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पुस्तकायन : बस्तर में शेक्सपियर की धूनी

अजित कुमार अनामिका का उपन्यास बिल्लू शेक्सपियर पोस्ट बस्तर अनोखे तेवर और खासी चुनौती भरे अंदाज में लिखा गया है। विशेष उद्देश्य यह है कि सामान्यजन- मुख्यतया शिक्षा और आधुनिक जीवन से वंचित रह गए पिछड़े समुदाय- विश्व साहित्य की महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों से परिचित हों, अपनी संभावनाएं विकसित करें और अतिवादी, शोषक या भ्रामक तत्त्वों […]
Author July 26, 2015 15:59 pm

अजित कुमार

अनामिका का उपन्यास बिल्लू शेक्सपियर पोस्ट बस्तर अनोखे तेवर और खासी चुनौती भरे अंदाज में लिखा गया है। विशेष उद्देश्य यह है कि सामान्यजन- मुख्यतया शिक्षा और आधुनिक जीवन से वंचित रह गए पिछड़े समुदाय- विश्व साहित्य की महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों से परिचित हों, अपनी संभावनाएं विकसित करें और अतिवादी, शोषक या भ्रामक तत्त्वों से सुरक्षित रह सकें।

इसके लिए लेखिका ने एक विवाहित महिला मान्यता टंडन और उसके मित्र आशिष मुखर्जी की ओर से आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा-संस्कृति के प्रचार-प्रसार के लिए ‘कथासत्रम’ के माध्यम से शेक्सपियर-डिकेंस जैसे महान लेखकों की कृतियों के हिंदी रूपांतर और मंचन का ताना-बाना बुना है। इन दोनों का मानना था कि इस तरह पिछड़ों का मानसिक-सांस्कृतिक स्तर ऊपर उठेगा; परिणामस्वरूप उन इलाकों में बढ़ रही आतंकवादी और लूट-खसोटी प्रवृत्तियां किन्हीं अंशों में थम सकेंगी।

शिक्षा के जिस प्रयोजन की सिद्धि के लिए आज भारत में असंख्य वातानुकूलित महंगी शिक्षा संस्थाएं महत्त्वाकांक्षी, संपन्न छात्रों से हर साल लाखों रुपए वसूल रही हैं, उसे बस्तर जैसे पिछड़े इलाके में ‘कथासत्रम’ खोल कर निशुल्क पहुंचाने का आदर्श अव्यावहारिक भले जान पड़ता हो, पर उसके पीछे मौजूद आदर्श और सिद्धांत सही न होता, तो हम कदापि न समझ पाते कि हजारों साल पुराने हमारे वेद-पुराण, रामायण-महाभारत आदि आज भी असंख्य निर्धन-निरक्षर जन की चेतना में क्योंकर जीवित-जाग्रत हैं।

कथा के केंद्र में हैं- आदिवासी और सुशिक्षित युवक विलियम किंडो उर्फ बिल्लू किंडो, उसकी सखी ललिता, दिवंगत कामरेड शशिशेखर, प्रोफेसर आशिष मुखर्जी, मान्यता मैडम, उनके पति डॉ टंडन, बेटी शेफालिका और मान्यता के भाई आशय मेहरा आइजी पुलिस, जिन्होंने ‘ऑपरेशन ग्रीन हंट’ के प्रमुख की हैसियत से यह आरोप मढ़ा कि आशिष मुखर्जी ने बीमार मान्यता को नक्सली षड्यंत्रों में धकेल कर ऐसी स्थिति पैदा कर दी कि वे आत्महत्या करने पर मजबूर हुर्इं।

इस अपराध के लिए आशिष को जेल में डाला गया, जिससे उनको बरी कराने के इरादे से बिल्लू ने ऐलविस पुतुल नामक एडवोकेट की सेवाएं लेकर उन्हें यह स्थिति स्पष्ट करनी चाही कि वे तो आदिवासी किशोर-किशोरियों के लिए कहानियों का खुला स्कूल चलाने के लिए बस्तर आए थे और संसार की कालजयी कृतियों से इन लोगों को परिचित करा कर वे उनमें नई चेतना का संचार करना चाहते थे। चिट््ठी-पत्री और डायरी के पन्नों की मदद लेकर बिल्लू यही सिद्ध करना चाहता था कि वे किसी षड्यंत्र या आत्महत्या से संबद्ध न थे। उपन्यास का अधिकतर हिस्सा इन्हीं शेक्सपियर-डिकेंस जैसे लेखकों की जानकारी अल्पशिक्षितों को देने के प्रयासों से संबद्ध है और यही इस उपन्यास के गले में फांस बन कर अटक जाता है।

कठिनाई लेखिका की संकल्पना की नहीं, समय के उस छोर की है, जिसमें यह विचार प्रतिपादित किया गया है। लेखिका का यह कथन बिल्कुल सही है कि ‘अंगरेजी क्लासिक से अंगरेजियत का धड़का निकालना जरूरी है। अंतरंग भाषा में संवाद संभव तभी होगा, जब यह ‘धड़का’ निकलेगा- अंगरेजी से जुड़ा आतंक टूटेगा।’ लेकिन यहां शिष्ट-विशिष्ट हिंदी से उन क्लासिकों को संपुष्ट किया गया है, जबकि मंशा थी उन्हें आदिवासियों, दलितों और विस्थापितों की भाषा में उतारने की। एक तरह से यह अनपढ़ लोगों के साथ संस्कृत भाषा के माध्यम से संवाद स्थापित करने के प्रयास जैसा है।

गौर करना होगा कि ईसप की बोधकथाएं या हितोपदेश की पशु-पक्षियों वाली कहानियां सबकी जबान पर क्यों हैं; जबकि डेढ़ सौ साल तक विभिन्न माध्यमों से जन-जन तक पहुंचाए गए शेक्सपियर लोकप्रिय नहीं हुए। और तो और, अंगरेजों के बीच उन्हें लोकप्रिय बनाने वाली लैंब की कहानियां भी भारत में फैल नहीं सकीं। इस विडंबना की पड़ताल होनी बाकी है।

‘पूरा का पूरा संसार न्याय और करुणा का आगार बन जाए, यह महास्वप्न कभी सच्चा होगा या नहीं, हम नहीं जानते, पर इतना तो जानते हैं कि आसपास के भोले-भाले, मेहनतकश लोगों के हित में जो भी कर सकते हैं, हम करें और निश्शंक करें!’ यही कहती थीं मान्यता मैडम, और आशिष सर भी कहते थे कि मानसिक युद्ध तो सनातन है और इस युद्ध का आयुध है- भाषा। भाषा की बरछी, खुरपी, छेनी, हंसिया के जादू से बदल सकती है- आपस की अंतरंग दुनिया।

इस मनोहर कल्पना को कथा के सूत्रों से जोड़े रखने के प्रयास में लेखिका को न केवल तरह-तरह की जोड़गांठ करनी पड़ी, बल्कि दूर की कौड़ी लाने के इरादे से वह अपने ही बनाए दलदल में फंस गई। नतीजतन, पाठक के हाथ जो सचमुच महत्त्वपूर्ण लगता है, वह है- शेक्सपियर के अनेक अंशों का समर्थ हिंदी अनुवाद, जिसके आधार पर यह आशा की जानी चाहिए कि जिस तरह अंगरेजी के ही अध्यापक डॉ बच्चन ने शेक्सपियर की चार महान त्रासदियों- मैकबेथ, हैमलेट, ओथेलो और किंग लियर- का प्रभावशाली पद्यानुवाद कर हिंदी को समृद्ध बनाया था, उसी तरह शेक्सपियर के रंग में भरपूर रंगी हुई अंगरेजी की अध्यापिका अनामिका भी संपूर्ण शेक्सपियर का हिंदी में रूपांतरण कर अक्षय यश अर्जित कर सकेंगी।

यह ऐसा महान लक्ष्य है, जो अभी तक हिंदी में संपन्न नहीं हो सका। इस अभाव को दूर कर सकने में अनामिका भलीभांति सक्षम हैं। कवि होने के अलावा वे शेक्सपियर की अध्येता भी हैं, हालांकि उनकी यह जानकारी प्रस्तुत कथा के साथ करीने से घुलमिल नहीं सकी है; भोंडे पैबंद-सी नजर आती है।

आम जानकारी है कि ईस्ट इंडिया कंपनी व्यापार करने के इरादे से भारत आई थी। पर जब वह इस देश की मालिक बन बैठी तो ब्रिटिश संसद में बहस छिड़ी थी कि अंगरेजी भारत में लागू की जाए कि नहीं? तब इसका विरोध करने वालों का एक प्रमुख तर्क यह था कि वे अपने महान लेखक शेक्सपियर द्वारा परिमार्जित भाषा को गंवार, जंगली, काले-कलूटों द्वारा बिगाड़े जाना बरदाश्त न कर सकेंगे। आखिरकार फैसला इस मुद्दे के इर्द-गिर्द हुआ था कि कालों को गोरों की भाषा-सभ्यता-संस्कृति का बीड़ा थमा कर ही इतने बड़े देश को काबू में रखा जा सकेगा, वरना एक छोटे से द्वीप के मुट्ठी भर अंगरेज केवल अपने बलबूते इतनी बड़ी जिम्मेवारी संभाल न सकेंगे।

भारत की स्वाधीनता के लगभग सत्तर वर्ष बाद भी अंगरेजी जिस तरह हमारे जीवन के हर पहलू पर अपनी पकड़ बनाए हुए है, उसे देखते हुए और उससे निपटने के क्रम में अपनी खो गई पहचान को फिर से हासिल करने के लिए शायद कारगर तरीका यही होगा कि शेक्सपियर और डिकेंस ही क्यों, गेटे टालस्टाय, सुकरात, प्लेटो, अफलातून, सर्वांतीस, दांते आदि संसार के सभी महान लोगों का लेखन और चिंतन भारत के जनमन का अविभाज्य हिस्सा उसी तरह बन जाए, जिस तरह हमारे रामायण, महाभारत, पुराण आदि वृत्त बने हुए हैं।

आशिष मुखर्जी और मान्यता मैडम जैसों की ‘कथासत्रम’ वाली परिकल्पना शायद कभी सचमुच आकार ले सके, पर अपने वर्तमान रूप में तो ‘बिल्लू शेक्सपियर पोस्ट बस्तर’ चिथड़े-गुदड़े में मखमल के पैबंद जैसा ही अटपटा और अनमेल हो पाया है। जीवन की कथा-व्यथा और शैक्षणिक अध्ययन-मनन के बीच तालमेल नहीं नजर आता।

बिल्लू शेक्सपियर पोस्ट बस्तर: अनामिका; वाणी प्रकाशन, 4695, 21 ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 395 रुपए।

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