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मतांतर : बेवजह बौखलाहट

महेश जायसवाल हिंदी का संबंध सदा भारतीय जीवन की मिश्रणशीलता से रहा है। इसलिए साहित्य में शुद्धतावाद न पहले कभी था और न आज संभव है। मुख्य सवाल है कि साहित्य और समाज विज्ञान के बीच खुला और रचनात्मक संबंध हो या यांत्रिक भौतिकवादी। शंभुनाथ ने अपने लेख ‘समाज विज्ञान का बिजूका’ में जो सवाल […]

Author June 28, 2015 4:48 PM

महेश जायसवाल

हिंदी का संबंध सदा भारतीय जीवन की मिश्रणशीलता से रहा है। इसलिए साहित्य में शुद्धतावाद न पहले कभी था और न आज संभव है। मुख्य सवाल है कि साहित्य और समाज विज्ञान के बीच खुला और रचनात्मक संबंध हो या यांत्रिक भौतिकवादी। शंभुनाथ ने अपने लेख ‘समाज विज्ञान का बिजूका’ में जो सवाल उठाए हैं, उनसे जरा भी न टकरा कर चारु सिंह और रविकांत ने जो प्रतिक्रियाएं (21 जून) दी हैं, उन्हें पढ़ कर लगता है कि उनकी बौखलाहट ही विचार की तरह उपस्थित है।

शंभुनाथ के लेख के मुख्य सवाल थे- पश्चिम के संभ्रांत विश्वविद्यालयों में जिस सबाल्टर्न अध्ययन की नींव पड़ी, क्या हिंदी में उसका अंधानुकरण सही और जरूरी है? पिछले लगभग तीन दशक से समाज विज्ञान सबाल्टर्न अध्ययन के आसपास ही ठहरा हुआ है और घिसे-पिटे रूप में। क्या इसके आगे राह नहीं है? अमेरिका में नस्लीय कट्टरता मिटी नहीं है। इंग्लैंड में आयरलैंड समस्या है। सबाल्टर्नवादी बताएं कि अमेरिका और इंग्लैंड ‘कल्पित समुदाय’ क्यों नहीं हैं, और दक्षिण एशियाई देश, खासकर भारत ‘राष्ट्र’ न होकर ‘कल्पित समुदाय’ कैसे है?

शंभुनाथ की टिप्पणी में यह महत्त्वपूर्ण प्रश्न भी था कि निश्चय ही उत्पीड़ित समुदायों की आवाज का महत्त्व है, पर कब तक दलित, आदिवासी, स्त्री, मुसलमान और स्थानीय समुदायों को सबाल्टर्नवादी विद्वानों द्वारा अलग-अलग वैचारिक शिकार बना कर रखा जाएगा। क्या इन उत्पीड़ित समुदायों की तकलीफों के बीच कोई पुल नहीं बन सकता? क्या इनके भीतर से, नीचे से, राष्ट्र की एक नई साझी समझ विकसित नहीं की जा सकती?

आज के सबाल्टर्नवादी लेखक आगे आकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों की साम्राज्यवादी संस्कृति का समाज वैज्ञानिक अध्ययन क्यों नहीं करते? सवाल यह भी है कि सबाल्टर्नवादी चाहे वे विदेशी पूंजी की छाया में काम कर रहे हों या देशी पूंजी की, नए साम्राज्यवाद के आगे इतने भोले क्यों हैं? दरअसल, बिजूका लोकतंत्र के खेत में घुसे नील गायों का कुछ नहीं बिगाड़ पाता, छोटे-छोटे परिंदों को जरूर भरमाता है और उन्हें सामूहिक ताकत लेकर खेत में घुसने नहीं देता!

एक और प्रश्न उठाया गया है, क्या 2014 के सांप्रदायिक उभार के लिए भ्रष्ट धर्मनिरपेक्षतावादी खुद भी जिम्मेदार नहीं हैं? दरअसल, साहित्यकारों को जितने आत्मनिरीक्षण की जरूरत है, आज के समाज वैज्ञानिकों को भी आत्मनिरीक्षण की जरूरत क्यों नहीं महसूस होती? क्या विज्ञान कभी सामुदायिक होता है? जाहिर है, न चारु सिंह ने उपर्युक्त प्रश्नों का सामना किया और न रविकांत ने और न इनमें से किसी ने बताया कि वे आशिष नंदी तक सीमित नहीं हैं, तो किन बिंदुओं पर सबाल्टर्नवादियों से आगे जाकर सोचते हैं।

सबाल्टर्न अध्ययन पर हाइडेगर, ग्राम्शी और फूको- इन तीन परस्पर भिन्न विचार स्रोतों का असर है। ग्राम्शी सबाल्टर्न की एक भिन्न व्याख्या जरूर देते हैं, पर वह ‘आर्गेनिक इंटलेक्चुअल’, निम्नवर्गों से सीधे जुड़े बुद्धिजीवी की बात करते हैं। क्या सबाल्टर्नवादी ऐसे बुद्धिजीवी रत्ती भर हैं? ग्राम्शी से दाल लेंगे, पर नमक नहीं लेंगे। अगर विश्लेषण पद्धति औपनिवेशिक ही है, तो सबाल्टर्न का अर्थ भले ‘निम्नवर्गीय प्रसंग’ लगाया जाए, यह नई बोतल में पुरानी औपनिवेशिक शराब है- फूट डालो और पश्चिमी बनाओ!

अमेरिकी सेना के अर्थ में सबाल्टर्न भी अफसर होता है। वह पैदल सैनिक नहीं है। देखा जाए तो सबाल्टर्न को व्यापक ‘वंचित-लोक’ नहीं कहा जा सकता। क्या तथाकथित सबाल्टर्न का अर्थ वैश्वीकरण के युग में दरअसल, फूट के शिकार खंड-खंड निम्न-मध्यवर्गीय एलीट तक सीमित नहीं है? साम्राज्यवाद के संदर्भ को ध्यान में रखे बिना ‘निम्नवर्गीय प्रसंग’ पर वस्तुपरक ढंग से नहीं सोचा जा सकता।

रणजीत गुहा 1959 में भारत छोड़ कर लंदन प्रवासी हो गए थे। सुदीप्त कविराज भी लंदन-अमेरिका जाकर लंबे समय के लिए बस गए। विदेशों में जाकर पढ़ना-पढ़ाना किसी की अपनी स्वतंत्रता है, सवाल है वह प्रेरणा कहां से लेकर लिखता है। रामचंद्र शुक्ल ने लिखा है, ‘जो विदेश के आरामगाहों में बैठ कर गरीबी के आंकड़े’ निकालते हैं वे देश को कभी समझ नहीं सकते। इसका अर्थ यह नहीं है कि आचार्य शुक्ल पश्चिमी चिंतन से विमुख रहने को कहते हैं, ‘हमारा यह तात्पर्य नहीं कि यूरोप के साहित्य-क्षेत्र में उठी हुई बातों की चर्चा हमारे यहां न हो…। उन वादों की चर्चा अच्छी तरह हो, उन पर पूरा विचार हो और उनके भीतर जो थोड़ा-बहुत सत्य छिपा हो, उसका ध्यान अपने साहित्य के विकास में रखा जाए।’ यह शुद्धतावाद है या अंधानुकरण का विरोध?

चारु सिंह ने लिखा है कि ‘रामविलास शर्मा ने हिंदी के साथ ही इतिहास, समाज विज्ञान, राजनीति हर विषय पर लिखा।’ क्या रामविलास शर्मा को किसी इतिहासकार ने इतिहासकार, समाज वैज्ञानिक ने समाज वैज्ञानिक कभी माना? क्या रामविलास शर्मा का इसलिए आशिष नंदी से कम महत्त्व होना चाहिए कि उन्होंने हिंदी में लिखा और पश्चिमी विश्वविद्यालयों में पीठासीन न थे या ‘पश्चिम रिटर्न’ नहीं थे।

चारु सिंह ने यह भी लिखा है कि ‘मार्क्स ने तो ऐसी विश्वदृष्टि की नींव रखी थी, जिसे भविष्य में और विकसित किया जाना था।’ अगर सबाल्टर्न अध्ययन खुद को मार्क्सवाद का वारिस समझता है, तो क्या उसने सामुदायिक अध्ययन से ऊपर उठ कर अपनी कोई विश्वदृष्टि या राष्ट्रीय सोच कभी स्पष्ट की? हिंदी सिर्फ कविता-कहानी-उपन्यास निश्चय ही नहीं है, इसकी इतिहास, समाज विज्ञान, टेक्नोलॉजी विभिन्न दिशाओं में उन्नति होनी चाहिए, पर क्या हिंदी को पश्चिम के औपनिवेशिक चिंतन की मैला-गाड़ी बनना है?

‘आलोचना’ के परिवर्तित अंकों और ‘प्रतिमान’ जैसी पत्रिकाओं का हमेशा स्वागत है। अगर इनमें शोषित समुदायों की पीड़ा उठाने की नीति है, तो क्या किसान शोषित नहीं हैं? इन अंकों में आत्महत्या को मजबूर आज के करोड़ों भारतीय किसानों पर एक भी लेख है? मुद्दा कुछ खास पत्रिकाएं नहीं, खास प्रवृत्तियां हैं।

चारु सिंह द्वारा लक्ष्मी-स्वयंवर की सबाल्टर्नवादी व्याख्या यांत्रिक भौतिकवाद का अच्छा नमूना है। इसमें दो तथ्य छिपाए गए हैं- पहला कि, लक्ष्मी प्रेम के कारण विष्णु का ही वरण करना चाहती थी और दूसरा कि ब्रह्मचर्य का संकल्प लेने वाले नारद एक स्त्री की इच्छा और स्वतंत्रता का हरण कर उससे छल करके विवाह करना चाहते थे। कुछ महत्त्वपूर्ण तथ्यों को छिपा कर हमेशा मनमाना निष्कर्ष निकालना यांत्रिक सबाल्टर्नवादी व्याख्या की मुख्य पहचान है।

रविकांत की बौखलाहट कितनी कृत्रिम हिंदी बना सकती है, उसका नमूना गौरतलब है, ‘आलोचना की नई, बेलीक, लाहौल विला कूवत, समाज वैज्ञानिक पारी पर हैरतअंगेज, रद्दे-अमल’। मौलवी की दाढ़ी सफाचट चेहरे की जगह दिमाग के अंदर बढ़ रही है और जनाब सेक्युलर हैं! उन्हें शंभुनाथ को ‘बहुपदासीन’, ‘बहुपुरस्कृत’, ‘परमादरणीय’ आदि कह कर व्यंग्य करने का पूरा लेखकीय हक है। पर एक सदा सक्रिय और मेहनती आलोचक को ‘बुजुर्ग’ कह कर व्यक्तिगत स्तर पर कोसना रविकांत के युवा दंभ का परिचायक है, जो पुरुष वर्चस्ववादी और द्विज वर्चस्ववादी दंभ की तरह ही घृणित है। क्या बौद्धिक दुनिया में पीढ़ियों के संघर्ष की जगह विचारों का संघर्ष महत्त्वपूर्ण नहीं है!

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