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साहित्य : अदृश्य पत्रिकाएं

वेंकटेश कुमार हिंदी में चार सौ से भी ज्यादा साहित्यिक पत्रिकाएं छपती हैं। लेकिन इस देश में एक भी ऐसी जगह नहीं जहां एक साथ बीस-पच्चीस साहित्यिक पत्रिकाएं बिक्री के लिए उपलब्ध हों। प्रत्येक वह व्यक्ति जिसकी साहित्य में दिलचस्पी है, इस बात का रोना रोता रहता है कि उसे पत्रिकाएं नहीं मिल पातीं। फिरलेखक, […]

Author March 1, 2015 10:00 PM

वेंकटेश कुमार

हिंदी में चार सौ से भी ज्यादा साहित्यिक पत्रिकाएं छपती हैं। लेकिन इस देश में एक भी ऐसी जगह नहीं जहां एक साथ बीस-पच्चीस साहित्यिक पत्रिकाएं बिक्री के लिए उपलब्ध हों। प्रत्येक वह व्यक्ति जिसकी साहित्य में दिलचस्पी है, इस बात का रोना रोता रहता है कि उसे पत्रिकाएं नहीं मिल पातीं। फिरलेखक, चाहे वह छोटा हो या बड़ा, इस मामले में कुछ ठोस कदम उठाए जाने की आवश्यकता पर भरपूर बल देता रहता है। स्वर्गीय राजेंद्र यादव, अशोक वाजपेयी और नामवर सिंह जैसे दिग्गज लेखकों ने तो कई बार लिखित रूप में यह चिंता प्रकट की है कि यह बहुत ही शर्म की बात है कि हम लोग एक भी ऐसी जगह का निर्माण नहीं कर पा रहे हैं, जहां पत्रिकाएं बिक्री के लिए उपलब्ध हों। राजेंद्र यादव ने तो ‘हंस’ के संपादकीय में एक पूरी योजना प्रस्तुत की थी कि मंडी हाउस (दिल्ली) के किसी खाली पड़े बंगले को कैसे सांस्कृतिक केंद्र का रूप दिया जाना चाहिए। अशोक वाजपेयी भी लगातार इस कोशिश में हैं कि किसी तरह एक ऐसी जगह निकल आए, जहां पत्रिकाएं उपलब्ध हों। लेकिन दिक्कत यह है कि उनकी कल्पना में ‘लंदन रिव्यू बुक शॉप’ हिचकोले खाता रहता है और वे उसे दिल्ली में साक्षात उतार देने के लिए कमर कसते रहते हैं। न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी।

इस देश में न जाने कितनी केंद्रीय और राज्य-स्तरीय हिंदी अकादमियां हैं। इन अकादमियों का साल भर का बजट जोड़ कर बताया जाए तो साहित्य के भोले-भाले पाठकों के होश उड़ जाएंगे। ये सारी अकादमियां अपनी-अपनी पत्रिकाएं भी निकालती हैं। लेकिन वे कभी सोच नहीं पातीं कि उनकी पत्रिकाएं कोई खरीद भी सकता है। जाहिर है, इन अकादमियों और परिषदों से पत्रिका-बिक्री केंद्र की स्थापना की उम्मीद करना निहायत भोलापन ही होगा।

हिंदी में लेखक संघों और मंचों की भी कमी नहीं है। ये लेखक संघ और मंच गोष्ठियों में मुख-उत्पादकक्रांति करते रहते हैं। लेकिन अगर उनसे कहिए कि आप सभी आपस में मिल कर कोई साझा एजेंडा तय कीजिए तो ये आपका मुंह भंभोर लेंगे। जाहिर है, लेखक संगठनों से भी यह उम्मीद करना कि वे पत्रिकाओं के लिए कोई बिक्री केंद्र स्थापित करेंगे, व्यावहारिक नहीं है। हिंदी में प्रकाशकों ने तो और ज्यादा बेड़ा गर्क कर रखा है। लेखक और पाठक इनसे इस मामले में कुछ ठोस करने का अनुरोध कर-करके थक गए हैं। अगर सिर्फ दिल्ली में साल भर में हिंदी-पुस्तकों के लोकार्पण और लोकार्पण में होने वाले रसरंजन के खर्चे का हिसाब लगाया जाए तो वह करोड़ में जरूर पहुंचेगा। यहां यह आकलन करना भी दिलचस्प होगा कि साल भर में आम पाठकों द्वारा खरीदी गई हिंदी-पुस्तकों से इकट्ठा धनराशि और लोकार्पण में खर्च की गई धनराशि में से कौन-सी धनराशि बड़ी होगी। जाहिर है, पत्रिका-बिक्री केंद्र के मामले में प्रकाशकों से भी उम्मीद करना व्यर्थ है। फिर, लाख टके का सवाल है कि इस तरह के केंद्र की स्थापना कैसे होगी? इस मामले में मेरे पास कुछ सुझाव हैं, जिन्हें हिंदी समाज से साझा करना चाहता हूं।

दिल्ली में मंडी हाउस साहित्य, कला और संस्कृति का सबसे जीवंत केंद्र है। यहां के श्रीराम सेंटर में कभी पुस्तकों और पत्रिकाओं की एक मशहूर दुकान हुआ करती थी, जिसके बंद हो जाने का बहुत गहरा अफसोस लेखकों और पाठकों को है। श्रीराम सेंटर जैसे संस्थानों में पत्रिका-बिक्री केंद्र खोलने में कुछ व्यावहारिक दिक्कतें हैं, जिन्हें शायद दूर नहीं किया जा सकता। हम देख रहे हैं कि आजकल मेट्रो स्टेशनों पर भी किताब की आकर्षक दुकानें खुलने लगीं हैं। पत्रिका-बिक्री केंद्र के लिए मंडी हाउस मेट्रो स्टेशन के अधिकारियों से भी बात की जा सकती है। अगर यह भी बहुत खर्चीला हो तो मंडी हाउस पर चाय और समोसे की जो अनेक गुमटियां दिखतीं हैं, वैसी ही गुमटी को पत्रिका-बिक्री केंद्र का रूप दिया जा सकता है। इसमें जो तकनीकी दिक्कतें आएंगी, उन्हें नामवर सिंह और अशोक वाजपेयी जैसे कई बड़े लेखक मिल कर दूर कर देंगे, यह उम्मीद तो की ही जानी चाहिए।

अब रही बात आर्थिक दिक्कत दूर करने की, तो इसका सबसे आसान तरीका है चंदा इकट्ठा करना। वाजपेयीजी ने ‘जनसत्ता’ के अपने स्तंभ ‘कभी-कभार’ में कुछ महीने पहले हिंदी के लेखकों की बीमारी के आर्थिक पहलू पर चिंता प्रकट करते हुए इस मामले में एक कोष बनाए जाने और लोगों से उस कोष में दान देने की आवश्यकता पर बल दिया था। अजित कुमार ने ‘जनसत्ता’ में ही लेख लिख कर पांच लाख रुपए दान देने की घोषणा की थी। पत्रिका-बिक्री केंद्र का नितांत अभाव भी हिंदी साहित्य और हिंदी-समाज के कुपोषित होने का ही प्रमाण है।

हिंदी साहित्य और समाज को इस कुपोषण और बीमारी से मुक्त करने के लिए भी एक छोटे कोष की स्थापना की जा सकती है। इस कोष में अगर चार-पांच लाख रुपए की राशि भी इकट्ठा हो जाएगी तो पत्रिका-बिक्री केंद्र का संचालन करने के लिए एक या दो कर्मचारी नियुक्त किए जा सकते हैं। दिल्ली में बड़ी-बड़ी डिग्रियां लेकर पांच से सात हजार रुपए महीने पर चौकीदारी करने वाले बेरोजगार युवकों की संख्या हजारों में है। जाहिर है, पत्रिका-बिक्री केंद्र के संचालन के लिए कर्मचारियों की नियुक्ति लोगों के लिए कोई समस्या नहीं होगी। इस तरह से दिल्ली में जब एक-दो केंद्र खुल जाएंगे तो इसी तर्ज पर पटना, इलाहबाद, गोरखपुर, बनारस, लखनऊ, भोपाल आदि शहरों में भी कोशिश की जा सकती है। इस तरह की जगहें हिंदी के लेखकों और पाठकों के लिए एक सार्वजनिक मिलन-मंच का भी काम करेंगी, जहां बहस-मुबाहिसों का दौर चला करेगा।

हिंदी के लेखक पाठकों की कमी का रोना रोते रहते हैं। किसी पत्रिका में लेख, कहानी या कविता भेज कर पाठकीय प्रतिक्रिया का इंतजार करते रहते हैं। अमूमन अब कोई प्रतिक्रिया नहीं आती। इससे लेखक हताश और उदास हो जाते हैं। सोचते हैं कि जब मेरा लिखा कोई पढ़ता ही नहीं, तो लिखने से क्या फायदा? इसी तरह पत्रिकाओं के संपादकों के पास भी कोई प्रतिक्रिया नहीं आती। वे बड़े-बड़े लेखकों को अपनी पत्रिका रजिस्ट्री और कूरियर कर-कर के थक जाते हैं। जब लेखक और संपादकइस तरह अनवरत हतोत्साह होते रहेंगे तो हिंदी साहित्य का रोगग्रस्त होना लाजिमी है। इस रोग का सबसे सटीक इलाज है, साहित्य को आम पाठकों तक पहुंचाना। जब लेखकों और संपादकों के पास दूरदराज के गांवों और कस्बों से पत्र और एसएमएस या फोन आने लेगेंगे तो इससे उनकी रगों में फौलादी मजबूती आएगी। कहना न होगा कि इससे साहित्य और साहित्यकार, दोनों के स्वास्थ्य में सुधार आएगा।

 

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