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पुस्तकायन : समन्वय का सेतु

अमरनाथ तुलसी और गांधी अपने-अपने क्षेत्र के महान व्यक्तित्व हैं। इन दोनों पर अनेक ग्रंथ लिखे गए हैं, तरह-तरह से उनका मूल्यांकन किया गया है। श्रीभगवान सिंह की पुस्तक तुलसी और गांधी उसी की एक कड़ी है। अब तक गांधी के व्यक्तित्व निर्माण में रस्किन और टॉलस्टॉय का विशेष योगदान माना जाता रहा है, पर […]

Author July 26, 2015 16:01 pm

अमरनाथ

तुलसी और गांधी अपने-अपने क्षेत्र के महान व्यक्तित्व हैं। इन दोनों पर अनेक ग्रंथ लिखे गए हैं, तरह-तरह से उनका मूल्यांकन किया गया है। श्रीभगवान सिंह की पुस्तक तुलसी और गांधी उसी की एक कड़ी है। अब तक गांधी के व्यक्तित्व निर्माण में रस्किन और टॉलस्टॉय का विशेष योगदान माना जाता रहा है, पर इस पुस्तक को पढ़ने के बाद स्वीकार करना पड़ेगा कि गांधी के वैचारिक निर्माण में सर्वाधिक असर तुलसी का है।

यह पुस्तक आठ अध्यायों में विभक्त है, जिनके शीर्षक हैं- ‘लोक संबद्धता’, ‘प्रजा वत्सलता’, ‘दलित पक्षधरता’, ‘नर-नारी पूरकता’, ‘वर्णाश्रम और सामाजिक समरसता’, ‘धर्म की सर्वोपरिता’, ‘समन्वय की अपरिहार्यता’, ‘रामराज्य और स्वराज्य में सादृश्यता’। इन अध्यायों में प्रतिपादित विषयों के माध्यम से लेखक ने एक ओर आज के वामपंथियों, दलित-विमर्शकारों और नारीवादियों द्वारा तुलसी पर लगाए गए विभिन्न आरोपों का तर्कों और भरपूर प्रमाणों के जरिए जवाब दिया है, तो दूसरी ओर यह भी प्रमाणित किया है कि किस तरह उक्त सभी मुद्दों पर गांधी ने तुलसी का उदारतापूर्वक प्रभाव ग्रहण किया है।

पुस्तक की ‘झरोखा’ शीर्षक भूमिका में उन्होंने अपनी स्थापनाओं का संकेत दिया है। ‘काल की दृष्टि से दोनों (तुलसी और गांधी) में एक लंबा अंतराल है, पर जहां धर्म प्रधान मध्यकाल में तुलसी राजनीति को अपने लोक सरोकारों का एक महत्त्वपूर्ण अभिन्न अंग बनाते हैं, तो आधुनिक काल में गांधी अपने तमाम राजनीतिक-सामाजिक सरोकारों में धर्म की अपरिहार्यता को स्वीकृति देते हैं। इस दृष्टि से तुलसी, गांधी की प्रभावशाली पूर्वपीठिका के रूप में सामने आते हैं, तो गांधी उनका आधुनिक राजनीतिक संस्करण बन कर।’

प्रजा प्रतिबद्धता, वर्णाश्रम और सामाजिक समरसता, धर्म की सर्वोपरिता, रामराज्य और स्वराज्य में सादृश्यता को लेकर लेखक की स्थापनाओं पर विवाद की गुंजाइश बहुत कम है। पर दलित पक्षधरता, नर-नारी पूरकता और समन्वय की अपरिहार्यता आदि अध्यायों में तुलसी और गांधी में साम्य दिखाने के लिए लेखक ने कहीं-कहीं तर्क और प्रमाण को गौण बना दिया है, विषय के प्रति श्रद्धा के कारण अपनी अवधारणाओं को थोपने का प्रयास किया है।

लोक संबद्धता वाले अध्याय में गांधी का जिक्र बहुत कम आया है। इस दृष्टि से यह अध्याय पुस्तक के विषय से अलग-थलग-सा है। दरअसल, लोक और शास्त्र के बीच अंतर्विरोध एक सामान्य और स्वीकृत अवधारणा है। इसी आधार पर हिंदी के कुछ आलोचकों ने तुलसी को शास्त्रवादी और कबीर को लोकवादी सिद्ध करने का प्रयास किया है।

श्रीभगवान सिंह ने इस मिथ को तोड़ने की कोशिश की है। उन्होंने बताया है कि वास्तव में लोक और शास्त्र में कोई अंतर्विरोध नहीं रहा, बल्कि लोक और शास्त्र दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। लेखक ने इस बात पर बिल्कुल सही आक्रोश व्यक्त किया है कि ‘कितनी बड़ी विडंबना है कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने जिस लोकमंगल के निकष पर तुलसी के काव्य को सर्वोपरि महत्त्व दिया, दूसरी परंपरा की खोज के नाम पर उसी लोक से तुलसी का रिश्ता छत्तीस का बताया जाने लगा और उसे शास्त्र सापेक्ष मनुष्य का कवि बताते हुए लोक-विरोधी सिद्ध करने की बौद्धिक कवायद की जाने लगी।’

लेखक का यह आक्षेप और उनकी स्थापना भी सही है कि तुलसी शास्त्रवादी नहीं, लोकवादी हैं, पर अपनी मान्यता की पुष्टि के संदर्भ में लेखक का यह कहना कि ‘शास्त्र बनाम लोक का विवाद पश्चिम से आई (उस) वैचारिकी का परिणाम है।’ या, ‘हमारे यहां शिष्ट या नागर साहित्य और लोक साहित्य जैसे वर्गीकरण की परंपरा नहीं रही।’ सत्य नहीं है।

दरअसल, लोक और शास्त्र, लोक साहित्य और शिष्ट साहित्य की अलग-अलग परंपराएं होती हैं और सारी दुनिया में रही हैं। जाहिर है, हमारे यहां भी रही हैं। उसे कहीं से आयातित नहीं किया गया है। एक वर्ग विभाजित समाज में ऐसा होना अनिवार्य है। हमारे यहां ब्राह्मण धर्म की प्रतिक्रिया में आया बौद्ध धर्म लोक धर्म ही था। चार्वाक सहित लोकायत परंपरा का हमारे यहां बड़ा समृद्ध इतिहास रहा है। हां, यह सही है कि लोकायत परंपरा का बहुत कम साहित्य बच पाया है, क्योंकि लोक सदा साधन विहीन होता है और व्यवस्था के प्रतिरोध में होने के कारण, शासन या शिष्ट समाज का संरक्षण भी उसे नहीं मिलता।

‘दलित पक्षधरता’ में लेखक ने दलित-विमर्श की सीमाओं का अच्छा विश्लेषण किया है। उन्होंने ‘दलित’ शब्द की ऐतिहासिक पड़ताल करते हुए बखूबी प्रमाणित किया है कि तुलसी ने बचपन में जैसा दुख झेला, भीख मांग कर पेट भरा, दर-दर की ठोकरें खार्इं, वह एक दलित का नहीं तो किसका दुख था? आज के दलित चिंतकों की समझ पर सवाल करते हुए कहते हैं कि ‘दलित चेतना के दोहरे मानदंडों तले तुलसी की पीड़ा एक दलित की नहीं, एक ब्राह्मण की हो जाती है, यह हमारी दलित समझ का दिवालियापन नहीं तो क्या है?’

आमतौर पर तुलसी के ऊपर नारी-विरोधी होने का आरोप लगाया जाता है। ‘नर-नारी पूरकता’ शीर्षक अध्याय में लेखक ने आधुनिक नारीवादियों के तमाम ऐसे सवालों का जवाब दिया है, जिसमें नारी को पुरुष के प्रतिपक्ष में खड़ा कर दिया जाता है। इस विषय पर लेखक ने विस्तार से लिखा और निष्कर्ष दिया है कि ‘स्त्री-पुरुष या पति-पत्नी के संबंधों में एक-दूसरे के प्रति निष्ठा, त्याग, ईमानदारी, सेवा, सम्मान की भावना का होना दांपत्य जीवन की सफलता के लिए आवश्यक है और सफल दांपत्य जीवन की बुनियाद पर ही सफल, स्वस्थ सामाजिक जीवन का स्थापत्य खड़ा हो सकता है। तुलसी और गांधी, नर-नारी की परस्पर पूरकता का विमर्श रचते हुए हमें यही सीख देते हैं।’

श्रीभगवान सिंह ने विभिन्न अवसरों पर गांधीजी द्वारा उद्धृत तुलसी की विभिन्न काव्य पंक्तियों का बार-बार जिक्र किया है। गांधीजी, तुलसी साहित्य के संपर्क में तेरह साल की उम्र में ही आ गए थे। अपनी आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ के आरंभ में ही उन्होंने इसका जिक्र किया है। जब पोरबंदर में रामजी के मंदिर में भक्त बीलेश्वर के लाधा महाराज रामायण सुनाया करते थे और गांधीजी उनसे रामकथा रस लेकर सुनते थे। गांधीजी ने लिखा है कि ‘तुलसीदास की रामायण को भक्तिमार्ग का सर्वोत्तम ग्रंथ मानता हूं।’

लेखक ने सचेत रूप से या अनजाने में कुछ ऐसे विषयों को छोड़ दिया है, जिनको लेकर तुलसी और गांधी की दृष्टि भिन्न-भिन्न है। यह सही है कि तुलसी के रामराज्य और गांधी के स्वराज में बहुत समानता है और लेखक ने अनेक उदाहरणों से यह प्रमाणित भी कर दिया है कि गांधी के स्वराज की निर्मिति में तुलसी के रामराज्य से विशेष सहयोग मिला है, पर स्वराज पाने के लिए गांधी ने जो अहिंसा का मार्ग चुना वही मार्ग तुलसी का नहीं है। तुलसी के राम धनुष-बाण उठाते और असुरों का संहार करते हैं। हृदय परिवर्तन की प्रतीक्षा नहीं करते। उनका सारा अभियान धर्म की रक्षा के लिए युद्ध का अभियान है। तुलसी और गांधी की इस वैचारिक भिन्नता की ओर लेखक ने कोई संकेत नहीं किया है।

कोई भी रचनाकार हर तरह से परिपूर्ण नहीं होता। सब में कमजोरियां होती हैं, अंतर्विरोध होते हैं। पर श्रीभगवान सिंह ने तुलसी और गांधी का अध्ययन इतनी निष्ठा से किया है कि इन कमजोरियों पर ध्यान ही नहीं जाता।

तुलसी और गांधी: श्रीभगवान सिंह; सामयिक प्रकाशन, 3320-21, जटवाड़ा, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली; 595 रुपए।

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