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पुस्तकायन : राजकमल का संसार

ओमप्रकाश झा देवशंकर नवीन की नई पुस्तक राजकमल चौधरी- जीवन और सृजन राजकमल चौधरी का समग्र पता देती है। राजकमल चौधरी हाल के वर्षों तक एक अबूझ पहेली बने हुए थे। ढाई-तीन दशक पहले तक तो उनकी रचनाएं उपलब्ध नहीं थीं। ‘मछली मरी हुई’ और ‘मुक्तिप्रसंग’ के अलावा छिटपुट रचनाएं ही मुश्किल से उपलब्ध थीं। […]
Author November 30, 2014 12:10 pm

ओमप्रकाश झा

देवशंकर नवीन की नई पुस्तक राजकमल चौधरी- जीवन और सृजन राजकमल चौधरी का समग्र पता देती है। राजकमल चौधरी हाल के वर्षों तक एक अबूझ पहेली बने हुए थे। ढाई-तीन दशक पहले तक तो उनकी रचनाएं उपलब्ध नहीं थीं। ‘मछली मरी हुई’ और ‘मुक्तिप्रसंग’ के अलावा छिटपुट रचनाएं ही मुश्किल से उपलब्ध थीं। लिहाजा, उनका रचनात्मक मूल्यांकन कम हो पाता था। उनकी मृत्यु के बाद पत्रिकाओं में छपे अवांतर संस्मरणों को पढ़ कर पाठक दिग्भ्रमित हो जाते थे।

मात्र तेरह वर्ष की आयु में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में कूद जाने वाले, साहित्य को समाज का सच्चा दिग्दर्शक समझने वाले, लेखकीय दायित्व से परिपूर्ण राजकमल चौधरी को मात्र साढ़े सैंतीस वर्ष की आयु मिली। पिछले तीन दशक में देवशंकर नवीन ने जहां-तहां बिखरी उनकी रचनाएं एकत्र कर सूक्ष्मतर व्याख्या के साथ कई संकलन प्रकाशित कराए हैं। उसी शृंखला में उनके जीवन और समग्र लेखन की मुकम्मल व्याख्या के साथ प्रकाशित इस समालोचना पुस्तक से सारी स्थितियां स्पष्ट हुई हैं।

यह विश्लेषणपरक पुस्तक न केवल राजकमल चौधरी के जीवन और लेखन से संबंधित तमाम भ्रांतियों को साफ कर अपने समय के एक बड़े लेखक के कृतित्व की समृद्ध समालोचना प्रस्तुत करती है, बल्कि राजकमल के अध्येताओं को मूल्यांकन की एक चाबी भी थमाती है। जनजीवन की हताशा और शासकीय कू्ररताओं के जिस दौर की मानवीय संवेदना राजकमल के रचना संसार का मूल विषय है, उसमें साहित्य को कैसे पढ़ें से अधिक प्रयोजनीय यह समझ है कि राजकमल-साहित्य को कैसे न पढ़ें। इस पुस्तक से ये दोनों बातें पता चलती हैं।

लेखक ने यहां बड़ी साफगोई से रेखांकित किया है कि राजकमल के लेखन का उद्देश्य आत्मस्थापन या आत्मविज्ञापन नहीं था, किशोरावस्था में देखे-भोगे स्वाधीनता-संग्राम के नागरिक उत्साह और युवावस्था में देखी आजादी के भग्न स्वरूप में तालमेल बिठाने पर वे आहत हो उठे थे। बुद्धिजीवियों के पाखंड और कुछेक समकालीन रचनाकारों की लोलुपता से परेशान थे। उनका पूरा रचनाकर्म मोहभंग युगीन संवेदनशील समाज की नई आशाओं और मानवीयता के पक्षधर समाज की संकल्पना का साहित्य है, जिसमें अंतत: जन-सत्ता पर अकूत आस्था दिखाई गई है।

नई कहानी और नई कविता आंदोलन के दौर में रचनारत होने के बावजूद राजकमल चौधरी उनके रचनात्मक सूत्रों के प्रभामंडल में नहीं थे। किसी झंडे से बंधे बगैर उन्होंने अपनी रचनाधारा का अलग ही विधान अख्तियार किया, अपनी विशिष्ट छवि बनाई। यहां तक कि अकविता आंदोलन के पुरोधा कवि होने के बावजूद उस धारा से देर तक बंधे नहीं रहे। देवशंकर नवीन ने यहां राजकमल चौधरी की हिंदी और मैथिली की सभी विधाओं की रचनाओं पर गंभीरतापूर्वक विचार किया है, और अध्येताओं को उनकी रचनाओं के मर्म तक पहुंचने के आसान सूत्र दिए हैं। हालांकि जितने इत्मीनान से उन्होंने उनकी कविता, कहानी और वैचारिक स्थापनाओं पर विचार किया है; वैसा विस्तार उपन्यास, नाट्यलेखन और पत्र-डायरी के बारे में नहीं है।

एक तरफ ‘अपनी रचनाओं के बूते मीनार की तरह खड़े’ राजकमल चौधरी का छोटा-सा जीवन-फलक विडंबनाओं का भंडार है; तो दूसरी तरफ अल्पायु में रची गई विभिन्न भाषाओं की उनकी विपुल रचनाएं हैं। जाहिर है कि घटनाबहुल उनकी छोटी-सी जिंदगी और विशाल रचना-कर्म को एक पुस्तक में समेट पाना चुनौती भरा काम था, पर देवशंकर नवीन ने इस पुस्तक में इस चुनौती को बड़े उदात्त भाव से स्वीकार किया और तटस्थ आलोचक की वैज्ञानिक दृष्टि के साथ सर्जक की कोमलता के सुंदर समागम का परिचय दिया है।

राजकमल चौधरी के जीवन और साहित्य में आत्मदर्शन और अस्तित्वबोध इस हद तक मौजूद है कि सही स्थिति का निरूपण एक श्रमसाध्य कार्य है। उनका मूल्यांकन पूर्वग्रह मुक्त हुए बिना असंभव था। खुद राजकमल ने जीवनपर्यंत अपनी रचनाओं के माध्यम से पूर्वग्रह और दोहरे मानदंडों का खंडन किया। इस पुस्तक के एक अध्याय ‘दोहरी जिंदगी नहीं चाहिए’ में लेखक ने उनके जीवन और लेखन के साम्य का सांगोपांग वर्णन करते हुए निर्णय दिया है कि खुली किताब की तरह जीवन व्यतीत करने वाले राजकमल चौधरी सतत मानव-जीवन के यथार्थ की खोज में लगे रहे।

आलोचनात्मक कृति होने के बावजूद यह पुस्तक बार-बार शरतचंद्र के जीवन पर आधारित विष्णु प्रभाकर की कृति ‘आवारा मसीहा’ की याद दिलाती है। राजकमल चौधरी के जीवन-प्रसंगों के सहारे उनकी रचनाओं की व्याख्या भी एक कथा-सूत्र में बंधी है। यह उल्लेख प्रासंगिक होगा कि सामाजिक नैतिकता के ठेकेदारों द्वारा वर्जित राह पर निकल पड़ने और पूरे साहस के साथ अपने ‘कृत्य’ को स्वीकार करने में राजकमल चौधरी भी शरतचंद्र की तरह ही अग्रगण्य थे। जीवनी और आलोचना के समांग मिश्रण के रूप में राजकमल चौधरी के अध्येताओं के लिए यह एक अनिवार्य संदर्भ ग्रंथ है।
राजकमल के जीवन, लेखन और समाज से जुड़े चर-अचर कई संदर्भों के चित्रण का यहां सम्यक समावेश है। नागरिक परिदृश्य के जीवन-जतन, चेतन-अभिलाषा, संस्कृति-समाज जैसे उपस्करों का दोहन देवशंकर नवीन के आलोचना कर्म की रोचक वृत्ति है। पूरी विवेचना पद्धति में स्थान-काल-पात्र, सामाजिक पृष्ठभूमि, रचनात्मक मनोभूमि का विश्लेषण उन्होंने बड़ी पैनी नजर से किया है, इस क्रम में वे कहीं राजकमल चौधरी के वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन से चूकते नहीं दिखते। राजकमल के बारे में औरों की मुग्ध-टिप्पणियों के बीच जब तब अपना भी मंतव्य रख देने की लेखक की शैली एक तरफ पाठकों को नई दृष्टि से विचार करने को प्रेरित करती है, तो दूसरी तरफ उन टिप्पणियों को भी परिमार्जित करती है।

स्वातंत्र्योत्तर काल के मोहभंग के कारण समाज से कट कर आत्मकेंद्रित हो रही नई पीढ़ी की अगुआई करने वाले अग्रणी रचनाकार राजकमल चौधरी के जीवन और समग्र लेखन पर एकाग्र यह पहली और अब तक अकेली पुस्तक कोई आकाश कुसुम तोड़ लाई है, ऐसा दावा नहीं किया जा सकता, पर नई पीढ़ी के अध्येताओं को अब किसी भ्रांति का शिकार नहीं होना पड़ेगा, वे तटस्थ और सही मूल्यांकन की ओर अग्रसर होंगे, ऐसी आशा निश्चय ही की जा सकती है। देवशंकर नवीन की यह पुस्तक संभवत: साहित्यालोचन की वह जड़ता तोड़ेगी, जिसके लिए राजकमल चौधरी जीवन भर प्रयास करते रहे।

राजकमल चौधरी- जीवन और सृजन: देवशंकर नवीन; प्रकाशन विभाग, सूचना भवन, सीजीओ कांपलेक्स, लोदी रोड, नई दिल्ली; 185 रुपए।

 

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