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समांतर संसार : कुंद होती संवेदना

कुछ लोगों को देख कर ऐसा लगता है कि वे गलत पेशे में आ गए हैं। उन्हें कोई और धंधा अपनाना चाहिए था, मगर आवश्यकता उन्हें किसी और पेशे की ओर ले गई..

नई दिल्ली | Updated: September 13, 2015 3:47 PM

कुछ लोगों को देख कर ऐसा लगता है कि वे गलत पेशे में आ गए हैं। उन्हें कोई और धंधा अपनाना चाहिए था, मगर आवश्यकता उन्हें किसी और पेशे की ओर ले गई। पिछले दिनों एक बच्चे के समुद्र किनारे पड़े शव को लेकर यूरोप जाने वाले शरणार्थियों के बारे में जिस तरह की भावनाएं विश्व भर में उभरीं, उसमें सख्त से सख्त दिल आदमी का दिल भी पिघल गया। जर्मनी में जिस तरह इन शरणार्थियों का गीत गाकर और गले लगा कर स्वागत हुआ, वह बता रहा था कि मानवता अभी समाप्त नहीं हुई है। लोगों ने अरब शासकों को भी कोसा कि वे संकट की घड़ी में अपने लोगों की सहायता नहीं कर रहे हैं।

इन सबके बीच एक ऐसी फोटो पत्रकार भी थी, जो शरणार्थियों की संकट की घड़ी में अपने पेशे के साथ न्याय करती नजर नहीं आई। वह शरणार्थियों को अड़ंगी देती और ठोकर मारती दिखाई दी। औरत को हमेशा नरम दिल और ऐसे हालात में सभी नफरतों को भुला कर जरूरतमंदों के साथ खड़े होने वाली माना जाता रहा है। कहा भी जाता है कि औरत बहुत भावुक होती है, मगर इस महिला ने स्त्री होने को ही शर्मिंदा कर दिया।

इससे पहले कि उस महिला को लेकर बात की जाए, सोशल मीडिया पर एक और महिला की फोटो की बात करते हैं। यह औरत भी एक फोटो जर्नलिस्ट जान पड़ती है। इसकी एक ऐसी फोटो सोशल मीडिया पर वायरल है, जिसमें यह कहीं किसी तबाही का फोटो खींचते समय आंसुओं में डूबी हुई है। एक यह छवि है और एक उस महिला फोटो पत्रकार की छवि है, जो शरण की तलाश में आने वाले एक व्यक्ति को, जो पुलिस से बच कर निकलता है और जिसकी गोद में एक बच्चा भी है, पैर से अड़ंगा लगा कर बिना बात गिरा देती है। इससे उसकी गोद का बच्चा भी घायल हो जाता है। बच्चा रो रहा है, मगर इस पत्थर दिल औरत को कोई फर्क नहीं पड़ता। वह रिकॉर्डिंग करती रहती है। यही नहीं, यह औरत एक और दृश्य में कई शरणार्थियों को ठोकर मारती दिख जाती है। इनमें एक बच्ची भी है। ऐसा लगता है कि अगर इस महिला के हाथ में कैमरा न होता, तो वह इन असहाय लोगों को प्रताड़ित करने के लिए अपने हाथों का इस्तेमाल करने से भी नहीं चूकती।

हालांकि पुलिस भी केवल दिखावे की भूमिका अदा कर रही थी। वह इन शरणार्थियों को परेशान करने वाली महिला के खिलाफ कड़ा रुख नहीं अपना रही थी। उस फोटो पत्रकार की हरकत पर पुलिस अधिकारी हैरान नजर आता है। ऐसा नहीं लगता कि वह अपने कैमरे के लिए कोई मार्मिक दृश्य फिल्माने के लिए ऐसा कर रही है। उसकी ठोकर उसकी घृणा व्यक्त करती नजर आती है। हंगरी के निजी टीवी चैनल ने इस हरकत के चलते उस महिला को नौकरी से निकाल दिया, मगर इस पूरे घटनाक्रम ने पत्रकारिता के पेशे को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए।

मान लें कि इस औरत के दिल में एक विशेष समूह के लोगों के लिए नफरत भरी हुई है। ऐसे में अगर वह चिकित्सा या किसी अन्य ऐसे मानवीय संवेदना से जुड़े पेशे से संबंधित होती तो क्या वह इस समूह के लोगों के इलाज में कमी कर देती। सोचने की बात है कि पश्चिम और यूरोप में कहीं ऐसे पत्रकार तो नहीं आ गए हैं, जो पत्रकारिता से अधिक अपनी विचारधारा पर बल देते हैं। क्या वहां इस पेशे में ऐसे पत्रकार अधिक हैं, जो किसी भी संकट को अपनी विचारधारा की चाशनी में घोल कर प्रस्तुत करने में लगे हैं। क्या इसलिए हम वहां सच को बार-बार घायल होते देखते हैं, क्योंकि इस महिला जैसे पत्रकार किसी भी स्थिति में अपनी सोच के अनुसार सच को अड़ंगा लगाने का काम करते होंगे।

इसे केवल एक पत्रकार की हरकत कह कर टालना मुश्किल है। यह भी ध्यान रखना होगा कि सीरिया से यूनान जाने वाले शरणार्थियों में तीन वर्षीय बच्चे की मौत की जो तस्वीर दुनिया को सोचने पर मजबूर कर रही है, उसे खींचने वाली भी एक महिला फोटोग्राफर थी। अगर तुर्की की इस फोटोग्राफर ने दुनिया को यह तस्वीर नहीं दिखाई होती तो क्या दुनिया का दिल पसीजता? न जाने कितने लोग सीरिया और इराक में अब तक हिंसा में मारे जा चुके हैं, पर किसी का दिल पिघला? इस तस्वीर की वजह से यूरोप को शरणार्थियों के प्रति अपना रवैया बदलना पड़ा। इसके अलावा उस पत्रकार की छवि को दुनिया के सामने लाने वाला भी कोई पत्रकार ही रहा होगा, क्योंकि यह वीडियो किसी पत्रकार का बनाया लगता है, जिसे उसने सोशल मीडिया पर डाल दिया और उस महिला पत्रकार का मुखौटा उतर गया।

दरअसल, हर व्यवसाय का एक मूल कर्तव्य होता है। जिस प्रकार शिक्षकों से लोग आशा करते हैं कि वे छात्रों का ज्ञान बढ़ाने में किसी प्रकार की कोताही या भेदभाव न करें उसी प्रकार पत्रकारिता में भी यही सिखाया जाता है कि सच को कमजोर होने न दें। किसी भी झूठ का साथ न दें। समाज के प्रति सहानुभूति की भावना अवश्य होनी चाहिए। समाज देशों में नहीं बंटा होता, बल्कि विश्व में मानवता की बात करता है। इसी तरह चिकित्सा समेत अन्य मानवीय संवेदनाओं से जुड़े कई व्यवसाय हैं, जिनमें इस बात पर जोर दिया जाता है कि हर हाल में सामाजिक सेवा की भावना बनी रहे। जब कुछ महत्त्वपूर्ण व्यवसायों में ऐसी हरकत होती है, तो समाज के स्वार्थ और उदासीनता पर विचार करना पड़ जाता है।

जिस समय यह लिख रही हूं, मेरे पड़ोस में करीब चालीस साल के व्यक्ति की आत्महत्या का समाचार मिला है। वह अविवाहित व्यक्ति अपने रिश्तेदारों के साथ रहता था। उसके भाई, भाभी और एक अविवाहित बहन भी यहीं रहते हैं। उसके ज्यादातर रिश्तेदार दिल्ली में हैं। पता चला कि रात में उसने फांसी लगा ली। आज के दौर में जब हम फेसबुक और वाट्सऐप के जरिए तो दुनिया भर से जुड़े हैं, पर लगता है कि अपने रिश्तों से नहीं जुड़ पाए हैं। अगर यह वास्तव में आत्महत्या है तो यह हमारे समाज की गिरती हुई इमारत को ही दर्शाती है। अगर उसे कोई समस्या थी, तो रिश्तों को इसकी भनक क्यों नहीं लगी!

जिनके साथ वह काम करता था वे क्यों उसकी समस्या से अनजान थे। आखिर ऐसा क्या दबाव होता है कि मौत ही अंतिम सहारा बचती है। क्यों हम अपने दुख दूसरों को नहीं बता पाते। क्या हम दूसरों के साथ वह पुल नहीं बना पाए हैं, जिन पर चल कर हमारे दुख कम हो सकते हैं। क्या दूसरों के पास भी हमारे लिए समय नहीं है। अगर हमारे पास एक-दूसरे के लिए समय नहीं है, तो हमारा समय जा कहां रहा है। क्यों हम जीवन से परेशान हो जाते हैं। उस जीवन से, जो दुबारा मिलने से रहा। क्यों हमें समाज में कोई ऐसा कंधा नहीं मिलता, जिस पर सिर रख कर अपना गम कम कर सकें!

क्या पूरा समाज ही उस महिला पत्रकार जैसों से भरता जा रहा है, जो मजबूरों को अडंÞगी लगा कर खुश होता है। क्या हम इस प्रकार के अड़ंगे का सामना नहीं कर सकते? क्या हम विकास कर रहे हैं या हमारे नीचे गिरने की प्रक्रिया जारी है? काश इसका उत्तर नहीं में होता!

(सय्यद मुबीन ज़ेहरा)

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