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कभी-कभार : सत्य और कविता

अशोक वाजपेयी इन दिनों हम सत्य की चर्चा कविता के संदर्भ में कम ही करते हैं: इस पर बहुत बहसें होती रही हैं कि कविता का यथार्थ से क्या संबंध है। एक तरह से सत्य घट-सिमट कर यथार्थ रह गया है। वह भी अक्सर सामाजिक यथार्थ, उसमें मनुष्य के कई और यथार्थों की, मसलन आध्यात्मिक […]

Author Updated: June 28, 2015 4:49 PM

अशोक वाजपेयी

इन दिनों हम सत्य की चर्चा कविता के संदर्भ में कम ही करते हैं: इस पर बहुत बहसें होती रही हैं कि कविता का यथार्थ से क्या संबंध है। एक तरह से सत्य घट-सिमट कर यथार्थ रह गया है। वह भी अक्सर सामाजिक यथार्थ, उसमें मनुष्य के कई और यथार्थों की, मसलन आध्यात्मिक यथार्थ की अनदेखी, होती रहती है। पहले कभी मैंने यह कहने की धृष्टता की थी कि कविता को सत्य से कुछ लेना-देना नहीं होता, क्योंकि सत्य तानाशाह, एकवचन, अंतर्विरोधमुक्त और संपूर्ण होता है। उसके बरक्स सच्चाई बहुल, बहुवचन, अराजक, अंतर्विरोधों में रसी-बसी लोकतांत्रिक और अपूर्ण होती है। कविता इसलिए सच्चाई के नजदीक होती है। हमारे एक बड़े कवि ने तो यहां तक कहा है: ‘मैं सच लिखता हूं, लिख कर सब झूठा करता जाता हूं।’

इस सिलसिले में याद आती है कि आयरिश कवि शीमस हीनी की उक्ति कि कविता विफल होती है, अगर वह सत्य और न्याय से अपना अनुबंध भंग करती है। यहां यह देखा जा सकता है कि ‘सौंदर्य ही सत्य है’ की रूमानी अवधारणा से हट कर सौंदर्य की जगह न्याय ले रहा है। किसी ने यह भी कहा कि सत्य पर कविता का एकाधिकार नहीं है, पर ऐसी कोई कविता नहीं होती, जो सत्य से या उस पर उलझती-अटकती न हो। डेविड कांस्टेंटीन का मत है कि कविता झूठ बोलने के विरुद्ध होती है, भाषा के फूहड़पन और बहानेबाजी के विरुद्ध। बोलने-लिखने के उन सब तरीकों के विरुद्ध जो हमारी मानवीयता घटाते हैं, हमारी सहानुभूतियों को संकीर्ण करते हैं, हमारे सोचने और महसूस करने की क्षमता को शिथिल करते हैं। कविता इन सबके खिलाफ मुठभेड़ करती है।

ऐसे समय आए हैं जब कविता का सच बोलना लगभग अपराध था। मध्यकाल में ही नहीं, आधुनिककाल में भी: अक्सर तानाशाह राजव्यवस्थाओं में। यह याद करना दिलचस्प है कि एक ओर तो हमारे यहां कवि को ईश्वर का पर्याय माना गया है, जो अपार काव्य-संसार का प्रजापति है, तो दूसरी ओर, इस्टोनियन भाषा में, कवि शब्द का एक अर्थ झूठ बोलने वाला भी है। हमारे यहां कई बोलियों में कवि को लबार मानते हैं: बक-बक करने वाला झूठा। अमेरिकी कवि चार्ल्स सिमिक ने तो यहां तक कहा है कि सिद्धांतत: वे जीवन में झूठ बोलने के विरुद्ध हैं, सिवाय कविता के!

कुछ यह भी कहा जाता रहा है कि कवि और कविता में फर्क करना चाहिए: कवि झूठ बोल-बरत सकता है, कविता नहीं। दूसरी ओर, ब्रिटिश कवयित्री एलिजाबेथ जेनिंग्ज की राय है कि मानवीय विफलताएं क्षम्य हैं, अगर करुणा का अभाव, मनोवृत्ति की संकीर्णता, ईर्ष्या या कायरता कवि की प्रकृति में मौजूद हैं तो वे उसकी कविता में भी दिखाई देंगी। अगर आप गंभीर कविता लिख रहे हैं तो आप किसी किस्म का छद्म नहीं बरत सकते। जाहिर है कि कविता, सच और सच्चाई के संबंध बहुत उलझे हुए हैं और शायद इसीलिए हम उस पर अधिक विचार करने की झंझट से बचते हैं।

प्रियदर्शी आलोचना

वरिष्ठ कवि अजितकुमार ने कभी अपने को आलोचक के रूप में पेश नहीं किया। मेरी तरह कभी अपने को कवि-आलोचक कहने की हिमाकत नहीं की। उनकी कविता ‘अकेले कंठ की पुकार’ की तरह शुरू हुई थी और आज तक वही बनी हुई है। हमारे बहुत सारे कवियों और आलोचकों की तरह दूसरों को उधेड़ने-पीटने में भी उनकी कोई दिलचस्पी नहीं रही है। वे हम जैसे कई धवलकेशियों की तरह साहित्य की आज की हालत पर झींखते-झल्लाते नहीं हैं। उन्होंने चुपचाप, खासी दुर्लभ विनम्रता से, जो आलोचना लिखी है, वह अचूक ढंग से प्रियदर्शी है।

वे जिस-जिन पर विचार करते हैं उसका कोई न कोई विधेयात्मक पहलू खोज ही लेते हैं। उनके यहां न्यायबुद्धि तो सजग है, निर्णायक बुद्धि पीछे रहती है। लेकिन वे एक भरोसेमंद और जिम्मेदार साक्षी हैं: उन्होंने पिछले लगभग पचास से अधिक वर्षों तक हिंदी साहित्य की सर्जनात्मक और अकादेमिक दुनिया में शिरकत की है और उसे नजदीक से देखा है। इस हिस्सेदारी और गवाही का एक प्रतिफल हैं उनकी तीन गद्य पुस्तकें, जो हाल ही में प्रकाशित हुई हैं- ‘सात छायावादोत्तर कवि (साहित्य भंडार)’, ‘धीरे-धीरे, धीरे-धीरे’ (सस्ता साहित्य मंडल) और ‘जिनके संग जिया’ (नई किताब)।

पहली पुस्तक में कुल इक्कीस लेख हैं- अज्ञेय 4, बच्चन 4, नागार्जुन 2, दिनकर 2, केदारनाथ अग्रवाल 1, शमशेर बहादुर सिंह 3 और भवानी प्रसाद मिश्र 5। अज्ञेय के बारे में अजितजी ने लिखा है- ‘उनकी जिजीविषा और आत्मनिर्भरता ने उन्हें जो ऊर्जा दी थी कि पीछे छूट गयों के बावजूद नयों-नयों के साथ जुड़ कर वे निरंतर आगे बढ़ते रह सके उसकी आशंसा करते हुए यह कहने का मन होता है कि लेखन और जीवन को सर्वांगीणता में अपनाने वाले बीसवीं सदी के वे सर्वप्रमुख हिंदीकर्मी थे।’ शमशेर के बारे में अजितजी ने कहा है- ‘… जब शमशेर धार का आह्वान करते हैं कि वह लौट आए या चाहते हैं कि टूटा हुआ फूल डाल से फिर जुड़ जाए तो वह किसी असंभवता की कामना नहीं, सौंदर्य के प्रति उनकी ललक का मंत्रोच्चार है।’ भवानी प्रसाद मिश्र के सिलसिले में अजितजी कहते हैं- ‘… मंच की परम दुर्गति के इस दौर में वे मौजूद नहीं, वरना कभी के हूट किए जाकर खदेड़ दिए गए होते। आज के माहौल में वे ‘सीढ़ियां चढ़ के सोने’ का संदेश देने की जगह शायद ‘पायदान’ पर उतर धूल चाटने का रास्ता अपनाने के लिए विवश कर दिए जाते।… हिंदी कविता को इस हद तक अवमूल्यित करने का दोषी किसे ठहराया जाए? बच्चन को? नीरज को? मुकुल को? काका को? या उपभोग को ही जीवन का सारतत्त्व समझ बैठने वाले वर्तमान युगधर्म को?

श्रीकांत वर्मा के अपने संस्मरण में अजितजी ने कहा है- ‘‘अंधा युग’ का विषाद यह था कि ‘टुकड़े टुकड़े हो बिखर चुकी मर्यादा/ दोनों ही पक्षों ने उसको तोड़ा है/ पांडव ने कुछ कम कौरव ने कुछ ज्यादा’ तो ‘मगध’ का अफसोस यह कि ‘शासक किसी लायक नहीं रहे।…’ जहां ‘अंधा युग में मर्यादा की पतली डोर थामने वाले कृष्ण के उल्लेख द्वारा स्थिति की शोचनीयता और भी उभारी गई है, वहीं ‘मगध’ का विलाप भी श्मशान-वैराग्य जैसा ही लगता था, जिसकी अंतर्ध्वनि यह हो कि अंतत: तुम कुरुक्षेत्र और मगध- कोसल से बच नहीं सकते।’

कटौती और फिजूलखर्ची

हम जिन कई अंतर्विरोधों में या उनके साथ जीते हैं, उनमें से एक यह है कि एक ओर तो हम अपनी भाषा-संपदा के बहुत कम हिस्से का उपयोग करते हैं, पर दूसरी ओर अक्सर सार्वजनिक आयोजनों में जरूरत से ज्यादा शब्दों का बहुत उदारता से इस्तेमाल करते हैं। पहले से लगता है कि हमारे पास शब्द कम हो रहे हैं और कम शब्दों से हमारा काम बखूबी चल जाता है। दूसरे से लगता है कि हम स्वागत, प्रशंसा, आभार आदि में जरूरत से कहीं ज्यादा शब्दों का व्यर्थ प्रयोग करने में रत्तीभर संकोच नहीं करते: संक्षेप के बजाय वाग्स्फीति, सटीकता के बजाय अतिशयोक्ति प्रगट होती है। पहले से लगता है कि शब्द-संकोच दरअसल हमारी मानवीयता का ही संकोच है। दूसरा बताता है कि हममें बारीकी, संयम और समझ का अभाव बढ़ रहा है।

यह सब सूझा जब हाल ही में एक विद्यापीठ के एक अलंकरण समारोह में जाने का सुयोग हुआ। आप उम्मीद करते हैं कि विद्यापीठ में भाषा साफ-सुथरी होगी, उसमें व्यर्थ की प्रशंसा नहीं होगी, सूक्ष्मता और संक्षेप होगा। लेकिन स्थिति इसके ठीक विपरीत थी। हर व्यक्ति जो मंच पर था मनीषी, चिंतक, जननायक आदि असत्य और निराधार पदों में बखाना जा रहा था। हमारे विद्या, साहित्य संबंधी सार्वजनिक आयोजनों में भाषा का इतना लापरवाह, बेईमान, स्फीत प्रयोग होता है कि लगता है कि जिन संस्थाओं को भाषा की पहरेदारी करना चाहिए वे ही उसे विकृत कर लूटपाट कर रही हैं। साफ-सुथरापन सिर्फ स्वच्छता अभियान का मामला नहीं है: हमें साफ-सुथरे दिमाग भी चाहिए जो सूक्ष्मता से सोच सकें और साफ-सुथरी भाषा का व्यवहार कर सकें।

हिंदी में अगर वैचारिक साहित्य बहुत कम है तो इसका एक बड़ा कारण यह है कि हमारे शैक्षणिक संस्थानों में भाषा के प्रति इस कदर लापरवाही है कि लगने लगा है कि हिंदी में और सब कुछ संभव है, तीक्ष्ण-सूक्ष्म विचार नहीं। जिस भाषा में ऐसा विचार न हो उसमें ज्ञानोत्पादन भी बहुत कम होगा। यही हालत हिंदी की है। यह विचित्र विडंबना है कि जिन्हें भाषा के प्रति सतर्क होना चाहिए वही शैक्षणिक संस्थाएं, पढ़े-लिखे लोग, मीडिया उसे लगातार भ्रष्ट और दूषित कर रहे हैं। जहां विचार सहज स्वाभाविक, अभिव्यक्ति साफ-सुथरी होनी चाहिए वहीं दोनों की अनुपस्थिति और असंभावना दिनों-दिन भीषण तेजी से बढ़ती जा रही है। वह दिन दूर नहीं जब हिंदी में बाजार तो होगा, विचार गायब हो जाएगा!

बहुत हो चुका अभियान हिंदी को बढ़ाने का: अब प्रयत्न होना चाहिए हिंदी को बचाने का। उसे ज्ञान और विचार के लिए सक्षम माध्यम बनाने का प्रयत्न। उसकी सच्ची आलोचना-वृत्ति को सामान्य हिंदी जगत में फैलाने और सक्रिय करने का अभियान। निरे संख्याबल के आधार पर बहुत दिनों तक हिंदी को बड़ी भाषा नहीं माना जा सकता। जिस भाषा में वैचारिक संपन्नता और सूक्ष्मता, ज्ञान का सतत उत्पादन, अभिव्यक्ति की ऋजुता न हो वह बड़ी भाषा कैसे और क्यों?

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