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निनाद : लोकतंत्र पर हमले

कुलदीप कुमार इन दिनों बार-बार रघुवीर सहाय की कविता ‘राष्ट्रीय प्रतिज्ञा’ दिमाग में कौंध रही है। कविता यों है: ‘हमने बहुत किया है/ हम ही कर सकते हैं/ हमने बहुत किया है/ पर अभी और करना है/ हमने बहुत किया है/ पर उतना नहीं हुआ है/ हमने बहुत किया है/ जितना होगा कम होगा/ हमने […]
Author July 26, 2015 15:48 pm

कुलदीप कुमार

इन दिनों बार-बार रघुवीर सहाय की कविता ‘राष्ट्रीय प्रतिज्ञा’ दिमाग में कौंध रही है। कविता यों है: ‘हमने बहुत किया है/ हम ही कर सकते हैं/ हमने बहुत किया है/ पर अभी और करना है/ हमने बहुत किया है/ पर उतना नहीं हुआ है/ हमने बहुत किया है/ जितना होगा कम होगा/ हमने बहुत किया है/ जनता ने नहीं किया है/ हमने बहुत किया है/ हम फिर से बहुत करेंगे/ हमने बहुत किया है/ पर अब हम नहीं कहेंगे/ कि हम अब और क्या करेंगे/ और हमसे लोग अगर कहेंगे कुछ करने को/ तो वह तो कभी नहीं करेंगे।’

देश के इतिहास में शायद यह पहली बार हुआ है कि किसी सत्तारूढ़ राष्ट्रीय पार्टी का अध्यक्ष चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार द्वारा किए गए वादों को ‘चुनावी जुमले’ कह कर उन पर अमल न किए जाने को सही ठहरा दे। यह भी पहली बार हो रहा है कि एक सामाजिक कार्यकर्ता और उसके पति को, जिन पर उनके संगठनों को मिले धन की हेराफेरी का आरोप है यानी जो पुलिस और सरकार की नजर में आर्थिक अपराधी हैं, जेल में डालने के लिए गुजरात पुलिस और सीबीआइ दोनों इतनी बेताब हों और देश की विदेशमंत्री एक घोषित आर्थिक अपराधी को, जो कानून की पहुंच से बाहर जाकर विदेश में रह रहा है, मदद पहुंचाने के लिए एक दूसरे देश की सरकार से अनुरोध करें। यही नहीं, एक राज्य की मुख्यमंत्री के उस घोषित आर्थिक अपराधी के साथ घनिष्ठ व्यक्तिगत और व्यावसायिक संबंध भी जगजाहिर हों, लेकिन इस सबको सही ठहराया जा रहा हो।

देश के सामने इस समय जो राजनीतिक संकट है, उसकी गंभीरता को अधिकतर लोग पहचान नहीं रहे हैं। इस समय सभी तरफ से ऐसी राजनीतिक प्रवृत्तियां पनप रही हैं, जिनका स्वाभाविक रुझान लोकतंत्र के नहीं, एकाधिकारवादी शासन के प्रति है। इन्हें किसी किस्म की असहमति या विरोध बरदाश्त नहीं। इन्हें गवारा नहीं कि इनके फैसलों पर कोई सवालिया निशान लगाए और इनसे किसी भी तरह का स्पष्टीकरण मांगा जाए। जो भी सत्ता में आता है, वह निरंकुश ढंग से शासन करना चाहता है। राज्य को निजी संपत्ति और राज्य की नौकरशाही को निजी चाकरशाही मानने की प्रवृत्ति भी लगातार बढ़ती जा रही है। इस मामले में कांग्रेस हो या भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी हो या बहुजन समाज पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल हो या जनता दल (एकी), द्रमुक हो या अन्नाद्रमुक- किसी में कोई फर्क नहीं है। जहां तक भ्रष्टाचार का सवाल है, अब लगता है कि चंद्रशेखर सही कहते थे कि यह कोई मुद्दा ही नहीं है।

न ही किसी की जनता के प्रति जवाबदेही है। जनलोकपाल की दुहाई देकर सत्ता में आने के साढ़े पांच माह बाद भी अरविंद केजरीवाल ने अपनी सरकार के लिए लोकपाल नियुक्त करने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया है। मीडिया के कंधों पर चढ़ कर सत्ता में आने वाली आम आदमी पार्टी की सरकार ने शासन की बागडोर अपने हाथों में लेने के बाद सबसे पहला काम यह किया कि दिल्ली सचिवालय को पत्रकारों की पहुंच से बाहर कर दिया। हुक्म जारी किया गया कि संवाददाता सम्मेलन के जरिए ही जानकारी दी जाएगी। अब इसी तर्ज पर केंद्रीय गृह मंत्रालय ने फरमान निकाला है कि पत्रकार मंत्रालय के अफसरों से नहीं मिल सकेंगे। उन्हें केवल मंत्रालय के प्रवक्ता से जानकारी प्राप्त करने का अधिकार होगा। यह लोकतंत्र का दम भरने वाली पार्टियों की पारदर्शिता है!

प्रेस पर अंकुश लगाना सभी पार्टियों का लक्ष्य बन गया है। केजरीवाल की तरह राजीव गांधी भी लोकसभा में अभूतपूर्व बहुमत प्राप्त करके सत्ता में आए थे। लेकिन सत्ता में आने के थोड़े समय बाद ही जगन्नाथ मिश्र का प्रेस संशोधन विधेयक सामने आ गया, जिसमें प्रेस के पर कतरने की पूरी-पूरी व्यवस्था की गई थी। जब देश भर में इसका व्यापक विरोध हुआ, तभी इसे वापस लिया गया। कांग्रेस की एकाधिकारवादी प्रवृत्तियां जगजाहिर हैं। लेकिन उसका विरोध करने वाली पार्टियां भी लोकतंत्र की पोषक नहीं हैं। भारतीय लोकतंत्र का यह दुर्भाग्य है कि इसके ढांचे के भीतर काम करने वाली राजनीतिक पार्टियां ही इसकी मूल भावना पर आघात करती हैं।

सभी जानते हैं कि ऐसे समय जब बेरोजगारी बढ़ रही हो और आर्थिक संकट गहराता जा रहा हो, युवाओं के सामने भविष्य की कोई आशा या दिशा न हो और अराजकता की स्थिति पैदा हो रही हो, तब लोकतंत्र-विरोधी ताकतों को पनपने का सबसे अच्छा मौका मिलता है। इस समय देश की राजधानी दिल्ली में जानबूझ कर अराजकता की स्थिति पैदा की जा रही है और यह सब केंद्र सरकार के इशारे पर किया जा रहा है। इसका मकसद पिछले विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को मिले अभूतपूर्व जनादेश को निरस्त करके जनता द्वारा निर्वाचित सरकार को निरर्थक और नाकारा बना देना है।

इस समय मोदी समर्थक तर्क दे रहे हैं कि दिल्ली की सरकार हकीकत में एक ‘महिमामंडित महानगरपालिका’ है, जिसके अधिकार क्षेत्र में न तो पुलिस है, न कई हिस्सों में बंटा हुआ दिल्ली नगर निगम और न ही दिल्ली विकास प्राधिकरण। इसलिए केजरीवाल का विरोध प्रदर्शन नौटंकी से अधिक कुछ नहीं है। उधर उपराज्यपाल ने एक हैरतअंगेज फरमान जारी करके कहा है कि वही दिल्ली सरकार हैं। इस समय दिल्ली सरकार किसी भी स्तर पर कोई भी नियुक्ति नहीं कर सकती, क्योंकि ज्यों ही कोई नियुक्ति होती है, उपराज्यपाल नजीब जंग उसे तत्काल निरस्त कर देते हैं।

अगर दिल्ली सरकार के पास कोई अधिकार ही नहीं है, तो जनता का इतना अधिक पैसा खर्च करके यहां विधानसभा क्यों बनाई गई है? इसमें मंत्री और मुख्यमंत्री क्यों हैं? चुनाव कराने पर इतना पैसा और समय क्यों जाया किया जाता है? और सबसे बड़ी बात, नरेंद्र मोदी जैसा प्रतापी प्रधानमंत्री महानगरपालिका के चुनाव में ऐसा धुआंधार प्रचार करने क्यों निकल पड़ता है? क्या केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी केजरीवाल सरकार से चुनाव में मिली शर्मनाक हार का बदला नहीं ले रही, जिसमें उसे सत्तर में से सिर्फ तीन सीटें हासिल हुर्इं, जबकि शेष सड़सठ आम आदमी पार्टी के हिस्से में आर्इं? क्या बदले की यह राजनीति लोकतंत्र की भावना के अनुरूप है?

आज स्थिति यह है कि देश के सर्वाधिक सम्मानित पुलिस अफसरों में से एक जूलियो रिबेरो को लेख लिख कर न्यायपालिका से अनुरोध करना पड़ता है कि वह तीस्ता सीतलवाड़ को जेल में डालने के अभियान को रोकने के लिए हस्तक्षेप करे। आज स्थिति यह है कि माया कोडनानी, सलमान खान और बाबू बजरंगी जैसों को अदालत से जमानत मिल सकती है, लेकिन केवल आर्थिक अपराध के आरोप का सामना कर रही तीस्ता सीतलवाड़ और उनके पति जावेद आनंद को नहीं। मुंबई की सीबीआइ अदालत ने उनकी अग्रिम जमानत की याचिका खारिज कर दी है। उसने उन्हें ‘राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा’ बताया है।

भारतीय समाज में सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय को गालियां देने वाले और रोज उन्हें पाकिस्तान भेजने या बंगाल की खाड़ी में डुबोने की धमकी देने वाले तो देश के लिए खतरा नहीं हैं, लेकिन गुजरात दंगों के पीड़ितों के लिए काम करने वाले देश के लिए खतरा हैं। यहां मैं यह स्पष्ट कर दूं कि तीस्ता सीतलवाड़ और जावेद आनंद दोषी हैं या निर्दोष, इस बारे में मैं कोई राय व्यक्त नहीं कर रहा हूं। उन्हें दोषी या निर्दोष करार देना अदालत का काम है। मुझे आपत्ति सिर्फ इस पर है कि गुजरात सरकार और सीबीआइ जिस जोशोखरोश के साथ उन्हें जेल की सलाखों के पीछे डालने के लिए कमर कसे हुए हैं, वह किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए शर्मनाक है। यह आने वाले खतरे का संकेत भी है, क्योंकि इससे पता चलता है कि आगे और कैसे ‘अच्छे दिन’ हमारा इंतजार कर रहे हैं। इन ‘अच्छे दिनों’ में न नागरिकों के पास निजता का अधिकार रह जाएगा, न न्यायपालिका को स्वतंत्रतापूर्वक बिना राजनीतिक हस्तक्षेप के जजों को नियुक्त करने का अधिकार और न ही रिजर्व बैंक के गवर्नर को मुद्रा-नीति पर निर्णय करने का अधिकार। विश्वविद्यालयों को तो पहले ही सरकारी विभागों में तब्दील किया जा चुका है, अब इनकी बारी है।

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