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कभी-कभार : साहित्य पर नजर

अशोक वाजपेयी हमारा समय विशेषीकरण का है: वह इस चरम पर पहुंच चुका है कि एक ही अनुशासन के अंतर्गत आने वाले कई क्षेत्र इस कदर विशेषीकृत और स्वायत्त हो गए हैं कि उनका आपस में कोई संवाद या संपर्क नहीं रह गया है। दूसरी ओर, कुछ अनुशासनों या शक्तियों का इस कदर आतंक है […]

Author July 26, 2015 4:08 PM

अशोक वाजपेयी

हमारा समय विशेषीकरण का है: वह इस चरम पर पहुंच चुका है कि एक ही अनुशासन के अंतर्गत आने वाले कई क्षेत्र इस कदर विशेषीकृत और स्वायत्त हो गए हैं कि उनका आपस में कोई संवाद या संपर्क नहीं रह गया है। दूसरी ओर, कुछ अनुशासनों या शक्तियों का इस कदर आतंक है कि उनकी नजर बाकी सब पर रहती है कि कैसे वे उनका उपयोग या शोषण या विनियोजन कर सकें। इनमें राजनीति, विज्ञान और धर्म प्रमुख हैं। इन सभी को समग्रशील, लगभग पूर्ण और सर्वग्रासी होने का शौक-सा है। उनकी नजर साहित्य पर भी रहती है।

साहित्य अपने स्वभाव से ही खुला, कुछ ढीला-ढाला अनुशासन है, जिसमें अनेक तत्त्व और दृष्टियों, अनेक विचारों और खोजों को जगह मिलती है। राजनीति और साहित्य का संबंध पुराना है और हमारे समय में भी राजनीति ने जब मौका मिला उस पर हावी होने की कोशिश की है। विचारधारा, क्रांति, मुक्ति आदि के नाम पर राजनीति ने साहित्य को अपना उपनिवेश बनाने का उपक्रम भी किया है।

फौरी तौर पर इस कोशिश में राजनीति को भले सफलता का कुछ भ्रम या संतोष हुआ हो, अंतत: वह साहित्य से निराश ही हुई है, क्योंकि वह उसका आतंक या दासता स्वीकार नहीं कर पाता। राजनीति की हमारे समाज में साहित्य के प्रति जो उदासीनता है उसका कम से कम एक कारण यह है कि साहित्य पर वह भरोसा नहीं कर पाती। विशेषत: सर्वसत्तावादी राजनीति का (फिर वह किसी भी नाम से क्यों न की जाती हो) साहित्य जम कर, जरूरी हो तो छिप कर, कड़ा विरोध ही करता है और उसकी अपराजेयता में निर्णायक टोंकड़ लगाता है। यह पहचानना जरूरी है कि धीरे-धीरे साहित्य अब राजनीति का प्रतिपक्ष हो गया है।

विज्ञान ने साहित्य पर प्रामाणिकता का दबाव डाला है: उस पर तथ्य, तर्क और सुसंगति का आधिपत्य-सा है। साहित्य अपना सच कल्पनाशीलता से पाता है। विज्ञान स्वयं कल्पनाशीलता का सहारा लेता है, लेकिन अपने से बाहर कहीं उसे कल्पना मान्य नहीं। ऐसे में साहित्य पर यथातथ्ता का प्रभाव बढ़ना शुरू हुआ है। लेकिन अंतत: साहित्य तथ्यों पर नहीं, कल्पना द्वारा पकड़े गए सत्य पर आधारित होता है। वह विज्ञान के बहुत काम नहीं आता।

धर्म सदियों से साहित्य को प्रेरित करता रहा है। प्राय: उसमें आस्था पर आग्रह होता है और साहित्य इधर आस्था से कम, उसमें आई दरारों से अधिक उपजता रहा है। दुर्भाग्य से इधर प्राय: सभी धर्म अपने बुनियादी अध्यात्म से विरत होकर हिंसा, आक्रामकता आदि की ओर मुड़ गए हैं। ऐसे में साहित्य उन्हें न सिर्फ प्रश्नांकित करता है, बल्कि वहां से बहिष्कृत अध्यात्म का शरण्य बनता रहा है। विराट की कल्पना, उससे तदाकार होने की आकांक्षा अब धर्मों से लगभग गायब हो चुकी है और उसका नया घर साहित्य है। अब धर्म नहीं, साहित्य बताता-जताता है कि हममें और दूसरों में कोई फर्क नहीं है, कि दूसरों के बिना न हम चल सकते हैं, न दुनिया।

साहित्य की असली स्वायत्तता ही उसे किसी दुर्विनियोजन या शोषण का प्रतिरोध करने की शक्ति देती है। यह उसे समाज या संसार या समय से अलग-थलग नहीं, बल्कि उसमें अपने ढंग से धंस-रम कर अपना सच रूपायित करने का आग्रह है। साहित्य की स्वतंत्रता को उसकी स्वायत्तता ही बचाती है।

उरई के रामशंकर:

कुछ बरस पहले मैत्रेयी पुष्पा के न्योते पर उरई गया था। हिंदी साहित्य के बहुकेंद्रिक भूगोल में उरई एक केंद्र नहीं है। एक कस्बा है, जहां कुछ साहित्यप्रेमी लोग हैं, कुछ लेखक भी। लेकिन वे इतने नहीं हैं कि एक केंद्र मान लिया जाए। पर वहां बांग्ला से हिंदी अनुवाद करने का अथक अध्यवसाय करने वाले रामशंकर द्विवेदी रहते हैं। पिछली अधसदी में द्विवेदीजी ने बांग्ला गद्य का बहुत मनोयोग से हिंदी में अनुवाद किया है: किसी हिंदीतर भाषा से हिंदी में अनुवाद करने वाला उनके पाये का दूसरा लेखक नहीं है।

हाल ही में साहित्य अकादेमी से उनके हिंदी अनुवाद में विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय की पुस्तक ‘विभूतिभूषण की अरण्यगाथा’ दो खंडों में प्रकाशित हुई है: लगभग 850 पृष्ठ हैं। बांग्ला गद्य की उनकी अनूदित लगभग दो दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हैं और अस्सी के निकट की आयु में पहुंच रहे रामशंकरजी अब भी पूरी समझ, संवेदना और ऊर्जा के साथ सक्रिय हैं। बांग्ला हलकों में मैंने कई बार रामशंकरजी का नाम आदर और आत्मीयता से लिए जाते सुना है।

अनुवादक से अलग द्विवेदीजी कविता के बहुत संवेदनशील, सतर्क और रसिक पाठक भी हैं। मुझे इसका विशेष पता न था। एक दिन वे प्रगट हुए। उन्होंने मेरे एक कविता संग्रह को लेकर कई टिप्पणियां और प्रश्न तैयार कर रखे थे। इस बात ने मुझ जैसे नीचट पुस्तकप्रेमी और कविता के कुख्यात और निर्लज्ज पक्षधर को चकित किया कि उन्होंने शुद्ध कविता के अनुरागवश कितने ध्यान और सूक्ष्मता से कविताएं पढ़ी थीं।

उन्होंने कई कविताओं के ऐसे आशय भी इंगित किए, जिनका स्वयं उनका कवि होते हुए मुझे अनुमान या पता या अंदेशा नहीं था। उनसे मिल कर यह फिर समझ में आया कि कविता जितनी कवि की संपदा है उतनी ही उसके सच्चे-गहरे रसिक पाठक की भी। ऐसा पाठक कविता में अपने अर्थ की खोज से इजाफा करता है और कविता की संभावना बढ़ाता है।

इधर इन्होंने मुझे अपने एक पुराने कविता संग्रह ‘आविन्यों’ के बारे में अपनी डायरी में दर्ज टिप्पणियां और लंबी प्रश्नावली भेजी। ऐसे पाठक हों, भले कम, तो हमारे इस अभागे और लगभग कविता-विरोधी समय में, कवि का मनोबल बढ़ता है- यह सुखद अहसास होता है कि कविता लिखना अकारथ नहीं गया!

यह भी उल्लेखनीय है कि यह सब द्विवेदीजी उरई जैसे कस्बे में रह कर करते रहे हैं। शायद हम इस बात का कम एहतराम करते हैं कि भले साहित्य लिखने वाले बड़े केंद्रों में जमा हो गए हैं, उनके सच्चे पाठक और रसिक छोटी जगहों में हैं। साहित्य दिल्ली में मैटर नहीं करता, पर उरई, रायगढ़, शहडोल आदि में मैटर करता है!

लगभग दो दशक:
जल्दी ही यानी कुछ सप्ताहों में ‘कभी-कभार’ स्तंभ को चलते, निर्बाध और अविराम, अठारह बरस पूरे हो जाएंगे। साहित्य, कलाओं, संस्कृति आदि को लेकर शायद ही कोई और स्तंभ हिंदी में इतना लंबा चला हो। इस दौरान लगातार कई जगहों से या में ऐसे लोग मिलते-बतियाते रहते हैं, जिन्हें कोई टिप्पणी या विचार अच्छा लगा या ठीक नहीं लगा। लगभग छह पुस्तकों में इस स्तंभ की कुछ सामग्री संकलित होकर प्रकाशित हो चुकी है। चारेक पुस्तकों भर सामग्री का नबेरा-एकत्र किया जाना और प्रकाशित होना बाकी है। कई हितैषी यह कह कर मेरा हौसला बढ़ाते रहे हैं कि यह हमारे समय का अनौपचारिक सांस्कृतिक इतिहास लिखा जा रहा है।

यह सब संभव हुआ तो इसमें ‘जनसत्ता’ अखबार की बड़ी भूमिका रही है। वह इस समय हिंदी का एकमात्र अखबार है, जिसमें भाषा, साहित्य और कलाओं, वैचारिक बहुलता आदि को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है, उनको जगह मिलती है: उसके वैचारिक खुलेपन ने ही उसे एक ऐसी जगह बनाया है, जहां तरह-तरह के विषयों पर खुल कर बहसें होती रहती हैं। हर रविवार उसके अंदर के दो पृष्ठों में जो छपता है वह हिंदी जगत का ध्यान आकर्षित करता है।

‘जनसत्ता’ ने अपने को अभिनेताओं-राजनेताओं-खिलाड़ियों की नायक-छवियों से आक्रांत नहीं होने दिया है। इस समय ज्यादातर मीडिया द्वारा हिंदी भाषा जिस कदर बेशर्मी और गैर-जिम्मेदारी से विकृत-भ्रष्ट की जा रही है, उसके बरक्स ‘जनसत्ता’ ही ऐसा अखबार है, जिसमें साफ-सुथरी और संप्रेषणीय हिंदी की छटा लगातार देखी जा सकती है। ऐसी वैचारिक रूप से बहुल, सजग और खुली ‘जनसत्ता’ में ही ‘कभी-कभार’ जैसे स्तंभ की जगह हो सकती थी। उसकी यत्किंचित आभा का एक स्रोत स्वयं इस अखबार की अपनी सौम्य आभा रही है।

अठारह वर्षों में मुझे एक भी अवसर ऐसा याद नहीं आता जब इस दौरान उसके दो संपादकों ने, अच्युतानंद मिश्र (दो वर्ष) और ओम थानवी (सोलह वर्ष) ने कभी कोई हस्तक्षेप किया हो या किसी अंश पर पुनर्विचार करने को कहा हो। मुझे खूब पता है कि कई बार वे कुछ मामलों में मेरे रुख या विचार से सहमत नहीं होते थे। पर उन्होंने मुझे पूरी स्वतंत्रता दी। आजकल मीडिया, शिक्षा और संस्कृति के सार्वजनिक या निजी संस्थानों तक में ऐसी स्वतंत्रता मिलना लगभग असंभव है। जैसा कि एक मित्र ने हाल में कहा यह स्तंभ समकालीन बौद्धिक और सर्जनात्मक हिंदी जगत में ‘दूसरी आवाज’ बन कर उभर पाया तो उसका श्रेय ‘जनसत्ता’ की यशस्वी, स्वतंत्रता और बहुलता का सम्मान करने वाली उज्ज्वल परंपरा को जाता है।

यह दूसरी आवाज भरसक आलोचनात्मक, लोकतांत्रिक और आत्मालोचक रहे इसकी कोशिश की गई है। हमारा समय इस समय, दुर्भाग्य से, ऐसा है कि उसमें असहमति, आलोचना और प्रश्नांकन की जगह और संभावना लगातार सिकुड़ रही है। सत्ता, बाजार आदि मिल कर ऐसा माहौल बना रहे हैं, जहां इनकी और इसलिए लोकतांत्रिक मूल्यों की खास जगह न बचे। लेकिन इन सारे दबावों के बरक्स ऐसे लोग होंगे, जो उस जगह, उस आवाज को बचाने-उठाने की कठिन जिम्मेदारी में लगे रहेंगे। यह स्तंभ कभी उन्हें अलक्षित न जाने दे, यही कोशिश जारी रहेगी।

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