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शिक्षा : मरते विश्वविद्यालय

अवधेश कुमार सिंह भारत में विश्वविद्यालयों की हालत किसी पैमाने से ठीक नहीं लगती। विश्वविद्यालय ज्ञान-सृजन के लिए होते हैं, पर यह संभव तभी है जब वे प्रश्नों के क्रीड़ा-स्थल हों। जाक देरिदा ने उचित ही विश्वविद्यालय को किसी शर्त के बगैर प्रश्न करने का स्थल कहा है। प्रश्न करने की यह योग्यता विश्वविद्यालय को […]

Author June 28, 2015 4:49 PM

अवधेश कुमार सिंह

भारत में विश्वविद्यालयों की हालत किसी पैमाने से ठीक नहीं लगती। विश्वविद्यालय ज्ञान-सृजन के लिए होते हैं, पर यह संभव तभी है जब वे प्रश्नों के क्रीड़ा-स्थल हों। जाक देरिदा ने उचित ही विश्वविद्यालय को किसी शर्त के बगैर प्रश्न करने का स्थल कहा है। प्रश्न करने की यह योग्यता विश्वविद्यालय को सत्तावान बनाती है और सत्ताहीन भी, क्योंकि उनसे उठे प्रश्न सत्ता के केंद्रों के अहं को ठेस पहुंचाते हैं और इस वजह से सत्ता के केंद्र कभी सच्चे विश्वविद्यालय के साथ नहीं होते, क्योंकि वे सत्ताधीशों को तंग करते हैं। विश्वविद्यालयों की आत्मनिर्भरता, उनकी नैतिक सत्ता और सत्ताधीशों की उदारता, परिपक्वता और अकादमिक स्वायत्तता के प्रति सम्मान और सहिष्णुता इस स्थिति में बदलाव ले आएं तो और बात है।

पश्चिम में विश्वविद्यालय की स्थिति हमसे अच्छी है, पर वहां भी इसका पतन और अधिक बढ़े उससे पूर्व उनके अकादमिकों ने इसकी चर्चा शुरू कर दी है। टेरी इगल्टन ने पिछले दिनों ‘द स्लो डेथ आॅफ दि यूनिवर्सिटी’ (6 अप्रैल) लेख लिखा, जिसकी खास बात यह थी कि इसमें उन्होंने ‘डेथ’ या ‘मौत’ शब्द का प्रयोग व्यंजना में कम, अभिधा में ज्यादा किया। एक बात और, ‘मृत्यु’ का अर्थ ‘केंद्रीयता का अभाव’ होता था और अक्सर ऐसे शीर्षक के बाद प्रश्नवाचक चिह्न लगाया जाता था, पर इस बार ऐसा नहीं है। यानी मौत का समाचार ‘पक्का’ है। इसकी एफआइआर किसी और ने नहीं, बल्कि प्रोफेसर इगल्टन ने कराते हुए इसे वैश्विक परिघटना माना।

उनके अनुसार ‘विश्वविद्यालय’ की मौत के लिए जिम्मेदार कारकों में उच्चशिक्षा का कॉरपोरेटीकरण या वाणिज्यीकरण है। आज के प्रोफेसर मैनेजर रह गए हैं और कुलपति मानो कर्ताधर्ता, जिसका मुख्य काम आर्थिक संसाधन जुटाना है, न कि स्तरीय शिक्षा, शोध, ज्ञान का सृजन, संरक्षण, विस्तार या मूल्यों का संवर्धन। शुल्क-अर्जन शिक्षा से ज्यादा जरूरी है। मानविकी की स्थिति तो और खराब है। आने वाले दिनों में अगर इसके विभाग जिंदा रहते हैं, तो उनमें व्यवसाय के विद्यार्थियों को ‘सेमी-कोलन का प्रयोग’ जैसे विषय पढ़ाए जाएंगे। संदेश साफ है: आज के विश्वविद्यालय ‘सर्कस’ भर रह गए हैं और धीमी मौत मर रहे हैं।

पश्चिम में विश्वविद्यालय की यह स्थिति हमें अपनी ओर देखने को बाध्य करती है। गिने-चुने अपवादों को छोड़, हमारे विश्वविद्यालयों की मृत्यु का सवाल ही कहां उठता है, वे जिंदा ही कहां थे? यहां विश्वविद्यालय जैसी संस्था की बात करने का कोई अर्थ नहीं। हां, कुछ अकादमिक लोग कभी-कभार रो लेते हैं, पर उन्हें यह भी पता नहीं कि विश्वविद्यालय नाम की संस्था होती क्या है?

जिस पैमाने से इगल्टन ‘विश्वविद्यालय की मौत’ की बात करते हैं, उसका फूहड़ रूप हमारे यहां दिखाई देता है। कॉरपोरेटाइजेशन का उद्देश्य लाभ कमाना तो है, पर उसमें कहीं न कहीं स्तरीय सेवा और पेशेवरी का आग्रह होता है। कॉरपोरेटाइजेशन और प्राइवेटाइजेशन आज का सच हैं, तो भी शिक्षा का व्यवसायीकरण अस्वीकार्य है। व्यवसायीकरण तो मान भी लें, लेकिन व्यापारीकरण ने भारतीय शिक्षा और विश्वविद्यालय का कबाड़ा कर दिया है।

हकीकत यह है कि भारतीय शिक्षा काले धन को सफेद करने का अड्डा बन गई है। मिलीभगत की संस्कृति में काला धन तो धड़ल्ले से सफेद हो रहा है, पर विश्वविद्यालय कालिख का कारखाना बनते जा रहे हैं। यह काला धन पूंजीपतियों से ज्यादा राजनेताओं का है, जिनका न तो समाज या शिक्षा से लगाव है, न उनका कोई जीवन-दर्शन है। उनके लिए शिक्षा काले धन के वैधीकरण और फिर उसमें वृद्धि का साधन है, जिसके लिए अपनी सत्ता, सलूक और दबंगई का सदुपयोग करने में उन्हें कोई संकोच नहीं होता। जो राज्य या केंद्रीय विश्वविद्यालय इस बीमारी से बचे हैं, उनमें इन नवप्रवर्तन की बात तो दूर, संबंधित विश्वविद्यालय के ‘एक्ट’ और ‘मैंडेट’ के नाम पर नए विचारों की हत्या आम बात है।

हमारा दुर्भाग्य यह है कि हम न तो पश्चिमी ढंग के विश्वविद्यालय के मॉडल को कायदे से लागू कर सके और न ही भारतीय ढंग के। जब नालंदा अपने बौद्धिक वैभव के शिखर पर था तब ‘यूनिवर्सिटी’ शब्द पश्चिम के शब्दकोश में ही नहीं था। जब नालंदा को जलाया गया, उस समय तक बोलोग्ना, पेरिस, कैंब्रिज और आॅक्सफर्ड विश्वविद्यालय अपने शैशव-काल में थे। येल और हार्वड विश्वविद्यालय तब आधी सदी पीछे थे। ज्वलंत इतिहास के सामने शैक्षणिक ह्रास का वर्तमान यथार्थ भयंकर टीस पैदा करता है। इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है कि नालंदा विश्वविद्यालय जिनकी समृद्ध विरासत हो, उन्हें उच्चशिक्षा के लिए विदेशी मॉडल तलाश करना पड़ रहा है।

और तो और, हमसे तो इसकी पुनर्स्थापना भी नहीं हो पा रही है। ऐसे में आज की उच्चशिक्षा के लिए खासकर अन्य विश्वविद्यालय के विकास के मॉडल हम कहां से निकालेंगे? विश्वप्रसिद्ध अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन इसके प्रथम कुलाधिपति बने। इस देश का बड़े से बड़ा कार्यालय या विभाग उनकी बात टाल नहीं सकता था। पर उनके कुलाधिपत्य के दौरान नालंदा विश्वविद्यालय की पुनर्स्थापना और विकास आशा के अनुरूप नहीं रहा। जरूरत है उसकी स्थापना और उत्थान के मूल तत्त्वों को क्रियान्वित करने की।

नालंदा विचार है, इमारत नहीं। इसके मूल सात तत्त्व थे: संपूर्ण आवासीय। इस विश्वविद्यालय में योग्य विद्यार्थियों को प्रवेश मिलता था और नागार्जुन, आर्यभट््ट, आर्यदेव, शैलभद्र, पद्मसंभव और धर्मकीर्ति जैसे चिंतक विद्वान आचार्यों का मार्गदर्शन। दो हजार अध्यापक और लगभग दस हजार विद्यार्थियों का अनुपात 1:5 के आसपास रहता था। इसके परिसर में लगभग दो हजार अध्यापकों के लिए आवास व्यवस्था थी; इसका ‘धर्मगंज’ नामक नौ मंजिला ग्रंथालय था, जिसके ‘रत्नोदधि’, ‘रत्न-सागर’ और ‘रत्नंजक’ नामक तीन भाग थे, जिसकी पांडुलिपियों और किताबों को पढ़ने के लिए विदेशी विद्वान आते थे।

बिना किसी राजकीय दबाव या भेदभाव के शांतरक्षित और नागार्जुन जैसे दार्शनिक विद्वान कुलपति बनते थे। आर्थिक स्वायत्तता सुनिश्चित करने के लिए उदार शासकों ने चार सौ के आसपास गांव दान में दिए थे। विदेशी राजवंशों से दान (एंडोमेंट फंड) मिलते थे। पर नालंदा को यूजीसी या मंत्रालय को उपयोग-प्रमाणपत्र देने की जरूरत नहीं थी। प्रबंधन स्वायत्त और बाह्य हस्तक्षेप मुक्त था और सत्ताधीशों में अपने लोगों को बिठाने का लालच या जिद नहीं थी। बौद्धदर्शन केंद्रित विश्वविद्यालय होने के बावजूद यहां का पाठ्यक्रम समावेशी था, जिसमें वेदांग, न्याय, व्यावसायिक और जीवन-कौशल शिक्षा शामिल थे; और नालंदा के केंद्र में परीक्षा न होकर ज्ञानार्जन था, जिसका मूल्यांकन विद्वत-गोष्ठी में सतत भाग लेने से होता था। नालंदा के ये विधायक सिद्धांतों पर अमल करके भारतीय विश्वविद्यालयों और विश्वविद्यालय जैसी संस्था को ‘मौत’ से बचा सकते हैं।

आज विश्वविद्यालय की मृत्यु के लिए वे सब तत्त्व जिम्मेदार हैं, जो शिकायत करते हैं। पर सबसे बड़ी जिम्मेदारी शिक्षकों की है, क्योंकि इसी समुदाय के हित, प्रतिष्ठा और भविष्य दांव पर लगे हैं। विश्वविद्यालय राजनेताओं की चिंताओं की परिधि में तभी आते हैं, जब या तो नियुक्तियों का मौसम होता है या फिर छात्रसंघ चुनाव का, क्योंकि तब उन्हें अपनी जमात में भर्ती के नए रंगरूट मिलते हैं। पर अध्यापक की जिंदगी के चार दशक खपते हैं और समाज उसे चालीस पीढ़ियां सौंपता है। इसलिए एक अध्यापक के पास उत्तदायित्व से बचने का कोई रास्ता नहीं। विडंबना है कि कुलपति बन कर विश्वविद्यालय का यह आचार्य वही सब कुछ करता दिखाई देता है, जिनकी वह आलोचना किया करता था।

विज्ञान और तकनीकी क्षेत्रों को छोड़ भी दें, तो समझ नहीं आता कि समाज को जिन कला और वाणिज्य संकाय के शिक्षण से ज्यादा शिकायत है, उनमें मेरे अध्यापक-मित्रों को उच्च शिक्षण, शोध और नैतिक व्यवहार की जिम्मेदारी निभाने से कौन रोकता है?

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