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निनाद : उजागर होते छिपे एजेंडे

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद देश में आर्थिक विकास हुआ या न हुआ हो, बहुसंख्यक हिंदू आबादी वाले धर्मनिरपेक्ष भारत को हिंदू राष्ट्र में तब्दील करने की परियोजना पर काम जरूर तेजी के साथ चल रहा है..

Author नई दिल्ली | Updated: September 20, 2015 6:22 PM

हिंदुत्ववादी उन्हें दबाने की कितनी भी कोशिश क्यों न करें, चेतना में गहराई के साथ जड़ जमा चुके विचार और संस्कार स्वत: किसी न किसी रूप में बाहर आ ही जाते हैं। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना की तारीफ करते हुए कहा था कि ‘महिला होने के बावजूद’ उन्होंने आतंकवाद के खिलाफ सख्ती दिखाई है, तब महिलाओं के प्रति उनका वह दृष्टिकोण ही इसके पीछे से झांक रहा था, जिसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे दकियानूसी सोच वाले संगठन प्रचारित करते हैं।

अब उनकी सरकार में संस्कृति मंत्री महेश शर्मा ने औरंगजेब रोड का नाम बदल कर दिवंगत राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम पर रखने का औचित्य समझाते हुए कहा है कि ‘मुसलमान होते हुए भी’ (यानी ‘मुसलमान होने के बावजूद’) वे बहुत बड़े राष्ट्रवादी और मानवतावादी इंसान थे। इस बयान के बाद क्या किसी को कोई संदेह रहता है कि मुसलमानों के प्रति भगवा दृष्टि क्या और कैसी है?

दिलचस्प बात यह है कि महेश शर्मा ने शिक्षा और संस्कृति के भगवाकरण के मोदी सरकार के प्रयासों को यह कह कर सही ठहराया है कि सवा सौ करोड़ लोगों ने यह जानते हुए कि संघ की विचारधारा क्या है, भाजपा को पूर्ण बहुमत देकर उसकी सरकार बनवाई। इसका अर्थ है कि ये सवा सौ करोड़ लोग भगवाकरण के खिलाफ नहीं हैं! संस्कृति मंत्री यह भी चाहते हैं कि रामायण, महाभारत और गीता (वह भी महाभारत का हिस्सा है) को पाठ्यक्रम में अनिवार्य रूप से पढ़ाया जाए। लेकिन कुरान और बाइबिल का जिक्र आते ही वे बगलें झांकने लगते हैं, क्योंकि ‘भारत की आत्मा रामायण, महाभारत और गीता में बसती है, अन्य धर्मग्रंथों में नहीं। यानी सवा सौ करोड़ लोगों द्वारा चुने जाकर भी (हालांकि यह आंकड़ा हास्यास्पद है) संस्कृति मंत्री केवल उन अस्सी प्रतिशत लोगों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, जो हिंदू हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद देश में आर्थिक विकास हुआ या न हुआ हो, बहुसंख्यक हिंदू आबादी वाले धर्मनिरपेक्ष भारत को हिंदू राष्ट्र में तब्दील करने की परियोजना पर काम जरूर तेजी के साथ चल रहा है, जबकि कुछ ही दिन पहले पड़ोसी देश नेपाल, जो हाल के वर्षों तक बाकायदा हिंदू राष्ट्र था, एक लंबे राजनीतिक संघर्ष के बाद अपने-आपको धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाने में सफल हो गया है। दरअसल, इस परियोजना को केवल संघ नहीं, उन अनेक नेताओं और संगठनों का सक्रिय समर्थन हासिल रहा है, जिनके बारे में अधिकतर लोगों को जानकारी भी नहीं है।

विशाल हिंदी प्रदेश में शायद ही कोई साक्षर हिंदू परिवार होगा, जिसमें गीता प्रेस, गोरखपुर से छपा तुलसीकृत ‘रामचरितमानस’ के गुटके, मंझले या बड़े आकार के संस्करण की कोई प्रति न हो। जब किसी विशेष दिन अखंड रामायण का पाठ रखा जाता है, तब गीता प्रेस से प्रकाशित ‘रामचरितमानस’ का ही पाठ किया जाता है। इसी तरह गीता प्रेस से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका ‘कल्याण’ भी अधिकांश हिंदू घरों में पढ़ी जाती है।

उत्तर भारत में बहुत कम ऐसे रेलवे स्टेशन मिलेंगे जहां गीता प्रेस, गोरखपुर का स्टाल न हो। मोबाइल वैन के जरिए भी गीता प्रेस ने अपने द्वारा प्रकाशित हिंदू धार्मिक साहित्य को गांव-गांव तक पहुंचाया है। उसके प्रकाशनों की खासियत यह रही है कि उनका दाम बेहद कम होता है और गरीब आदमी भी उन्हें खरीद सकता है।

गीता प्रेस को धार्मिक साहित्य का प्रचार-प्रसार करने के लिए प्रतिबद्ध संस्था समझा जाता है और शायद ही किसी ने कभी सोचा हो कि इसके अलावा भी इसका कोई दूसरा एजेंडा हो सकता है। लेकिन, अब पता चला है कि शुरू से इसका एजेंडा भी वही था, जो संघ का था या जो बाद में स्वामी करपात्री द्वारा स्थापित राजनीतिक दल रामराज्य परिषद का था। यानी इस निश्छल, निस्वार्थ सेवा के पीछे भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की परियोजना थी।

वरिष्ठ पत्रकार अक्षय मुकुल ने गहन शोध के बाद 540 पृष्ठों की एक पुस्तक लिखी है, जिसका शीर्षक है ‘गीता प्रेस ऐंड द मेकिंग ऑफ हिंदू इंडिया’ (गीता प्रेस और हिंदू भारत का निर्माण)। हार्पर कॉलिन्स पब्लिशर्स इंडिया ने इसे पिछले माह प्रकाशित किया है और इस अद्भुत पुस्तक ने पिछली सदी के इतिहास के कुछ ऐसे अंधेरे कोनों को आलोकित किया है, जो अभी तक अलक्षित पड़े थे। 1923 में गीता प्रेस की स्थापना के पीछे जयदयाल गोयंदका की प्रेरणा थी, लेकिन शीघ्र ही हनुमान प्रसाद पोद्दार इसके सुदृढ़ स्तंभ बन गए और 1926 में उन्होंने ‘कल्याण’ मासिक पत्रिका का प्रकाशन भी शुरू कर दिया। संघ की तरह उनकी भी घोषित नीति राजनीति से अलग रहने की थी, लेकिन महत्त्वपूर्ण अवसरों पर उन्होंने खुल कर राजनीतिक भूमिका निभाई। यह इसी से स्पष्ट है कि महात्मा गांधी के साथ घनिष्ठ संबंध होने के बावजूद उनकी हत्या के बाद देश भर में जिन लोगों की गिरफ्तारी हुई, पोद्दार भी उनमें शामिल थे।

‘कल्याण’ के ‘नारी अंक’ के अलावा गीता प्रेस ने ‘स्त्री धर्म प्रश्नोत्तरी’ जैसी अनेक पुस्तिकाएं प्रकाशित कीं जिनमें सती, साध्वी, पतिपरायणा नारी का महिमामंडन किया। नारी का क्षेत्र घर की चारदीवारी था और पुरुष का घर के बाहर। सहशिक्षा और विधवा विवाह आदि का विरोध इन पुस्तिकाओं का स्थायी भाव था। वर्णव्यवस्था का खुला समर्थन भी गीता प्रेस की प्रमुख विशेषता थी। ‘कल्याण’ में भागवत जैसे लोकप्रिय पुराणों, रामायण, महाभारत और गीता जैसे ग्रंथों की कहानियां सचित्र प्रकाशित होती थीं और प्रवचननुमा लेख भी छपते थे, जिनके जरिए सनातन हिंदू धर्म की रूढ़िवादी मान्यताओं का प्रचार किया जाता था।

शुरू से ही गीता प्रेस को मारवाड़ी समाज का समर्थन प्राप्त था। ‘कल्याण’ का प्रकाशन ही इस समाज के बीच प्रगतिशील और दकियानूसी धाराओं के बीच संघर्ष के कारण शुरू हुआ था। जहां घनश्यामदास बिड़ला और जमनालाल बजाज जैसे गांधीवादी अंतरजातीय विवाह, बालविवाह और स्त्री शिक्षा जैसे मुद्दों पर प्रगतिशील रुख अपना रहे थे, वहीं हनुमान प्रसाद पोद्दार द्वारा समर्थित आत्माराम खेमका जैसे लोग सनातन हिंदू धर्म की महिमा का बखान कर रहे थे।

जुलाई, 1947 में हनुमान प्रसाद पोद्दार ने एक बारह-सूत्री कार्यक्रम तैयार किया और कांग्रेस, हिंदू महासभा, सनातनी हिंदू, जैन, सिख- सभी से एकजुट होकर इसे अमल में लाने के लिए प्रयास करने की अपील की। पहला सूत्र था कि भारत का नाम हिंदुस्थान या आर्यावर्त रखा जाए। कुछ अन्य उल्लेखनीय सूत्र थे: भारत विशुद्ध रूप से हिंदू राष्ट्र हो और हिंदू संस्कृति के आधार पर ही इसका निर्माण किया जाए। इसका राष्ट्रीय ध्वज भगवा और राष्ट्रगान ‘वंदे मातरम’ हो। गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए। सरकारी भाषा शुद्ध हिंदी हो, भ्रष्ट हिंदुस्तानी नहीं, और लिपि देवनागरी हो। सैन्य प्रशिक्षण अनिवार्य कर दिया जाए। सेना में केवल हिंदुओं को भर्ती किया जाए, इसलिए पाकिस्तान बनने से पहले ही सेना को बांट दिया जाए। मुसलमानों को किसी भी उच्च पद पर नियुक्त न किया जाए। समाज सुधार के नाम पर किसी भी धार्मिक समुदाय के लिए कानून न बनाए जाएं।

गीता प्रेस के प्रकाशनों के जरिए पिछली लगभग एक सदी से इस विश्वदृष्टि को चुपचाप प्रचारित-प्रसारित किया जा रहा है। लाखों लोगों ने इन प्रकाशनों को, खासकर ‘कल्याण’ को, लगातार पढ़ा है और अचेतन रूप से ही सही, उसमें प्रस्तुत मूल्यव्यवस्था को आत्मसात किया है। इसलिए आज अगर एपीजे अब्दुल कलाम की तारीफ यह कह कर की जा रही है कि ‘मुसलमान होते हुए भी’ वे राष्ट्रवादी थे, तो किसी को आश्चर्य क्यों होना चाहिए?

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