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संवाद : प्रतिवादी तर्क का औचित्य

सवाईसिंह शेखावत कुलदीप कुमार का आलेख ‘शब्द छल के सहारे’ (14 दिसंबर) भाजपा के कुनबे की कथित राष्ट्रवादी हरकतों का जायजा लेते हुए उसके राष्ट्रविरोधी चेहरे को बेनकाब करता है। उन्हें यह बात भी हैरान करती है कि आर्थिक विकास और नागरिक कल्याण के एजेंडे को मुद्दा बना कर सत्ता में आई भाजपा सरकार आज […]
Author December 21, 2014 13:46 pm

सवाईसिंह शेखावत

कुलदीप कुमार का आलेख ‘शब्द छल के सहारे’ (14 दिसंबर) भाजपा के कुनबे की कथित राष्ट्रवादी हरकतों का जायजा लेते हुए उसके राष्ट्रविरोधी चेहरे को बेनकाब करता है। उन्हें यह बात भी हैरान करती है कि आर्थिक विकास और नागरिक कल्याण के एजेंडे को मुद्दा बना कर सत्ता में आई भाजपा सरकार आज क्यों वास्तविक मुद्दों को भुला कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद के एजेंडे में उलझ कर रोज अपनी भद पिटवा रही है। वे पिछले दिनों घटे समूचे घटनाक्रम का जायजा लेते हुए गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करने, धर्मांतरण को ‘पुरखों की घर वापसी’ का नाम देकर आगरा की झुग्गी बस्तिों में रहने वाले गरीब मुसलमानों को लोभ-लालच देकर धर्म परिवर्तन कराने, राष्ट्रीय शिक्षा नीति के नाम पर नैतिक और आध्यात्मिक शिक्षा की दुहाई देते हुए केंद्रीय विद्यालयों से जर्मन भाषा को हटा कर संस्कृत लाने, संप्रदाय विशेष के लोगों को ‘रामजादे’ की तुक पर ‘हरामजादे’ कहने, महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को सच्चा राष्ट्रभक्त बताने, ताजमहल को हिंदू राजा का महल सिद्ध करने और भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के अध्यक्ष द्वारा रामायण, महाभारत जैसे महाकाव्यों में वर्णित घटनाओं को वास्तविक बताने जैसी सभी दलीलों पर सिलसिलेवार अपनी बात रखते हैं।

अपने विस्तृत अध्ययन और निरपेक्ष विश्लेषण के जरिए कुलदीप कुमार समय-समय पर महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मुद्दों को उठाते रहे हैं। इस लेख में उठाए गए तमाम मुद्दे निश्चय ही सामाजिक समरसता और राष्ट्र के वर्तमान तथा भविष्य से जुड़े होकर उसे प्रभावित करने वाले भी हैं। वास्तविकता यही है कि आज देश का आम नागरिक भी भाजपा की इन खुली भूल-गलतियों को लेकर दुखी, हैरान और परेशान है। उसे यह समझ नहीं आ रहा कि देश के संतुलित आर्थिक विकास, सामाजिक समरसता और सवा सौ करोड़ भारतीयों के समग्र विकास का नारा देकर केंद्र में स्पष्ट बहुमत प्राप्त करने वाली सरकार को यह सब करने की जरूरत क्यों आ पड़ी है? भाजपा की ये तमाम राष्ट्रवादी हरकतें राष्ट्र को जोड़ने के बजाय तोड़ने का काम कर रही हैं। इसीलिए भाजपा के इस शब्द-छल के भुलावे में अब कोई आने वाला नहीं है और आने वाले दिनों में भाजपा को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।

आज देश का अदना-सा नागरिक भी इस बात को बखूबी जानता है कि जिस राम ने घर-परिवार, रिश्ते-नाते, समाज और राष्ट्र की एकता के लिए अपना समूचा जीवन न्योछावर कर दिया और उनके इस महिमामय जीवन-चरित्र को वाल्मीकि और तुलसीदास जैसे संतों ने समूचे विश्व में प्रतिष्ठा दिलाई थी। वही मर्यादा पुरुषोत्तम राम आज भाजपा के कुनबे की हरकतों के चलते हिंदुओं के एजेंट करार दिए जा रहे हैं। अब जबकि बाबरी मस्जिद और रामलला मंदिर का मसला सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है, तो फिर आए दिन राम मंदिर निर्माण की धमकियां क्यों दी जा रही हैं? जिनसे देश का सामाजिक सद्भाव बिगड़ने का अंदेशा है, उधर सरकार ऐसे लोगों के विरुद्ध कोई कार्रवाई करना तो दूर, उन्हें बरज तक नहीं रही।

ऐसे प्रत्यक्ष-परोक्ष छल-छद्म को हर हाल में बेनकाब किया जाना चाहिए। गलत चीजों और गलत प्रवृत्तियों पर समय रहते अंकुश नहीं लगाने से उसके दूरगामी बुरे परिणाम समूचे राष्ट्र को भुगतने पड़ते हैं। अगर इन तमाम मुद्दों में से केवल गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित किए जाने वाले मुद्दे पर बात की जाए तो कई सवाल एक साथ उठ खड़े होंगे। सबसे पहली बात तो यही कि गीता की महिमा आज जिस रूप में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर है, उसे देखते हुए क्या जरूरत आ पड़ी है उसे राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित किए जाने की? शायद विश्व के किसी भी देश में राष्ट्रीय ग्रंथ जैसी कोई परंपरा नहीं है।

अगर भाजपा की मौलिक मेधा (?) ऐसा कोई प्रस्ताव लाती है, तो समूचे देश में बेवजह एक विवाद बढ़ने का अवसर मिलेगा। हिंदुओं के अलावा अन्य सभी मतों-पंथों को अपने धार्मिक ग्रंथों को लेकर कमतरी का अहसास होगा और लगेगा कि कोई चीज उन पर जबरदस्ती थोपी जा रही है। यह एक ऐसा व्यर्थ उद्यम है, जिसकी क्षतिपूर्ति किसी भी तरह संभव नहीं। और फिर वही मूल बात कि भाजपा ऐसे व्यर्थ बखेड़े खड़े कर क्यों चीजों का कद घटाने पर आमादा है। जहां तक गीता का प्रश्न है, वह निर्विवाद रूप से एक वैश्विक ग्रंथ है। उसकी प्रतिष्ठा विश्व के सामान्य जन से लेकर बुद्धिजीवियों में भी समान रूप से है। मुसलिम विद्वानों के जरिए जब इसके अनुवाद यूरोपीय देशों में पहुंचे तो अन्य धर्मों को मानने वाले विद्वानों ने भी उन्हें सिर माथे लिया। ऐसी अनूठी वैश्विक धरोहर को भाजपा की विदुषी विदेशमंत्री राष्ट्रीय ग्रंथ का नाम देकर क्यों उसे एक हिंदू ग्रंथ बनाने पर उतारू हैं?

मगर कुलदीपजी से शिकायत है कि इस विषय को लेकर तमाम अच्छी और प्रासंगिक बातें करते हुए उन्हें संविधान प्रदत्त नागरिकता, धर्म, जाति, क्षेत्र, लिंग की समानता के संदर्भ में गीता की चतुर्वर्ण-व्यवस्था और स्त्री, वैश्य और शूद्रों की पाप योनियों के प्रसंग क्यों याद आए? सभी जानते हैं कि प्राचीन काल से लेकर द्वापर तक में (गीता के रचे जाने के समय) भारत में कठोर वर्ण-व्यवस्था लागू थी। उसे लेकर ऋषि मनीषा का अपना आध्यात्मिक-वैज्ञानिक विवेचन भी रहा है। वह आज हमें गलत लग सकता है, मगर गीता तो अपने समय-संदर्भ और अपने समय की सामाजिक संरचना के क्रम में ही बात कहेगी। ऐसे कुछ और भी श्लोक ढंूढ़ कर लाए जा सकते हैं, जो आज हमें प्रासंगिक न लगें।

सवाल है कि ऐसे दो या अधिक श्लोंकों के हटा देने के बाद क्या गीता को राष्ट्रीय-ग्रंथ के रूप में स्वीकार किया जा सकता है? कुलदीपजी आज दरअसल, सवाल अच्छे-बुरे या प्रासंगिक-अप्रासंगिक का है ही नहीं। अपनी कथित आधुनिकता या अग्रगामी सोच में आज हम प्राचीनों की तुलना में अधिक पिछड़े और तंग सोच वाले होते जा रहे हैं। नहीं तो क्या कारण रहा कि मुगल साम्राज्य के शीर्ष दौर में रहीम राम की गुण गाथा गाते हैं और रसखान कृष्ण की भक्ति में ऐसे पद रचते हैं, जिन्हें इस्लाम की आज की अवधारणा के अनुसार सर्वथा कुफ्र में शुमार किया जाए। लेकिन उस समय उन्हें लेकर न बादशाह को, न उलेमा को और न जन सामान्य को कभी कोई उज्र रहा। इसलिए आज और अब भी तमाम गलत बातों की भर्त्सना करते हुए अपने प्रतिवादी तर्क के औचित्य को सिद्ध करने के लिए हमें गीता या अन्य किसी ग्रंथ को गरियाने की जरूरत नहीं है। इससे कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है- सिर्फ अपने आप को कुछ अधिक निरपेक्ष और प्रासंगिक सिद्ध करने के सिवा!

 

 

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