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साहित्य : समीक्षा की साख

गोपेश्वर सिंह हिंदी में जिस विधा की सर्वाधिक दुर्गति हुई है, वह है पुस्तक समीक्षा। फिलहाल पुस्तक समीक्षा लिखने-लिखाने का आलम प्राय: जुगाड़ उद्योग-सा है। पत्र-पत्रिकाओं के इस जरूरी हिस्से में खानापूरी-सी की जाती है। पुस्तक समीक्षा अब सीखने-सिखाने के लिए नहीं, बल्कि किसी को उठाने-गिराने के लिए की जाती है। कहा जा सकता है […]

Author May 31, 2015 3:46 PM

गोपेश्वर सिंह

हिंदी में जिस विधा की सर्वाधिक दुर्गति हुई है, वह है पुस्तक समीक्षा। फिलहाल पुस्तक समीक्षा लिखने-लिखाने का आलम प्राय: जुगाड़ उद्योग-सा है। पत्र-पत्रिकाओं के इस जरूरी हिस्से में खानापूरी-सी की जाती है। पुस्तक समीक्षा अब सीखने-सिखाने के लिए नहीं, बल्कि किसी को उठाने-गिराने के लिए की जाती है। कहा जा सकता है कि पुस्तक समीक्षा अब शायद ही कोई पढ़ता है, सिवाय उनके जो लिखते हैं और जिन पर लिखा जाता है।

पुस्तक समीक्षा व्यावहारिक आलोचना की बुनियादी जमीन है। जो बढ़िया पुस्तक समीक्षा नहीं लिख सकता, वह बढ़िया आलोचना भी नहीं लिख सकता। साहित्यिक आलोचना के लिए जरूरी है- रचना के मर्म की पहचान। रचना की संवेदना, भाषा-शिल्प, अंतर्वस्तु आदि को पहचानने वाली सक्षम और निर्भीक दृष्टि से व्यावहारिक आलोचना बनती है। निश्चय ही, साहित्य-सैद्धांतिकी आलोचना में सहायक है, लेकिन वह व्यावहारिक आलोचना का विकल्प नहीं हो सकती। हिंदी और अन्य भाषाओं के जितने मान्य आलोचक हुए हैं, वे प्राय: समर्थ पुस्तक समीक्षक भी थे। ऐसे आलोचकों में रामचंद्र शुक्ल, नंददुलारे वाजपेयी, रामविलास शर्मा, नलिन विलोचन शर्मा, विजयदेव नारायण साही, नामवर सिंह या टीएस एलियट, एफआर लिविस आदि को याद किया जा सकता है।

जायसी, सूर और तुलसी की जो व्यावहारिक काव्य-समीक्षा शुक्लजी ने की, वह हिंदी आलोचना का शुक्ल पक्ष है। रचना की व्यावहारिकता की पहचान का ही एक नमूना केशवदास संबंधी उनकी टिप्पणी है। शुक्लजी के यह लिखने के बाद कि ‘केशव को कवि-हृदय नहीं मिला था’, आज तक कोई केशव-प्रेमी उन्हें कवि-हृदय नहीं दिला सका! ‘तारसप्तक’ पर ‘प्रयोगवादी रचनाएं’ शीर्षक से नंददुलारे वाजपेयी लिखित सुदीर्घ समीक्षा ने ऐसी बहस को जन्म दिया कि ‘प्रयोगवाद’ नाम ही चल निकला। यह एक काव्य-संकलन की समीक्षा का कमाल था। ‘डॉ जिवागो’ और ‘बूंद और समुद्र’ जैसी कृतियों की समीक्षा के जरिए रामविलास शर्मा ने इस विधा के प्रति जो गंभीरता दिखाई, वह उनकी आलोचना का स्थायी आधार बनी।

जब कोई ‘मैला आंचल’ का नाम भी नहीं ले रहा था, तब नलिन विलोचन शर्मा ने उसकी समीक्षा के जरिए ऐसा धमाका किया कि रेणु यकायक चमक उठे। नलिनजी के शब्दों में ‘गोदान’ के बाद हिंदी उपन्यास में जो गत्यवरोध था, वह ‘मैला आंचल’ के प्रकाशन से दूर हुआ। नामवर सिंह की आलोचना-दृष्टि में भी समकालीन रचनाशीलता के बीज विद्यमान रहे हैं। ‘परिंदे’, ‘वापसी’ और ‘अपने-अपने राम’ जैसी कृतियों पर उनकी लिखी समीक्षाओं की अनुगूंज अब भी हिंदी आलोचना में सुनाई पड़ती है।

‘अलग-अलग वैतरणी’ की ‘सलीके से कथा कहने की शैली’ शीर्षक साही लिखित समीक्षा को भला कौन भुला सकता है? व्यावहारिक आलोचना का सुंदर उदाहरण एफआर लिविस की प्रसिद्ध पुस्तक ‘दि ग्रेट ट्रेडिशन’ है, जिसमें ‘दि पोर्ट्रेट ऑफ अ लेडी’ समेत कुछ अन्य उपन्यासों की गहन समीक्षा प्रस्तुत की गई है। टीएस एलियट द्वारा संपादित ‘क्राइटेरियन’ और लिविस द्वारा संपादित पत्रिका ‘स्क्रूटनी’ में प्रकाशित समीक्षाएं पुस्तक समीक्षा का मानक इतिहास हैं।

आलोचकीय विवेक और निर्भीकता के बिना पुस्तक समीक्षा संभव नहीं। समीक्ष्य विषय पर अधिकार होने पर ही आलोचक कृति के साथ न्याय कर सकता है। ‘उर्वशी’ की भगवतशरण उपाध्याय लिखित ऐतिहासिक समीक्षा को याद कीजिए। उसकी गूंज आधुनिक हिंदी कविता के चर्चा-क्रम में अब भी सुनाई पड़ती है। हालांकि उस समीक्षा में सहृदयता और संवेदनात्मक सहयात्रा का अभाव है, फिर भी जिस तैयारी के साथ वह लिखी गई है, उसे समीक्षा-कर्म में रुचि रखने वालों को अवश्य देखना चाहिए। देवीशंकर अवस्थी ने हजारीप्रसाद द्विवेदी के निर्देशन में शोध किया था, लेकिन जब उन्होंने उनके उपन्यास ‘चारु चंद्र लेख’ की समीक्षा लिखी तो गुरुभक्ति आड़े नहीं आई। शीर्षक ‘टूटा हुआ दर्पण’ से ही पता चलता है कि समीक्षा कितनी कड़ी और निर्भीक रही होगी।

भगवतशरण उपाध्याय की पुस्तक ‘समीक्षा के संदर्भ’ और देवीशंकर अवस्थी संपादित ‘विवेक के रंग’ में संकलित समीक्षाओं को देख कर अंदाजा लगाया जा सकता है कि तब समीक्षा के मानदंड कितने ऊंचे थे। लेखक की सामाजिक हैसियत, उससे वैचारिक समानता और निजी संपर्क आदि सटीक समीक्षा की राह के रोड़े नहीं थे।

पुस्तक समीक्षा की अधोगति के बहुतेरे कारण हैं। आज हिंदी में व्यापक सरोकारों वाली उस दृष्टि का अभाव है, जो बिना किसी वैचारिक दुराग्रह के अपने समय की रचनाशीलता से संवाद करती और पाठक को आलोचनात्मक विवेक देती है। नंददुलारे, रामविलास, नलिन, साही, नामवर आदि पर और चाहे जो आरोप लगें, पर यह नहीं कहा जा सकता कि उनकी दृष्टि में हिंदी का व्यापक परिदृश्य नहीं था और वे अपने विरोधी विचार के लेखकों को नहीं पढ़ते थे। बाद के लोगों में बहुतेरे ऐसे मिलेंगे, जो साहित्य सिद्धांत के क्षेत्र में दुनिया भर के चिंतकों-विचारकों के नाम गिनाएंगे, लेकिन जब व्यावहारिक आलोचना करेंगे तो अपने वैचारिक बाड़े के बाहर झांकना उन्हें गवारा न होगा।

मामला सिर्फ वैचारिक आधार पर वामपंथी-गैरवामपंथी विभाजन का नहीं, बल्कि जो अलग-अलग संगठन और गुट हैं, उनकी साहित्यिक पहलकदमी का भी है, जिसके तहत अपनों को उठाने और अन्यों को गिराने की तिकड़में की जाती हैं। प्रगतिशीलता/ जनवाद जब व्यापक आंदोलन न रह कर, कुछ लोगों का क्लब बन जाए तो उससे आलोचनात्मक वातावरण तो दूषित होगा ही, हुआ भी है। प्रगतिशीलता/ जनवाद का कथित विरोधी जो कलावादी शिविर है उसकी समीक्षा-आलोचना का भी वही हाल है। निष्कर्ष यह कि सबको अपने-अपने शिविर की पड़ी है। जो शिविरबद्ध नहीं होंगे, मारे जाएंगे!

समीक्षात्मक माहौल को दूषित करने में समीक्षक, संपादक और रचनाकार- तीनों की भूमिका है। अधिकतर संपादक पुस्तक समीक्षा को एक कर्मकांड भर मानते हैं। इसलिए छप रही हजारों किताबों में से किनकी समीक्षा जरूरी है और किनको कूड़ेदान में डालना है, इसकी न उन्हें समझ है, न उनके पास फुरसत और न उनमें इसके लिए जरूरी निर्भीकता। उनके दफ्तर में जो हाजिरी बजाते हैं, जो उनके लग्गू-भग्गू हैं, वे उन्हें उतावले लेखकों की समीक्षार्थ आई किताबें पकड़ा देते हैं। समीक्षा के लिए काबिल और विषय-विशेषज्ञ समीक्षकों की सूची कितने संपादकों के पास है? परिणाम यह है कि कोई भी लल्लूलाल समीक्षक बन बैठता है। उसकी समीक्षा रसूखदार लेखकों से संपर्क की सीढ़ी भर होती है।

रचनाकार भी समीक्षक से प्राय: प्रशंसा सुनना चाहते हैं। वे अपने रसूख का इस्तेमाल करते हैं, हजारों-हजार खरच कर, खूब खिला-पिला कर, बड़े धूम-धड़ाके से अपनी किताब का लोकार्पण कराते हैं, प्रशंसकों की भीड़ जुटाते हैं, फिर उन्हीं से अपनी किताब की मनमाफिक समीक्षाएं लिखवाते हैं। अपनी रचना पर विपरीत टिप्पणी कोई नहीं सुनना चाहता। अगर किसी समीक्षक ने सही बात कह दी और किताब की प्रतिकूल समीक्षा लिख दी तो रचनाकार उसे अपना शत्रु मान लेता है। प्राय: रचनाकार यह मानते हैं कि जो मेरी रचना का मित्र नहीं, वह मेरा भी मित्र नहीं है। स्वाभाविक है कि समीक्षा के नाम पर चापलूसी छपती है। योग्यतम लोग भी सही बात कहने से बचने लगे हैं। ऐसा नहीं है कि खरा-खरा कहने, छापने और सुनने वाले समीक्षक, संपादक और रचनाकार नहीं हैं, लेकिन वे अपवादस्वरूप हैं।

यह विमर्शों से बाढ़ग्रस्त समय है। विमर्श की साहित्य रचना में अपनी सकारात्मक भूमिका है, लेकिन उसकी अतिरेकी असहिष्णुता स्वस्थ आलोचना में बाधक बनने लगी है। पुस्तक समीक्षा की दुर्दशा के लिए विमर्शमूलक समीक्षाएं भी कम दोषी नहीं हैं। विमर्शधर्मी किताबों की समीक्षा का आधार अब उसकी साहित्यिकता नहीं, विमर्श के वे औजार हैं, जो समाज और राजनीति की व्याख्या में इस्तेमाल होते हैं, जिसे पढ़ने के बाद यह तय करना मुश्किल होता है कि आप किसी साहित्यिक कृति की समीक्षा पढ़ रहे हैं या किसी सामाजिक-राजनीतिक कार्रवाई का विवरण। ऐसी समीक्षाओं में भाषा-भाव का एकसापन होता है।

पिछले दो दशक की पुस्तक समीक्षाओं की भाषा और उनमें प्रयुक्त पदों पर गौर करें तो पाएंगे कि कुछ सामान्य जुमले हैं, जो किसी भी रचनाकार की किताब पर फिट कर दिए जाते हैं। पाठकों को ऐसे तमाम जुमले याद होंगे, जैसे- ‘लेखक ने यथार्थ की नई जमीन तोड़ी है’, ‘इन्होंने हिंदी कविता को नया मुहावरा दिया है’, ‘नई काव्य-भाषा ईजाद की है’, ‘अपने समय के साथ मुठभेड़ की है’, ‘लेखक ने अपने समय से साक्षात्कार किया है’, ‘यह कठिन समय है’, ‘यह अपने समय में रचनात्मक हस्तक्षेप है’ आदि। बहुत संभव है ऐसा लिखने वाले समीक्षक को समीक्ष्य कृति के पहले की भाषा, अंतर्वस्तु आदि की बारीकियों की जानकारी तक न हो। बहुत बार वह जिस ‘नएपन’ की चर्चा कर रहा होता है, उसके बारे में आप पूछें तो वह बगलें झांकने लगेगा। ऐसे में आलोचना के नए प्रतिमान गढ़ने वाली समीक्षा की उम्मीद कैसे की जा सकती है?

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