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अप्रासंगिक : पेशेवर की नैतिकता

अपूर्वानंद प्रफुल्ल बिदवई की मौत के सदमे के बीच मैं उनके काम के बारे में सोचने की कोशिश कर रहा हूं। कुछ महीने पहले उनसे हुई बात याद आई। वे किसी समाचार-वेबसाइट के लिए उच्च शिक्षा में हो रही तब्दीलियों पर लिख रहे थे। वे अपनी हर जानकारी पर न सिर्फ मेरी राय जानना चाहते […]

Author June 28, 2015 4:45 PM

अपूर्वानंद

प्रफुल्ल बिदवई की मौत के सदमे के बीच मैं उनके काम के बारे में सोचने की कोशिश कर रहा हूं। कुछ महीने पहले उनसे हुई बात याद आई। वे किसी समाचार-वेबसाइट के लिए उच्च शिक्षा में हो रही तब्दीलियों पर लिख रहे थे। वे अपनी हर जानकारी पर न सिर्फ मेरी राय जानना चाहते थे, बल्कि उसके लिए क्या दस्तावेजी बुनियाद है और क्या प्रमाण हैं, इसकी पुख्तगी चाहते थे। एक रोज में थोड़ी-थोड़ी देर पर आए कोई बीसेक फोन से मैं समझ पाया कि किसी मुद्दे पर अपनी विचारधारात्मक पोजीशन से कहीं ज्यादा जरूरी उनके लिए ब्योरे और हर ब्योरे की सत्यता की कड़ी परख थी। एक छोटी रिपोर्ट लिखने के क्रम में उनका यह शोधाग्रह मेरे लिए किंचित विस्मयकारी था, क्योंकि आखिर वे पत्रकार ही थे और हम अपने शोध छात्रों को पत्रकारी किस्म के लेखन से परहेज की सलाह देते रहे हैं।

प्रफुल्ल पत्रकार थे, साथ ही पूरे पेशेवर भी। अपने पेशे की गरिमा से समझौता करना उन्हें गवारा न था, इसलिए वे पक्का कर लेना चाहते थे कि उनके हाथ से निकली रिपोर्ट में मात्र उनका आग्रह न बोल रहा हो। आग्रह या पूर्वग्रह और पेशेवरी के बीच द्वंद्व में किसे तरजीह देना चाहिए, यह एक पेशेवर ही बता सकता है।

आग्रह निजी हो सकते हैं, धार्मिक, नैतिक, राष्ट्रहित से प्रेरित, विचारधारात्मक या सत्ता के, कुछ भी। मौके आते हैं, जब इनके और पेशे की मांग के बीच चुनाव करना पड़ता है। प्रफुल्ल असंदिग्ध वामपंथी थे, लेकिन वामपंथ में अगर कोई पेशेवराना अनिवार्यता है तो वह है साधारण जनता के हित से प्रतिबद्धता। अगर वह पार्टी हित से टकरा रहा हो तो एक पेशेवर क्रांतिकारी का चुनाव स्पष्ट होगा।
प्रफुल्ल ने नंदीग्राम या सिंगूर कांड के समय यही पेशेवर रुख लिया और स्थापित वामपंथी दलों के खिलाफ गए। यह ठीक उलट था कई पेशेवर अर्थशास्त्रियों और अध्यापकों के, जिन्होंने उस वक्त पार्टी को तरजीह दी। इससे उनकी पेशेवर छवि पर क्या असर पड़ा, इसे लेकर उन्होंने कभी विचार किया हो, इसके सबूत नहीं। भारत में वामपंथी आंदोलन पर एक पुस्तक इसी पेशेवर शोधार्थी के श्रम से उन्होंने पूरी की, जो प्रकाश्य है। हो सकता है, इसमें उनका शोध उनकी इच्छाओं के विरुद्ध जा रहा हो।

इसी बीच टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च के वैज्ञानिक मयंक वहिया ने ‘करेंट साइंस’ पत्रिका में भारतीय अतीत के पेशेवर अध्ययन के भविष्य पर चिंता जाहिर की है। उनके मुताबिक ‘संकीर्ण राष्ट्रवादी’ आग्रहों को सत्ता द्वारा प्रश्रय दिए जाने और उनके प्रचार-प्रसार ने भारतीय अतीत के तार्किक और यथार्थपरक अध्ययन को इतना बदनाम कर दिया है कि कोई पेशेवर वैज्ञानिक इस क्षेत्र में आने से हिचकेगा।

शोध का पेशा किसी भी वैचारिक आग्रह को शोध की पद्धतिगत दृढ़ता के ऊपर तरजीह नहीं दे सकता। जब कोई कहता है कि उसका मानना है कि आर्य भारत से बाहर गए थे, इसे सिद्ध करने के लिए शोध होगा, तो वह शोध की पेशेवर गरिमा से समझौता कर रहा है। या अगर कोई इतिहासकार अशोक को कुशवाहा सम्राट घोषित करता है तो वह अपने पेशे के साथ धोखा कर रहा है।

मयंक की इस चेतावनी के साथ ही मुंबई हाईकोर्ट की वकील रोहिणी सालियन के इंटरव्यू को पढ़ा जाना चाहिए। वे 2008 के कुख्यात मालेगांव विस्फोट कांड में विशेष सरकारी अभियोजक हैं। एक दुर्धर्ष पेशेवर वकील के रूप में ख्यात रोहिणी ने अनेक मामलों में राज्य के लिए, जो समाज का प्रतिनिधि है, मुकदमे जीते हैं। 2014 में सरकार बदलने के बाद अब उन पर नेशनल इनवेस्टिगेटिव एजेंसी की ओर से दबाव पड़ रहा है कि वे इस मामले में राज्य की ओर से पैरवी न करें।

रोहिणी ने दस साल तक सरकारी वकील रहने के बाद छुट््टी ली ही थी कि हेमंत करकरे ने उनसे मालेगांव का मामला हाथ में लेने का अनुरोध किया। तब तक धारणा थी कि इसमें ‘मुसलिम आतंकवादियों’ का हाथ है। लेकिन करकरे के कठिन और गहन अनुसंधान से पता चला कि इसमें वैसे व्यक्तियों और समूहों का हाथ है, जो भारत को हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते हैं। इस पड़ताल के कारण ही एक के बाद एक समझौता एक्सप्रेस, मक्का मस्जिद, अजमेर शरीफ और मोडासा के विस्फोटों में इन्हीं समूहों के हाथ का राज खुला। इसने जांच की दिशा बदल दी। हेमंत करकरे की मुंबई पर आतंकवादी हमले के दौरान मौत हो गई, लेकिन इन सारे मामलों को नेशनल इनवेस्टिगेटिव एजेंसी देख रही है और उसकी अदालत में इन पर बहस चल रही है।

अड़सठ साल की, अपने ही शब्दों में पक्की हिंदू, रोहिणी ने इन मामलों को अपनी पेशेवराना नैतिकता के तहत हाथ में लिया। अब एजेंसी की ओर से कहा जा रहा है कि वे हट जाएं। उनको शक है कि यह इसलिए किया जा रहा है कि आरोपियों के खिलाफ राज्य की ओर से मुकदमा कमजोर तरीके से लड़ा जाए, जिससे उनके पक्ष में निर्णय न आ सके।

एनआइए को मालूम है कि रोहिणी जैसी पेशेवर वकील को पथभ्रष्ट करना मुमकिन नहीं। इसलिए वह उन्हें हटने को कह रही है। अब तक माना जाता रहा था की एनआइए खुद एक पेशेवर संस्था है, लेकिन इस घटना से प्रतीत होता है कि वह अपनी पेशेवर भूमिका से अलग कोई और काम कर रही है। उसका काम हिंदू राष्ट्रवादियों की मदद करना नहीं, यह पता करना है कि किसने विस्फोट किए थे और अपराधियों को सजा दिलाना है। वे अपराधी हिंदू राष्ट्रवाद में विश्वास करते हैं या इस्लामी हुकूमत में, इससे उसके काम की दिशा तय नहीं होती।

रोहिणी चाहतीं तो एनआइए जैसा रुख ले सकती थीं। वे अपनी पेशेवरी से समझौता कर चैन की नींद सो सकती थीं। इसके उदाहरण कई हैं। हमने विश्वविद्यालय जैसी जगह में डीन, अध्यक्षों और प्रोफेसरों को खामोशी से वे प्रस्ताव लागू करते देखा है, जिनके बारे में वे स्वयं निश्चित नहीं हैं कि वे उनके विषय या शिक्षा मात्र के साथ न्याय करेंगे या नहीं। यह अपनी पेशेवर भूमिका का त्याग था, लेकिन उन्होंने ठीक इसी आधार पर अपने अविचारित कृत्य को उचित ठहराया कि वे अपने पेशे से बंधे हैं और इसमें वे उसका हुक्म मानने को मजबूर हैं, जिसके वे वेतनभोगी हैं।

रोहिणी सालियन से अलग रवैया राष्ट्रवादी वकील उज्ज्वल निकम का था, जिन्होंने अजमल कसाब के जेल में मटन-बिरयानी खाने की बात यों ही इसलिए उड़ाई थी कि जनमत को उग्र कर अदालत को प्रभावित किया जा सके। यह वही वकील कर सकता है, जिसे अपने पेशे के प्रति आदर नहीं है और जो अपना मकसद किसी भी रास्ते हासिल करना चाहता है।

तो, क्या पेशेवरी के प्रति आग्रह घट रहा है? इसका व्यक्ति और समाज के जीवन की गुणवत्ता के लिए क्या आशय है? जिस वातावरण में कोई पेशेवर राय न सुनी जाए वह समाज क्या अच्छा जीवन जी रहा है? क्या पेशेवर नैतिकता गुजरे जमाने की बात हो गई है? या पहले भी हमारे समाज में इसका विशेष आग्रह न था? आखिर एकलव्य और कर्ण के गुरुओं ने उनके साथ जो किया वह उनका अपने पेशे से घात नहीं तो और क्या था?

एक पेशेवर अपने धर्म को कैसे समझे? रॉबर्ट एफ कोचरन जूनियर ने उत्तर-आधुनिक दौर में पेशेवरी पर अपने एक लेख में न्यायमूर्ति क्लीमेंट हेंसवर्थ को उद्धृत किया है: वकील अपने मुवक्किलों की सेवा उनका चाकर हुए बिना करता है। वह मुवक्किल के न्यायपूर्ण और उचित उद्देश्य की पूर्ति के लिए काम करता है, लेकिन वकील कभी न भूले कि यहां स्वामी वही है। वह मुवक्किल के इशारे पर नाचने वाली कठपुतली नहीं। यह वकील को ही तय करना है कि कानूनन और नैतिक रूप से क्या ठीक है और बतौर पेशेवर वह अपने मुवक्किल की उस कोशिश के आगे हथियार नहीं डाल सकता कि वह इससे अलग कोई रास्ता ले…

पेशेवर होने का अर्थ अपने पेशे के धर्म की पहचान, उसके पालन के लिए आवश्यक पद्धति का दृढ़तापूर्वक पालन और उसकी नैतिकता के प्रति जवाबदेही है। वह किसी सत्ता की अधीनता नहीं है, चाहे वह पूंजी की हो या राज्य की या किसी विचारधारा की। अगर हम और कुछ न हों, सिर्फ अपने पेशे के प्रति उत्तरदायी हों तो बहुत सारे पापों से बच सकेंगे।

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