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अप्रासंगिक : जहरीली नींद के खिलाफ

अपूर्वानंद तीस्ता सीतलवाड़ के जेल जाने के मायने हैं भारत की आत्मा को कैद करना। यह कोई काव्योक्ति नहीं है। आत्मा कोई भौतिक यथार्थ नहीं है। वह सत्य को पहचानने और उसके अनुसार काम करने का साहस अर्जित करने की हमारी आकांक्षा का दूसरा नाम है। वह हमें अपनी सांसारिक क्षुद्रताओं को पहचानने और उनसे […]

Author July 26, 2015 3:50 PM

अपूर्वानंद

तीस्ता सीतलवाड़ के जेल जाने के मायने हैं भारत की आत्मा को कैद करना। यह कोई काव्योक्ति नहीं है। आत्मा कोई भौतिक यथार्थ नहीं है। वह सत्य को पहचानने और उसके अनुसार काम करने का साहस अर्जित करने की हमारी आकांक्षा का दूसरा नाम है। वह हमें अपनी सांसारिक क्षुद्रताओं को पहचानने और उनसे सीमित हो जाने पर लज्जित हो पाने की क्षमता है। आत्मा क्या है, यह आपको तब मालूम होगा, जब आप सीबीआइ के अधिकारियों से अकेले में बात करें और तीस्ता के साथ इस संस्था के व्यवहार पर उनकी प्रतिक्रिया सुनें। वे जो कर रहे हैं, उसकी अनैतिकता का उन्हें पूरा अहसास है। वे जानते हैं कि अपनी आत्मा को कुचल कर ही वे तीस्ता के साथ वह कर सकते हैं, जो अभी वे कर रहे हैं।

कई बार अपनी आत्मा को सुनना भी कठिन होता है। जब वह क्षमता भी हमसे जाती रहे, तब संपूर्ण विनाश के अलावा और कुछ नहीं। क्या भारतीय समाज की आत्मा या उसका अंत:करण पूरी तरह निष्क्रिय हो चुका है? पहले भी कई बार जब ऐसा लगा, कोई न कोई संस्था उठ खड़ी हुई है और उसने भारत की आत्मा के जीवित होने का प्रमाण दिया है। गुजरात जनसंहार की गंभीरता का अहसास जब संसद तक में न दिखाई दिया, जो भारत की जनता की प्रतिनिधि संस्था है, तब मानवाधिकार आयोग ने इसको नोटिस लिया।

लेकिन ध्यान रहे कि मानवाधिकार आयोग खुद-ब-खुद सक्रिय नहीं हो गया था। अनेक व्यक्तियों के, जिनमें तीस्ता सीतलवाड़ शामिल थीं, 2002 में खूरेंजी के बीच गुजरात जाकर उस भयंकर अपराध की शहादतें और सबूत इकट्ठा करने और उनकी रिपोर्ट बनाने के चलते ही आयोग को आधार मिला कि वह गुजरात खुद जाए और देखे कि आजाद भारत में कैसे राज्य का तंत्र ही अपने नागरिकों के एक हिस्से की हत्या और विस्थापन में शामिल है।

हत्याएं हुई थीं, बलात्कार हुए थे, लोग अपने घरों और इलाकों से विस्थापित किए गए थे। यह कोई कुदरती हादसा नहीं था और न हिंदू क्रोध का स्वत:स्फूर्त विस्फोट। इस अपराध में संगठन शामिल थे, सरकार के लोग शामिल थे, पुलिस और प्रशासन की खुली भागीदारी के बिना यह मुमकिन नहीं था। अगर यह अपराध था तो क्या अपराधियों की शिनाख्त करना, उन्हें भारत के कानून के मुताबिक उनके किए की सजा देना जरूरी नहीं था? क्या इसके बिना जनसंहार के शिकार लोगों को इंसाफ मुमकिन था? यह बहुत स्पष्ट था कि गुजरात सरकार और वहां के राजकीय तंत्र की इसमें कोई रुचि न थी। वह इसे एक भूकम्प, सुनामी, तूफान की तरह का हादसा मान कर इसे गुजर जाने देने और भूल जाने की वकालत कर रहा था।

गुजरात सरकार की बेरुखी का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि उसने मानवाधिकार आयोग की 2002-03 की रिपोर्ट को विधानसभा के पटल पर रखने में दस साल लगाए और वह भी तब जब गुजरात उच्च न्यायालय ने उसे फटकार लगाई। इस रिपोर्ट में आयोग ने खासकर साबरमती संहार, गुलबर्ग सोसाइटी संहार, नरोदा पाटिया, बेस्ट बेकरी और सरदारपुरा के संहारों की जांच सीबीआइ से कराने की सिफारिश की थी। गुजरात सरकार ने ऐसा करने से इनकार कर दिया था। यह रिपोर्ट भी विधानसभा सत्र के आखिरी दिन पेश की गई, ताकि इस पर कोई बहस न हो सके। तब की गुजरात सरकार का मुखिया ही आज भारत सरकार का मुखिया है।

तीस्ता का जुर्म यह था कि उन्होंने कई अन्य मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के साथ मिल कर इन तमाम अपराधों का पीछा किया। तीस्ता ने न्यायतंत्र को सोने न दिया और इंसाफ के लिए जरूरी सबूत बचाए और गवाहों को टिकाए रखने में अथक श्रम किया। कई मामले उनकी वजह से गुजरात से बाहर की अदालतों में गए। और अनेक मामलों में इंसाफ हुआ। मैं साहस की बात नहीं कर रहा, क्योंकि जो गुजरात नहीं गए हैं, वे समझ ही नहीं सकते कि गुजरात में इस जनसंहार की बात करने भर के लिए किस दिल-गुर्दे की जरूरत थी।

गुजरात जाने वालों में तीस्ता अकेली शख्स न थीं। लेकिन वे इस मुसलिम विरोधी संहार में कानूनी इंसाफ के लिए लड़ने वाले चंद लोगों में शामिल हैं। इन सारे लोगों को, जो भारत के अलग-अलग हिस्सों से गुजरात गए, गुजरात-विरोधी घोषित किया गया और इनके खिलाफ घृणा-प्रचार चलाया गया। गुजरात के प्रबुद्ध समाज के मुट्ठी भर लोग ही गुजराती राष्ट्रवाद से मुक्त होकर इनके साथ आने का साहस जुटा पाए और वे भी गुजरात के गद्दार घोषित किए गए।

कानून का शासन अपने आप नहीं स्थापित होता। यह जिम्मेदारी सिर्फ राजकीय निकायों की नहीं है। राज्य के मूल दमनकारी चरित्र से परिचित लोग जानते हैं कि राज्य प्राय: वर्चस्वशाली समूहों का हितसाधन करता है। पूंजी के खिलाफ श्रम, ‘उच्च’ जातियों और ‘निम्न’ जातियों, बहुसंख्यक धार्मिक समूह और अल्पसंख्यक समूह के प्रसंग में उसके आचरण से यह साफ हो जाता है। इसलिए ऐसे लोगों की, समूहों की जनतंत्र में भी जरूरत बनी रहती है, जो राज्य को न्याय के लिए मजबूर करें। उन्नीस सौ चौरासी के शिकारों को क्यों न्याय नहीं मिला? क्यों रामशिला पूजन अभियान और रामजन्म भूमि अभियान के दौरान और उनके चलते हुए खूनखराबे के अपराधी न सिर्फ बच निकले, बल्कि देश की सत्ता पर काबिज भी हुए? क्योंकि हमारे पास पर्याप्त संख्या में तीस्ता सीतलवाड़ नहीं हैं।

गुजरात में कोई चार सौ मामलों में जुर्म तय हुआ और मुजरिमों को सजा हुई। दिलचस्प है कि इस संख्या को तमगे की तरह गुजरात राज्य दिखाता फिरता है, साबित करने को कि वह कितना न्यायप्रिय है। इस संख्या के पीछे तीस्ता सीतलवाड़, मुकुल सिन्हा और जाने कितने लोगों की दिन-रात की मेहनत है और यह गुजरात राज्य के चलते नहीं, उसके बावजूद हुआ है सीबीआइ (?) कहती है कि तीस्ता राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है। इससे बड़ा मजाक नहीं सुना गया होगा। अगर संघ परिवार, भारतीय जनता पार्टी की विभाजनकारी राजनीति और अन्य दलों की भीरुता के बावजूद भारत में अल्पसंख्यकों का यकीन बना हुआ है और सुरक्षित रहा है तो तीस्ता जैसों की जमात की वजह से। अगर भारत के हिंदू खुद को मानवीय कह पा रहे हैं, तो तीस्ता जैसों के कारण।

तीस्ता अभिजात वर्ग की ही सदस्य हैं। वे अंगरेजी फर्राटे से बोल-लिख सकती हैं, अभिजन-व्यवहार से परिचित हैं। शौक से पहनती-ओढ़ती हैं और उन्होंने कभी दीनता या गरीबी का अभिनय नहीं किया। क्या इस वजह से अभिजात वर्ग और मध्यवर्ग मन ही मन तीस्ता से घृणा करता है? क्या तीस्ता सीतलवाड़, शबनम हाशमी, कविता श्रीवास्तव, सीके जानु, माधुरी, दयामनी बारला शिक्षित समुदाय को लगातार याद दिलाती हैं कि शिक्षा जो उन्होंने अर्जित की है, वह आत्मोत्थान के लिए, उदर-शिश्न-सीमित जीवन के लिए नहीं। वह सिर्फ उनका अर्जन नहीं। उस पर इस देश के गरीबों का, जो उनके तरह सुसंस्कृत नहीं कहे जाते, हक है। यह शिक्षा दरअसल इंसाफ के लिए है।

क्या तीस्ता को हम सब अपनी नजर से दूर कर देना चाहते हैं, क्योंकि वे विजयदेव नारायण साही की तरह ही हमें सोने नहीं देतीं: ‘मुझे दिख रहा है/ दिमाग धीरे-धीरे पथराता जा रहा है/ अब तो नसों की ऐंठन भी महसूस नहीं हो रही है/ और तुम्हें सिर्फ एक ऐसी/ मुलायम सहलाने वाली रागिनी चाहिए/ जो तुम्हें इस भारीपन में आराम दे सके/ और तुम्हें हल्की जहरीली नींद आ जाए। लेकिन मेरे भाई मैं तुम्हें सोने नहीं दूंगा/ क्योंकि अगर तुम सो गए/ तो सांप का यह जहर/ तुम्हारे सारे शरीर में फैल जाएगा/ फिर कुछ लहरें आएंगी और किस्सा खत्म हो जाएगा।’

आगे भी सुनें, ‘नशा चढ़ रहा है/ …लेकिन जहां-जहां मैंने तुम्हारी नसें चीर दी हैं/ वहां से कितना काला/ खून उमड़ रहा है/ इससे यह नहीं साबित होता/ कि मैं तुम्हारे खून का प्यासा हूं…’

तीस्ता हमारी दुश्मन नहीं। वह हमारी आत्मा की पहरेदार है। हम उसे ही कैद में न डाल दें, यह सोच कर कि उसकी पुकार हमारी नींद में खलल है। ऐसी नींद में चैन का भ्रम है, लेकिन है वह निश्चय ही हमारी अंतिम मृत्यु।

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