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भाषा : हिंदी सम्मेलन से अपेक्षाएं

अमरनाथ दसवें विश्व हिंदी सम्मेलन के आयोजन की घोषणा हो चुकी है। यह 10-12 सितंबर को भोपाल में होगा। इस बार के विमर्श का मुख्य विषय रखा गया है, ‘हिंदी जगत: विस्तार और संभावनाएं’। विश्व हिंदी सम्मेलन द्वारा जारी की गई वेबसाइट में दी गई सूचना के अनुसार विज्ञान और प्रौद्योगिकी, सूचना प्रौद्योगिकी, प्रशासन, विदेश-नीति, […]

Author June 28, 2015 4:50 PM

अमरनाथ

दसवें विश्व हिंदी सम्मेलन के आयोजन की घोषणा हो चुकी है। यह 10-12 सितंबर को भोपाल में होगा। इस बार के विमर्श का मुख्य विषय रखा गया है, ‘हिंदी जगत: विस्तार और संभावनाएं’।
विश्व हिंदी सम्मेलन द्वारा जारी की गई वेबसाइट में दी गई सूचना के अनुसार विज्ञान और प्रौद्योगिकी, सूचना प्रौद्योगिकी, प्रशासन, विदेश-नीति, विधि, मीडिया आदि क्षेत्रों में हिंदी के सामान्य प्रयोग और उसकी परिधि के विस्तार पर परिचर्चा केंद्रित रहेगी। ऐसी उम्मीद भी थी, क्योंकि इन विषयों पर परिचर्चा कराना सरकार के लिए हर तरह से निरापद रहेगा।

निस्संदेह इन मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिए, पर हिंदी के इस महाकुंभ में कुछ ऐसे मुद्दे भी विचार-विमर्श के लिए शामिल किए जाने चाहिए, जिनसे सही अर्थों में हिंदी की प्रगति और प्रतिष्ठा, प्रकारांतर से भारत की अस्मिता और स्वाभिमान जुड़ा हुआ है।

हिंदी और उसकी बोलियों के अंतर्संबंध पर इस बार जरूर चर्चा होनी चाहिए। पिछले दिनों विकीपीडिया ने दुनिया की सौ भाषाओं की एक सूची जारी की, जिसमें बोलने वालों की संख्या के आधार पर हिंदी को चौथा स्थान दिया गया है। इसके पहले हिंदी को दूसरे स्थान पर रखा जाता था। पहले स्थान पर चीनी भाषा होती थी। यह परिवर्तन इसलिए हुआ कि सौ भाषाओं की इस सूची में भोजपुरी, अवधी, मैथिली, मगही, हरियाणवी और छत्तीसगढ़ी को भी शामिल किया गया है और उन्हें स्वतंत्र भाषा का दर्जा दिया गया है।

हिंदी को खंड-खंड करके देखने की यह अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति है। आज भी अगर हम इनके सामने अंकित संख्याओं को हिंदी बोलने वालों की संख्या में जोड़ दें, तो हिंदी दूसरे स्थान पर पहुंच जाएगी। पर जिस तरह से हिंदी की कई बोलियों द्वारा संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग जोरों से की जा रही है, यह परिघटना आगे के कुछ ही वर्षों में यथार्थ बन जाएगी।

तत्कालीन गृहमंत्री पी चिदंबरम ने 17 मई, 2012 को लोकसभा में आश्वासन दिया था कि आगामी मॉनसून सत्र में भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने वाला विधेयक संसद में पेश होगा। अगर वह पूरा सत्र कोयला घोटाले की भेंट न चढ़ गया होता, तो अब तक हिंदी के खूबसूरत घर का एक हिस्सा और बंट गया होता। राजस्थानी, छत्तीसगढ़ी, हरियाणवी, कुमायूंनी, गढ़वाली आदि के लिए भी मांग हो रही है। मैथिली पहले ही शामिल हो चुकी है। फिर अवधी और ब्रज ने कौन-सा अपराध किया है कि उन्हें आठवीं अनुसूची में जगह न दी जाए, जबकि उनके पास रामचरितमानस और पद्मावत जैसे ग्रंथ हैं?

दरअसल, साम्राज्यवाद की साजिश हिंदी की शक्ति को खंड-खंड करने की है, क्योंकि बोलने वालों की संख्या की दृष्टि से हिंदी दुनिया की सबसे बड़ी दूसरे नंबर की भाषा है। इस देश में अंगरेजी के सामने सबसे बड़ी चुनौती हिंदी है। इसलिए हिंदी को कमजोर करके इस देश की सांस्कृतिक अस्मिता को, इस देश की रीढ़ को आसानी से तोड़ा जा सकता है।

जिस देश में खुद राजभाषा हिंदी अब तक ज्ञान की भाषा न बन सकी हो, वहां भोजपुरी, राजस्थानी और छत्तीसगढ़ी के माध्यम से बच्चों को शिक्षा देकर वे उन्हें क्या बनाना चाहते हैं? इनका तो कोई मानक रूप तक तय नहीं है, इनमें गद्य तक विकसित नहीं हो सका है।

हिंदी की सबसे बड़ी ताकत उसकी संख्या है। यह संख्याबल बोलियों के नाते है। बोलियों की संख्या मिल कर ही हिंदी की संख्या बनती है। अगर बोलियां आठवीं अनुसूची में शामिल हो गर्इं तो आने वाली जनगणना में मैथिली की तरह भोजपुरी, राजस्थानी, छत्तीसगढ़ी आदि को अपनी मातृभाषा बताने वाले हिंदीभाषी नहीं गिने जाएंगे और तब हिंदी को मातृभाषा बताने वाले गिनती के रह जाएंगे, हिंदी की संख्या बल की ताकत अपने आप खत्म हो जाएगी और तब अंगरेजी को भारत की राजभाषा बनाने के पक्षधर उठ खड़े होंगे और उनके पास उसके लिए अकाट्य वस्तुगत तर्क होंगे।

कुछ वर्ष पहले देश के एक उच्च न्यायालय का बहुचर्चित फैसला आया था, जिसमें कहा गया था कि हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा नहीं, वह सिर्फ राजभाषा है। भारत के लिए यह शर्म और चिंता का विषय है कि आजादी के अड़सठ वर्ष बीत जाने के बाद भी हमारे पास अपनी राष्ट्रभाषा नहीं है, जबकि राष्ट्रगान है, राष्ट्रध्वज है, राष्ट्रीय प्रतीक है, राष्ट्रीय पशु और पक्षी तक हैं। इस विश्व हिंदी सम्मेलन में यह मांग होनी चाहिए कि संविधान में संशोधन करके शीघ्र हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देकर दुनिया में भारत की प्रतिष्ठा बहाल की जाए।

भारत एक ऐसा तथाकथित आजाद मुल्क है, जहां उसके निवासियों को अपनी भाषा में न्याय पाने का भी अधिकार नहीं है। हमारे संविधान की धारा 348 के अनुसार उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों की भाषा अंगरेजी है। एक स्वाधीन देश की राजभाषा के लिए यह प्रावधान कितना शर्मनाक है- यह कहने की बात नहीं। इसलिए गुजारिश है कि विश्व हिंदी सम्मेलन में सर्वसम्मति से इस आशय का प्रस्ताव भी पारित होना चाहिए कि संविधान में तत्काल संशोधन हो और उच्चतम न्यायालय और देश के सभी उच्च न्यायालयों में हिंदी और उस प्रांत की राजभाषाओं में न्याय संबंधी समस्त कार्यवाहियां संपन्न हों।

बच्चों की बुनियादी शिक्षा किस भाषा के माध्यम से दी जाए- यह प्रश्न हमेशा से देश के कर्णधारों की चिंता का विषय रहा है। इस मुद्दे को लेकर जितने आयोग गठित हुए, सबने एक स्वर से यही सुझाव दिया है कि बुनियादी शिक्षा अनिवार्य रूप से बच्चों की मातृभाषाओं में दी जानी चाहिए। गांधीजी तो चाहते थे कि बुनियादी शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक सब कुछ मातृभाषा के माध्यम से हो।

पिछली सरकार द्वारा गठित ज्ञान आयोग ने शिक्षा के संबंध में जो सिफारिशें की हैं वे गांधीजी के सपनों के ठीक विपरीत हैं। आयोग के सुझाव के बाद देश के सभी राज्यों में पहली कक्षा से अंगरेजी की शिक्षा दी जा रही है। संप्रति केंद्र और राज्य सरकारों में यह आम सहमति बनती दिखाई दे रही है कि भारतीय भाषाओं में अध्ययन करने के कारण बच्चे पिछड़ते जा रहे हैं, जबकि पिछड़ेपन के मूल कारण कहीं और हैं।

यह शर्मनाक परिस्थिति बदलनी चाहिए। हमें अमेरिका और ब्रिटेन की ओर ही टकटकी नहीं लगानी चाहिए, बल्कि फ्रांस, जर्मनी, जापान और चीन जैसे विकसित देशों की ओर भी देखना चाहिए। दुनिया का कोई भी मुल्क दूसरे की भाषा में शिक्षा पाकर महाशक्ति नहीं बन सका है। चीनी भाषा दुनिया की सबसे कठिन भाषाओं में से एक है और उसने अपनी भाषा में बहुमुखी प्रगति करके दुनिया को दिखा दिया है कि सही अर्थों में प्रगति अपनी भाषा में ही संभव है।

ऐसी दशा में आगामी विश्व हिंदी सम्मेलन में सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पारित होना चाहिए कि देश भर में बच्चों को बुनियादी शिक्षा अनिवार्य रूप से उनकी मातृभाषाओं में दी जाए और द्वितीय भाषा के रूप में संघ की राजभाषा हिंदी को रखा जाए।

हम अपने संविधान की धारा 351 पर भी पुनर्विचार चाहते हैं, जिसमें स्पष्ट उल्लेख है कि अपने शब्द भंडार के विकास के लिए हिंदी मुख्यत: संस्कृत से और गौणत: अन्य भारतीय भाषाओं से शब्द ग्रहण करेगी। संविधान की इस धारा का दुष्परिणाम यह हुआ कि सरकारी कार्यालयों में प्रयुक्त होने वाली हिंदी अत्यंत कृत्रिम और दुरूह हो चुकी है। यह भाषा इस देश की आम जनता के स्वभाव के अनुकूल नहीं है और न तो उसमें इस देश की सामासिक संस्कृति को वहन करने की क्षमता है।

आजादी के बाद होने वाले भाषा-वैज्ञानिक शोधों से भी यह प्रमाणित हो चुका है कि संस्कृत कभी आम जनता की भाषा नहीं रही। अब प्रमाणित हो चुका है कि हिंदी पर संस्कृत से ज्यादा लोक भाषाओं का प्रभाव है। इसलिए संविधान की उक्त धारा में इस तरह का स्पष्ट संशोधन होना चाहिए कि हिंदी अपने शब्द भंडार के विकास के लिए मुख्यत: आधुनिक भारतीय भाषाओं से और गौणत: संस्कृत से शब्द ग्रहण करे। हमें एक बार फिर हिंदुस्तानी की ओर देखना होगा। विश्व हिंदी सम्मेलन में हिंदी के स्वरूप को लेकर एक सत्र अवश्य रखा जाना चाहिए।
उम्मीद है कि सही अर्थों में राष्ट्रभाषा को उसकी शक्ति लौटाने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।
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यह शर्म और चिंता का विषय है कि आजादी के अड़सठ वर्ष बीत जाने के बाद भी हमारे पास अपनी राष्ट्रभाषा नहीं है; जबकि राष्ट्रगान, राष्ट्रध्वज, राष्ट्रीय प्रतीक, राष्ट्रीय पशु और पक्षी तक हैं। इस विश्व हिंदी सम्मेलन में यह मांग होनी चाहिए कि संविधान में संशोधन करके शीघ्र हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देकर दुनिया में भारत की प्रतिष्ठा बहाल की जाए।

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