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अवलोकन : हवा में विमर्श

रमेश दवे स्त्री-विमर्श बीसवीं सदी की संतान है। बीसवीं सदी ने विमर्श तो रचा, विश्व स्त्री सम्मेलन किए, राजनीतिक पद दिए, स्त्री के संतान जनने को गौरव प्रदान किया, सरकारी नौकरियों के दरवाजे खोले और विकसित देशों में स्त्री घर से बाहर भी निकल पड़ी, पर प्रश्न है कि क्या विमर्शों से स्त्री की व्यथा […]

Author July 26, 2015 3:50 PM

रमेश दवे

स्त्री-विमर्श बीसवीं सदी की संतान है। बीसवीं सदी ने विमर्श तो रचा, विश्व स्त्री सम्मेलन किए, राजनीतिक पद दिए, स्त्री के संतान जनने को गौरव प्रदान किया, सरकारी नौकरियों के दरवाजे खोले और विकसित देशों में स्त्री घर से बाहर भी निकल पड़ी, पर प्रश्न है कि क्या विमर्शों से स्त्री की व्यथा समाप्त हुई या वह केवल विमर्श-कथा में समा गई?

भाषा-विज्ञान में एक सिद्धांत है कि कोई शब्द जब अति-उपयोग में आता है तो वह अपनी अर्थशक्ति खोने लगता है। स्त्री-विमर्श अब महानगरीय या नगरीय संगोष्ठियों का अकादमिक फैशन बन गया है। विमर्श से सशक्तीकरण केवल उनका हुआ, जो संगोष्ठी आयोजित करते हैं, विश्वविद्यालयों में विभाग खोलते, एनजीओ चलाते, राजनीति करते, प्रशासनिक पदों पर होते और सरकारों द्वारा गठित आयोगों की सजावट बनते हैं। ऐसी स्त्रियां सार्वजनिक रूप से अपने को सक्षम, सशक्त और समानतावादी मान कर पुरुष वर्चस्व से मुक्ति का एलान तो करती हैं, लेकिन वे कितनी सशक्त या सक्षम अपने घर-परिवार में होती हैं, अगर इसका सत्यापन किया जाए तो स्त्री की स्थिति की सही तस्वीर सामने आ सकती है।

शहरी स्त्रियों के औपचारिक समूह बालिका-शिक्षा, स्त्री-साक्षरता और सामाजिक समानता के जो भी प्रयत्न करते हैं, वे केवल राजनीतिक समर्थ के परिणाम होते हैं। पंचायतों में स्त्री प्रतिनिधित्व भले तैंतीस या पचास प्रतिशत कर दिया जाए, उनके कार्यों का संचालन पति या शक्तिशाली परिजन ही करते हैं। क्या पंचायतों में प्रतिनिधित्व से स्त्री कार्य में, अन्याय और उत्पीड़न के विरुद्ध सशक्त हुई, पुरुष-पराधीनता से मुक्त हुई, तरह-तरह की हिंसाओं का प्रतिकार कर सकी, क्या अपनी निर्णय लेने की क्षमता और पुरुष मानसिकता के विरुद्ध स्त्री-संवेदना की स्थापना कर सकी?

स्त्री-विमर्श में अक्सर वही उदाहरण दिए जाते हैं, जो स्त्रियां पढ़-लिख कर बौद्धिक कहलाने लगती हैं, लेखक या पत्रकार बन जाती हैं, राजनीतिक पद हासिल कर लेतीं, राजनीति में भाग लेतीं या सरकारी पदों और पूंजीपति कॉरपोरेट घरानों की नौकरी से अपनी शक्ति का प्रदर्शन करती हैं। वही संगोष्ठी करतीं, महिला दिवस मनातीं या सम्मेलन करतीं, सरकारी धन से विदेश यात्राएं करतीं और समानता के नए-नए नारे रचती हैं।

स्त्री-सशक्तीकरण पर पुस्तक लिखने वाले, संगोष्ठियों में परचे पढ़ने वाले, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आंकड़ों के जादू के साथ रिपोर्ट देने वाले पुरुष, घरों, दफ्तरों, यहां तक कि राजनीति में कितने स्त्री-संवेदी या समानतावादी हैं, इसका पता चलता है जब वे नेता स्त्रियों को लेकर औघड़ बयान देते हैं। दफ्तरों, औद्योगिक घरानों, फिल्मी दुनिया, सार्वजनिक क्षेत्रों में स्त्री के यौन-शोषण के समाचार पैदा होते हैं, साधु-संतों के वासना-व्यक्तित्व उजागर होते हैं, खेलों में कोच और कला की दुनिया में गुरुओं के पाखंड प्रगट होते हैं। यह सब तो मीडिया की स्टिंग-दृष्टि, स्त्रियों के साहसी बयानों से ब्रेकिंग न्यूज बन कर आमजन तक पहुंचता है, लेकिन उन तथ्यों का क्या हश्र, जो अदृश्य घटित होते हैं, और उनमें सारी स्त्री-संवेदना और समानता के आदर्श भी अदृश्य रह जाते हैं।

यूरोप और अमेरिका में तमाम आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक समानता के दावों के बावजूद वहीं सर्वाधिक समानतावादी, स्त्रीवादी या मुक्तिवादी आंदोलन, अभियान, संगोष्ठी और विमर्श होते हैं। पर वहां भी स्त्री आज तक पुरुष की समकक्षता हासिल नहीं कर पाई है। सभ्यता का दावा करने वाले अगर स्त्री-संवेदना में पिछड़े कहे जाने वाले देशों से भी पिछड़े हैं, तो क्या यह उनकी तथाकथित समानता की पोल नहीं खोलता? उन देशों के लिए तो स्त्री मात्र उपभोक्ता या उपभोग की वस्तु आज तक बनी हुई है।

जो देश, विकासशील या अविकसित देशों में सशक्तीकरण और स्त्री-संवेदन या समानता की चर्चा करते हैं वे भी तो अपने गिरेबान में झांक कर देखें। सदियों से स्वतंत्र और लोकतांत्रिक कहे जाने वाले देशों में क्या सभ्यता के परदे में यौन अपराध, स्त्री-हिंसा और असमानता से उत्पन्न तलाक से पैदा होने वाले अपराध नहीं होते? आर्थिक आजादी के बावजूद क्या विकसित देशों में स्त्री-पुरुषों के वेतन समान हैं, उनका राजनीतिक और सामाजिक स्तर बराबरी का है? क्या कारण है कि संसदीय परंपरा का गुणगान करने वाले यूरोप में सदियों तक स्त्री को मताधिकार नहीं दिया गया था?

शहरों में तो फिर भी स्त्री-चेतना के कुछ स्वर सुनाई पड़ते हैं, पर गांवों में कहां है स्त्री बराबर या स्वतंत्र? वह घर में बंधुआ मजदूर है, खेत में खेतिहर मजदूर है, रोजगारों में यौन-शोषण का शिकार है और उसका गरीब होना तो जैसे हर प्रकार से शोषण ही शोषण!

वह आज भी अधूरी आजादी ठीक से नहीं जी पा रही। शहरी बौद्धिकता का बाना पहने स्त्री खुद अपने पर विमर्श कर ले, कवि, कथाकार, पत्रकार, लेखक बन जाए, इंजीनियर, डॉक्टर, वकील, जज, कॉरपोरेट मैनेजर-डायरेक्टर कुछ भी हो जाए, क्या कभी किसी विमर्श में स्त्री को फर्स्ट-सेक्स और पुरुष को सेकेंड-सेक्स कहा गया? क्या विज्ञान के अन्वेषणों ने भी स्त्री से न्याय किया? ऐसी मशीन ही क्यों खोजी, जो भ्रूण परीक्षण के बाद स्त्री-भ्रूण का हत्यारा समाज पैदा करे? ऐसा समाज किस क्रांति का सबूत है, जिसमें स्त्री के लिए आॅनर किलिंग होते हों?

स्त्री-विमर्श से न शिक्षा बदली, न पुरुष वर्चस्व के मूल्य बदले, न वातावरण बदला, न व्यवहार। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो आज भी पुरुष में स्त्री-संवेदन पैदा ही नहीं हुआ है। स्त्री आज भी दहेज की देहरी पर घायल या मृत पड़ी है, व्यवसायों में पिछड़ी है, पढ़े-लिखे समाज या परिवार में पुत्र ही कुलदीपक है, पुत्र-लालसा हावी है, पुरुष ही निर्णयकर्ता है। न घर में बदला न बाहर। बदला है तो केवल यह कि पहले स्त्री बहस में नहीं थी, अब है, मगर सिर्फ बहस में, जीवन में उसकी जगह बहुत बड़ी नहीं बनी है।

विमर्श आधुनिक और उत्तर-आधुनिक समय का बौद्धिक बाजार है, जिसमें स्त्री विज्ञापन भी है, वस्तु भी, व्यवसाय भी है और वासना भी। स्त्री के लिए शक्ति, देवी, माता आदि पर्यायवाची खोजे भले गए हों, पर अगर स्त्री को लेकर दुनिया भर में अपराध हो रहे हैं तो उसके शक्ति, देवी, माता होने का मतलब ही क्या?

विमर्श केवल परचे पढ़ने, भोज और हवाई यात्राओं के शौक बन गए हैं। उनसे कोई बड़ी विचार-क्रांति या व्यवहार क्रांति आज तक नहीं हुई। स्त्री-विमर्श तब सार्थक होगा, जब विमर्शकार फर्श पर आएं, गांव-गांव जाएं, स्त्री की दुर्दशा देख कर उसे मुक्त करें और ऐसा तंत्र पैदा करें, जो सरकार हो या समाज सभी जगह स्त्री के प्रति सम्मानजनक हो और उसे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भरता का स्वाभिमान दे सके।

स्त्री को किसी समाजवाद, साम्यवाद, धर्मवाद और नैतिकता के गज से न नापा जाए। उसे उसके संपूर्ण मनुष्य होने में देखा जाए। स्त्री-विमर्श में स्त्री की सामाजिक छवि की नई रचना करनी होगी, उसे स्वयं उसकी पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, बौद्धिक और नैतिक भूमिका चुनने और निभाने के लिए स्वतंत्र रखना होगा, उसे पुरुष-प्रभुत्व के सरकारी तंत्र, चाहे पुलिस हो, दफ्तर, कोई उपक्रम या खुद उसका घर-परिवार, सभी से सुरक्षित होने का विश्वास देना होगा। सभ्यता के सभी मापदंड ऐसे रचने होंगे, जो स्त्री-संवेदी हों, तब जाकर विमर्शों से विचार और कार्यक्रम जन्म लेंगे, वरना विमर्श केवल प्रचार के अंतरराष्ट्रीय फोरम बन कर केवल एक और विमर्श-बाजार ही पैदा करेंगे।

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