजते हैं, तब सामान्य शिक्षक उन बच्चों से उम्मीद करते हैं कि वे सामान्य बच्चों के तर्ज पर उत्तर दें। और देखते ही देखते वैसे बच्चे दुबारा विशेष शिक्षक के पास लौट आते हैं।

सामान्य स्कूलों में पढ़ने वाले विशेष ध्यान देने योग्य बच्चों के लिए करुणापूर्ण रवैया रखना चाहिए। उन्हें हमेशा यह एहसास कराना कि वे सामान्य बच्चों से भिन्न हैं यह भी कई बार प्रकारांतर से उनके अंदर कुंठा पैदा करता है। इसलिए ऐसे बच्चों के साथ कैसे बर्ताव किया जाए यह भी एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। किसी भी बच्चे के माथे पर दिव्यांग की चिप्पी लगाने से पहले कई दफा सोचना होगा कि वह क्यों नहीं सीख रहा है? वह किसी खास समस्या से तो नहीं गुजर रहा है? इसकी पहचान कैसे और कौन करेगा कि अमुक बच्चा मानसिक विचलन या किसी खास मनोरोग से गुजर रहा है। इसकी चिकित्सीय जांच कौन करेगा? क्या हमारे स्कूल इस प्रकार के मनोचिकित्सीय उपचारों और जांच के लिए तैयार हैं? अगर नहीं, तो क्या हम स्कूलों में एक मनोचिकित्सक या विशेष बच्चों की पहचान करने में दक्ष अध्यापक को स्कूलों में स्थान दे सकते हैं।

कक्षा में जो बच्चा किन्हीं कारणों से सामान्य बच्चों की तरह उत्तर नहीं दे पा रहा है, तो उसकी पहचान होनी चाहिए। गौरतलब है कि सामान्य परिवार में मनोरोग या मानसिक रोगी बच्चों या दिव्यांग बच्चों की पहचान कैसे करें और उनके साथ कैसे व्यवहार करें, इसकी समझ नहीं होती। ऐसे में एक उम्मीद स्कूल और शिक्षकों से बनती है कि यहां बच्चा सभी बच्चों के साथ शिक्षा हासिल कर सकेगा।

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार एवं संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार सम्मेलन 1989 में बच्चों के जिन अधिकारों को शामिल किया गया उनमें बच्चे को जीने का अधिकार, विकास का अधिकार, सहभागिता का अधिकार आदि प्राप्त हैं। पर क्या दिव्यांग बच्चे स्कूल के कार्यक्रमों में उसी तरह बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं, जैसे सामान्य बच्चे? क्या इन बच्चों के साथ स्कूल प्रशासन, शिक्षक, सहपाठियों का बर्ताव सामान्य रहता है या फिर बेचारा या बेचारी जैसे भावों से इन्हें देखा जाता है। हमारे बच्चों के शारीरिक दिव्यांगता को दूर करने के लिए कई बार थोड़ी-सी सजगता और मानवीय दृष्टिकोण की दरकार होती है। पर ऐसे भी नहीं कहा जा रहा है कि इन्हें हर वक्त यह एहसास कराया जाए कि आप सामान्य नहीं हैं। आप दिव्यांग हैं। ऐसे बर्ताव कई बार बच्चों में अवसाद और कुंठा को जन्म दे सकते हैं।

दिव्यांग बच्चों की पहचान कैसे की जाए, इसको लेकर स्कूल प्रशासन और शिक्षा विभाग में कोई खास जागरूकता नजर नहीं आती। प्रशासन ने स्कूलों में विशेष शिक्षकों की नियुक्ति तो कर दी, लेकिन क्या उन शिक्षकों की विशेषज्ञता का सही और समुचित प्रयोग हो रहा है, इसे जांचने, समझने का समय किसी के पास नहीं है। इन शिक्षकों के पास कई सत्रों पर महज चार-पांच या फिर कुछ और संख्या में बच्चे होते हैं। ऐसे में या तो इन्हें सामान्य कक्षाएं पढ़ाने, संभालने की जिम्मेदारी दे दी जाती है या फिर इन्हें प्रतिनियुक्ति पर विभाग में बुला लिया जाता है। कितना अच्छा होता कि इनकी विशेषज्ञता का सही इस्तेमाल बच्चों की बेहतरी के लिए किया जाता। एक बार जब विशेष प्रशिक्षित शिक्षक स्कूल और अध्यापन में आ जाते हैं, तो उनके लिए कार्यशालाओं की व्यवस्था न के बराबर होती है। सामान्य शिक्षकों के लिए एससीईआरटी, सर्व शिक्षा अभियान या फिर राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान के तहत पांच या दस दिन की कार्यशालाओं का आयोजन किया जाता है, पर दिव्यांग बच्चों के साथ काम करने वाले विशेष शिक्षकों की कार्यशालाएं तकरीबन न के बराबर होती हैं।
हमें खयाल रखना होगा कि दिव्यांग बच्चे भी इसी नागर समाज के मुख्याधारा का अभिन्न हिस्सा हैं। इन्हें नजरअंदाज या फिर बहिष्कृत कर हम कैसे विकसित समाज और देश की परिकल्पना कर सकते हैं। क्या सूरदास को बहिष्कृत कर कृष्ण के भक्ति काव्य की कल्पना कर सकते हैं? ठीक उसी प्रकार दिव्यांग बच्चों को स्कूली शिक्षा की मुख्यधारा से बाहर खदेड़ कर एक स्वस्थ और समावेशी समाज और शिक्षा की परिकल्पना मुश्किल है।

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