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निनाद : फासिज्म की आहट

कुलदीप कुमार फासिज्म एक सर्वसत्तावादी राजनीतिक विचार है। फासिस्ट व्यवस्था में सब कुछ एक व्यक्ति, एक विचारधारा और एक पार्टी द्वारा नियमित और संचालित होता है। लोकतंत्र और फासिज्म के बीच बुनियादी विरोध है, भले ही फासिज्म हमेशा लोकतांत्रिक रास्ते से चल कर ही सत्ता पर काबिज होता हो। फासिस्ट व्यवस्था में सर्वोच्च नेता का […]

Author May 31, 2015 4:04 PM

कुलदीप कुमार

फासिज्म एक सर्वसत्तावादी राजनीतिक विचार है। फासिस्ट व्यवस्था में सब कुछ एक व्यक्ति, एक विचारधारा और एक पार्टी द्वारा नियमित और संचालित होता है। लोकतंत्र और फासिज्म के बीच बुनियादी विरोध है, भले ही फासिज्म हमेशा लोकतांत्रिक रास्ते से चल कर ही सत्ता पर काबिज होता हो। फासिस्ट व्यवस्था में सर्वोच्च नेता का विरोध संभव नहीं, न ही अपना वर्चस्व जमा चुकी फासिस्ट विचारधारा का। राजनीतिक विश्लेषकों ने इन मुद्दों पर कम्युनिस्ट और फासिस्ट व्यवस्थाओं के बीच समानताएं भी रेखांकित की हैं, क्योंकि दोनों ही अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार समूचे समाज को नहीं, केवल कुछ गिने-चुने व्यवस्था-समर्थकों को देती हैं। इन व्यवस्था-समर्थकों में से भी नियमित रूप से उन्हें छांट कर अलग कर दिया जाता है जिनकी सर्वोच्च नेता के प्रति निष्ठा में जरा-सा भी संदेह पैदा हो गया हो। यानी केवल वैचारिक निष्ठा पर्याप्त नहीं होती, सर्वोच्च नेता के प्रति व्यक्तिगत निष्ठा को अधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है।

प्रसिद्ध अंगरेजी उपन्यासकार अरुंधति रॉय ने नरेंद्र मोदी सरकार को ‘लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई सर्वसत्तावादी सरकार’ बताया है। अक्सर अरुंधति रॉय अतिरेक का स्वर अपनाती हैं, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि उनकी बात में सत्यांश नहीं है, क्योंकि मोदी सरकार अपने वैचारिक कुल की वंश परंपरा का पालन करते हुए उसी दिशा में जा रही है। जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा को फासिस्ट कहा जाता है, तब लोग समझते हैं कि उसे गाली दी जा रही है। लेकिन सच्चाई यह है कि यह कोई गाली नहीं, एक सुस्पष्ट राजनीतिक अवधारणा है जिसके दर्शन संघ की बुनियादी विचारधारा में किए जा सकते हैं।

हालांकि अब संघ उस पुस्तिका को प्रचारित-प्रसारित नहीं करता (लेकिन उसने कभी उससे अपने-आपको अलग भी नहीं किया और न यह कहा कि उसमें व्यक्त विचारों से उसका कोई लेना-देना नहीं है), लेकिन इस विचारधारा का स्पष्ट रूप से प्रतिपादन संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधवराव सदाशिव गोलवलकर द्वारा 1939 में प्रकाशित ‘हम अथवा हमारी परिभाषित राष्ट्रीयता’ में किया गया है। इसके बाद भी समय-समय पर संघ के प्रकाशनों में इस बुनियादी सोच को व्यक्त किया जाता रहा है।

देश के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसी संघ के बाकायदा प्रशिक्षित स्वयंसेवक और प्रचारक (पूर्णकालिक कार्यकर्ता) हैं। उनसे पहले भारतीय जनता पार्टी के अटल बिहारी वाजपेयी भी देश के प्रधानमंत्री बने थे और वे भी संघ के प्रशिक्षित स्वयंसेवक और प्रचारक रह चुके थे। लेकिन उनमें और मोदी में यह फर्क था कि वाजपेयी राष्ट्रीय राजनीति में एक लंबी पारी खेलने के बाद प्रधानमंत्री बने थे, उनका संसदीय अनुभव काफी लंबा और गहरा था, देश के अन्य राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ उनका लंबे समय से मिलना-जुलना था और अपने लचीले स्वभाव के कारण उनकी व्यापक स्वीकार्यता थी। दूसरे, वह एक गठबंधन सरकार का नेतृत्व कर रहे थे और मिलीजुली सरकार की मजबूरियों के कारण उनके हाथ बंधे हुए थे।

लेकिन नरेंद्र मोदी का राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश ही प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में हुआ और इसके कुछ ही महीने बाद वे प्रधानमंत्री बन गए। उनकी भारतीय जनता पार्टी को लोकसभा में बहुमत प्राप्त है और उनके हाथ बंधे हुए नहीं हैं। राज्यसभा में जरूर उन्हें कुछ मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, पर वे मुश्किलें ऐसी नहीं जिनसे पार न पाया जा सके। पिछले एक साल में अपने निकटतम सहयोगी अमित शाह के जरिए पार्टी संगठन पर भी उनका वर्चस्व स्थापित हो चुका है और अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे शीर्षस्थ नेता अब लगभग इतिहास का हिस्सा बन चुके हैं। न नरेंद्र मोदी को अन्य राजनीतिक दलों के साथ काम करने का अनुभव है और न ही इस समय उन्हें इसकी जरूरत है।

इसलिए आश्चर्य नहीं कि वे निर्बाध गति और स्वच्छंद भाव से संघ के दर्शन को अमली जामा पहना रहे हैं। यों तो संघ का राष्ट्रीय जीवन के सभी क्षेत्रों में दखल है, लेकिन शिक्षा, इतिहास और संस्कृति में उसकी विशेष रुचि है, क्योंकि उसकी विचारधारा का आधार इतिहास और संस्कृति की उसकी अपनी विशिष्ट हिंदुत्ववादी समझ और व्याख्या है। इस समझ और व्याख्या को शिक्षा के क्षेत्र में वर्चस्व स्थापित करके ही फैलाया जा सकता है, इसलिए संघ अपनी अनगिनत शिक्षा संस्थाओं के माध्यम से दशकों से इस क्षेत्र में सक्रिय है।

सत्ता में आने के पहले से ही हिंदुत्ववादी विचारधारा का दबदबा बढ़ने लगा था। कांग्रेस का ढुलमुल रवैया इसे बढ़ाने के लिए काफी हद तक जिम्मेदार था। बुनियादी रूप से धर्मनिरपेक्ष कांग्रेस को समय-समय पर नरम सांप्रदायिकता लुभाती रही है और उसे लगता रहा है कि इसका तात्कालिक लाभ उठा कर वह कभी हिंदू, तो कभी सिख और कभी मुसलिम समुदाय का समर्थन हासिल करने में सफल हो जाएगी। अक्सर उसे अपने इस प्रयास में विफलता ही मिली है, लेकिन वह इस प्रलोभन का सामना करने में नाकाम ही रहती है।

इंदिरा गांधी ने 1984 में जम्मू में जिस प्रकार का हिंदूपरस्त भाषण दिया था और राजीव गांधी ने जिस तरह शाहबानो केस के फैसले के बाद मुसलिम कट्टरपंथियों के सामने और बाबरी मस्जिद के ताले खुलवा कर और फिर शिलान्यास करवा कर हिंदुत्ववादियों के सामने घुटने टेके, वह अभी तक लोग भूले नहीं हैं। सलमान रुश्दी के उपन्यास ‘द सेटेनिक वर्सेज’ पर राजीव गांधी की सरकार ने ही प्रतिबंध लगाया था, दुनिया के किसी भी देश से पहले। जब दिल्ली विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम से रामानुजन का रामायण पर बहुचर्चित और बहुप्रशंसित निबंध हटाया गया, तब मनमोहन सिंह की सरकार थी।

चूंकि अब देश की राजनीतिक फिजां बदली हुई है, इसलिए सरकार खुल कर खेल रही है। आइआइटी-मद्रास में छात्रों का एक आंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्किल है। उसके खिलाफ एक गुमनाम पत्र केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी को लिखा गया। उसमें आरोप लगाया गया कि यह स्टडी सर्किल प्रधानमंत्री मोदी और हिंदुओं के खिलाफ नफरत फैला रहा है। तत्काल इस गुमनाम पत्र का संज्ञान लेते हुए मंत्रालय के एक कनिष्ठ अफसर ने आइआइटी-मद्रास के निदेशक को पत्र लिखा। निदेशक ने बिना कोई जांच कराए, बिना छात्रों को अपनी सफाई में बोलने का मौका दिए, उस स्टडी सर्किल की मान्यता रद्द कर दी। उन पर आरोप है कि वे हिंदू धर्म को नष्ट करने का अभियान चला रहे हैं।

भाजपा की समस्या यह है कि उसके पास अपने महापुरुष नहीं हैं। इसलिए उसे यहां-वहां से महापुरुष जुटाने पड़ते हैं। नेताजी सुभाषचंद्र बोस, सरदार पटेल और भीमराव आंबेडकर- किसी की भी विचारधारा का संघ या उसके हिंदुत्व से दूर-दूर का भी रिश्ता नहीं। बोस पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति थे। सरदार पटेल भी मूल रूप से धर्मनिरपेक्ष थे, लेकिन अपने समय के बहुत-से कांग्रेसियों की तरह उनका झुकाव भी अपने हिंदू समुदाय की ओर अधिक था। जहां तक आंबेडकर का सवाल है, उन्होंने तो घोषणा की थी कि मैं हिंदू पैदा जरूर हुआ हूं, लेकिन हिंदू के रूप में मरूंगा नहीं।

मृत्यु से कुछ ही समय पहले वे हजारों अनुयायियों के साथ सार्वजनिक रूप से बौद्ध हो गए थे। 1927 में उन्होंने ‘मनुस्मृति’ की प्रतियां जलाई थीं। उनकी दृढ़ मान्यता थी कि हिंदू धर्म जाति पर आधारित है और अगर जाति नष्ट हो जाए तो यह धर्म भी नष्ट हो जाएगा। आंबेडकर के अनुयायी भले हर समय जाति-आधारित आरक्षण की बात करें, वे खुद इसके खिलाफ थे और दलितों को अपने पैरों पर खड़ा करना चाहते थे। उनका लक्ष्य जाति को समाप्त करना था, जाति-व्यवस्था को मजबूत करना नहीं। लेकिन संघ का इस बारे में क्या विचार है?

जब आंबेडकर की अध्यक्षता में संविधान समिति ने संविधान को अंतिम रूप दे दिया, तब संघ काफी नाखुश था क्योंकि इसमें ‘मनुस्मृति’ की व्यवस्थाओं को कोई जगह नहीं दी गई थी। 30 नवंबर, 1949 के अपने संपादकीय में उसके अंगरेजी मुखपत्र ‘ऑर्गनाइजर’ ने इस अप्रसन्नता को मुखर होकर व्यक्त किया था। 14 अगस्त, 1947 को उसने लिखा कि हिंदुस्थान में केवल हिंदू ही राष्ट्र का निर्माण करते हैं और इस ठोस बुनियाद पर ही राष्ट्रीय संरचनाओं को खड़ा किया जा सकता है, यानी हिंदू परंपराओं, संस्कृति, विचारों और आकांक्षाओं के आधार पर। ऐसे संगठन में प्रशिक्षित प्रधानमंत्री की सरकार भला कैसे आंबेडकर और पेरियार के विचारों का प्रचार-प्रसार होने दे सकती है?

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