अप्रासंगिक : हिंसक समय में चुप्पी - Jansatta
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अप्रासंगिक : हिंसक समय में चुप्पी

क्रोध कहां है? या क्षोभ? अठहत्तर साल के एक विद्वान, शोधकर्ता, अध्यापक, पूर्व कुलपति और लेखक की हत्या दिन दहाड़े कर दी जाए और कक्षाएं चलती रहें, शोध-संगोष्ठियां होती रहें, इससे बड़ा मजाक नहीं..

Author नई दिल्ली | September 6, 2015 3:38 PM
साहित्य अकादेमी पुरस्कार विजेता था, कर्नाटक के कन्नड़ विश्वविद्यालय का कुलपति रह चुका था।

क्रोध कहां है? या क्षोभ? अठहत्तर साल के एक विद्वान, शोधकर्ता, अध्यापक, पूर्व कुलपति और लेखक की हत्या दिन दहाड़े कर दी जाए और कक्षाएं चलती रहें, शोध-संगोष्ठियां होती रहें, इससे बड़ा मजाक नहीं। जो मारा गया, वह साहित्य अकादेमी पुरस्कार विजेता था, कर्नाटक के कन्नड़ विश्वविद्यालय का कुलपति रह चुका था। न तो लेखकों के इस संगठन ने और न देश के विश्वविद्यालयों ने अपनी बिरादरी के एक सदस्य की हत्या पर कोई दुख प्रकट किया, नाराजगी की तो बात ही छोड़ दें!

डॉक्टर मलेशप्पा मदिवल्लपा कलबुर्गी प्रख्यात पुरालेख विशेषज्ञ थे। अकादमिक जगत में सम्मानित और लेखक समुदाय में भी समादृत, वे वचन साहित्य के विशेषज्ञ थे। कर्नाटक के ताकतवर लिंगायत समुदाय के सदस्य कलबुर्गी ने वचन की अपनी व्याख्याओं से लिंगायत समुदाय के कट्टरपंथी हिस्से को क्षुब्ध किया था। वे तर्कशील थे, मूर्तिपूजा के आलोचक और कन्नड़ समाज में यूआर अनंतमूर्ति के साथ मिल कर एक उदार, बुद्धिवादी नजरिया विकसित करने का उद्यम कर रहे थे।

ज्ञान के काम को, अगर वह वास्तविक ज्ञान का हो, हमेशा यथास्थितिवादियों का विरोध झेलना पड़ता है। विचार, जिसका कोई विरोध न हो रहा हो, नया है भी कि नहीं, इस पर शक किया जाना चाहिए। बल्कि किसी विचार की परीक्षा का एक तरीका यह भी है कि उसके विरोधियों को देखा जाए। किताबें लिखी जाती हैं, सेमिनार किए जाते हैं, वे समाज के सोचने-समझने के तरीके को झकझोरते हों, जरूरी नहीं। इसीलिए, ज्ञान-सृजन-कर्म में लगे कुछ लोग इस सीमा से बाहर निकल कर कुछ और करते हैं। उन्हें सुरक्षित अकादमिक दायरे में चक्कर लगाते रहने से घुटन होती है। प्राय: अकादमिक दुनिया के लोग इन्हें किंचित मुदित भाव से देखते हैं, मानो ये विद्वत्ता की गंभीर शालीनता का उल्लंघन कर रहे हों, शोर मचा रहे हों, जो बौद्धिकों का काम नहीं।

कलबुर्गी की हत्या पर सार्वजनिक क्षोभ व्यक्त करने वाले पहचाने चेहरे हैं। ये धर्मनिरपेक्ष के तौर पर बदनाम हैं! लेकिन जो खुद को इस तरह के विशेषण के तंग जैकेट में नहीं डालना चाहते, उन्हें क्षोभ हुआ कि नहीं या उन्होंने गिरीश कर्नाड जैसे लोगों को ऐसे वक्तों की रूदाली मान कर अपना काम भी उन्हीं के जिम्मे लगा दिया है!

कलबुर्गी तो फिर भी विश्वविद्यालय समुदाय के सदस्य थे। उनके पहले मारे गए गोविंद पानसरे या नरेंद्र दाभोलकर बाहरी ही कहे जाएंगे, हालांकि जो वे कर रहे थे, उसे बुद्धि या ज्ञान का काम ही कहा जाएगा। पिछले तीन वर्षों में इन तीन तर्कशील विद्वानों की हत्या को इस महाद्वीपीय देश में नगण्य मान लिया गया है। इसलिए इन्हें किसी सामाजिक प्रवृत्ति, किसी खास राजनीतिक रुख से जोड़ने पर कुछ लोग अतिशयोक्ति का आरोप लगाते हैं। लेकिन हम सब अपने पड़ोसी देश बांग्लादेश में पिछले दिनों अभिजीत रॉय, वशिकुर्रहमान और अनंत विजय दास की हत्याओं को उस समाज के असहिष्णु हो जाने का पक्का प्रमाण मानते हैं।

खुद को उदार, सहिष्णु और अन्य समाजों को मूलत: कट्टर मानने वाले इस पर ध्यान नहीं देते कि उनके यहां हिंसा की कितनी स्वीकृति है। हिंसा का खुलेआम प्रचार कितना सह्य है! आखिर कर्नाटक में ही अनंतमूर्ति को एक व्यक्ति विशेष की चुनावी विजय के बाद पाकिस्तान भेज देने का एलान करने वाले और फिर उनकी मृत्यु पर खुलेआम खुशियां मनाने वाले तो अब भी छुट्टा घूम रहे हैं! तमिलनाडु में लेखक पेरुमल मुरुगन को धमकियां देने वालों की तंबीह की बात तो दूर, पुलिस ने खुद मुरुगन को अपनी हरकतों से बाज आने की चेतावनी दी। और अभी कलबुर्गी की हत्या के बाद उस पर खुशी जताने वाले और मैसूर के एक दूसरे तर्कशील विद्वान भगवान को तैयार रहने की धमकी देने वाले ट्विटरबाज को गिरफ्तार तो नहीं ही किया गया है।

यह ठीक है कि हर समाज और देश में ऐसे हिंसक तत्त्व होंगे और शायद कलबुर्गी जैसे लोगों को बचाने की पक्की गारंटी करना संभव न होगा। लेकिन जनतांत्रिक राज्य का काम है स्वतंत्र विचारों को सुरक्षा का अहसास दिलाना। जनतांत्रिक समाज का बुनियादी गुण है, परस्पर विरोधी विचारों की टकराहट के अवकाश की हिफाजत। कोई नहीं कह सकता कि ‘अंधविश्वासी विचारों’ का खात्मा राज्य का काम है। वे रहेंगे और ‘तर्कशील’ विचारों पर हमला भी करेंगे। लेकिन इस टकराहट में अगर वे हिंसा के जरिए किसी को खामोश करते हैं, तो समाज के उदार और राज्य के जनतांत्रिक होने में संदेह है।

भारत के बारे में कहा जाता है कि वह उदार और धर्मनिरपेक्ष इसलिए है कि वह हिंदूबहुल है। मजा यह कि हिंदू सचमुच खुद को स्वभावत: उदार समझ बैठे हैं! हालांकि इस धर्म का इतिहास भी वैसी ही हिंसा और क्रूरता से अटा पड़ा है जैसी किसी भी दूसरे धर्म के इतिहास में पाई जाती है। लेकिन अगर उसे इस आत्मछवि से प्रेम है, तो फिर हिंसा के विरुद्ध उदार हिंदुओं की खामोशी के क्या मायने हैं? क्या इसका अर्थ है उदार हिंदुओं की पराजय?

दूसरे, हिंदू धर्म और सामुदायिक अहंकार के बीच एक नया गठजोड़ दिखाई देता है। जैसे कलबुर्गी की हत्या क्या लिंगायत क्रोध के कारण हुई या हिंदू क्रोध के कारण? कहां दोनों एक-दूसरे से अलग होते हैं? जैसे मुरुगन के मामले में हिंदूवादी संगठनों ने इसे मुरुगन के समुदाय का निर्णय बता कर पल्ला झाड़ा, हालांकि विरोध की शुरुआत में वे सक्रिय थे। लेकिन समुदाय के आगे आते ही वे परदे के पीछे चले गए। एक दूसरे प्रसंग में यह जानना कठिन हो सकता है कि मुजफ्फरनगर या हरियाणा की हिंसा जाटों ने की या हिंदुओं ने? या इस हिंसा का स्रोत कोई एक है और अब उसका नाम कोई लेना नहीं चाहता।

बजरंग दल हो या विश्व हिंदू परिषद, रामसेने या कोई और हिंदू वाहिनी, ये सब उस विशाल परिवार के सदस्य हैं। यह परिवार एक संगठन है भी और नहीं भी। इसका अधिकतर काम अनौपचारिक तरीके से चलता है। जैसे इसकी सदस्यता का रजिस्टर नहीं, वैसे ही इसके किसी भी निर्णय का कोई प्रमाण नहीं। आप चाहें तो इसे दुनिया का एकमात्र खुला भूमिगत तंत्र मान सकते हैं। यह अपने किसी अपराध का कोई निशान नहीं छोड़ता। अगर अपराध में कोई गिरफ्त में आ गया तो फौरन उससे हाथ धो लेता है, लेकिन उसके कृत्य का समर्थन अभिव्यक्ति और विचारों की स्वतंत्रता के नाम पर करने की छूट लेता है। यह इस हद तक है कि अपने मुखपत्र को भी मौका पड़ते ही अपना मुखपत्र मानने से इनकार कर देता है।

हिंदू धर्म को ही राष्ट्र मान कर उसकी सेवा करने वाले इस संगठन के सदस्य जो करते हैं, वह सांगठनिक नहीं, व्यक्तिगत माना जाता है। इसलिए गांधी की हत्या में नाथूराम गोडसे दोषी हुआ, लेकिन इस हत्या पर दीवाली मनाना क्या किसी दंड संहिता में अपराध माना जा सकता है? अगर मैं किसी को राक्षस मानता हूं तो उसकी हत्या को वध कहना कानूनी दृष्टि से कैसे अपराध ठहराया जा सकेगा? बाबरी मस्जिद के ढाहने का अभियान यह चलाएगा, लेकिन ढाहने वालों के कृत्य का जिम्मा नहीं लेगा। इसके बाद उस कृत्य का समर्थन जनतांत्रिक अधिकार के नाम पर करता रहेगा! ग्राहम स्टेंस की हत्या भी दारा सिंह का निजी निर्णय है, लेकिन उसका औचित्य निरूपण विचारों और अभिव्यक्ति की आजादी है!

भारतीय और खासकर हिंदू समाज जब तक इस धोखाधड़ी को बर्दाश्त करता रहेगा, कलबुर्गी की हत्या पर शोक प्रस्ताव आत्मवंचना के अलावा और कुछ न होगा।

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