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कभी-कभार : पटना में भारतीय कविता

अशोक वाजपेयी दशकों पहले हमने भारत भवन में कविभारती नाम से एक वार्षिक आयोजन शुरू किया था, जिसमें अनेक भाषाओं के कवि शिरकत करते थे: कविता की हमारी समझ, उसकी स्थिति और संभावना, उसकी स्थानीयता और सार्वभौमता के आस्वाद, सबका भूगोल बढ़ता था। पटना में बिहार सरकार के कला और संस्कृति विभाग ने भारतीय कविता […]
Author November 30, 2014 12:16 pm
अशोक वाजपेयी

अशोक वाजपेयी

दशकों पहले हमने भारत भवन में कविभारती नाम से एक वार्षिक आयोजन शुरू किया था, जिसमें अनेक भाषाओं के कवि शिरकत करते थे: कविता की हमारी समझ, उसकी स्थिति और संभावना, उसकी स्थानीयता और सार्वभौमता के आस्वाद, सबका भूगोल बढ़ता था। पटना में बिहार सरकार के कला और संस्कृति विभाग ने भारतीय कविता समारोह की एक नई वार्षिक शृंखला शुरू की है, जिसका इस बार दूसरा संस्करण आयोजित हुआ। उसमें अनेक भाषाओं के कवि आए, जिनमें ओड़िया रमाकांत रथ, गुजराती सितांशु यशस्चंद्र, हिंदी प्रयाग शुक्ल, गिरधर राठी, मंगलेश डबराल, असमिया मणिकुंतला भट््टाचार्जी आदि शामिल थे। श्रोताओं और रसिकों की बड़ी भीड़ देख कर फिर इस धारणा की पुष्टि हुई कि पटना में साहित्य एक जीवित उपस्थिति है। हिंदी अंचल का एक बड़ा सार्वजनिक दुर्गुण यह है कि उसमें कुछ भी समय पर शुरू नहीं होता: आधे घंटे की देर तो लगभग अनिवार्य मान कर चला जाता है।

अपने लोकतंत्र में अब हम ऐसे मुकाम पर पहुंच गए हैं कि राजनीति और संस्कृति में, सत्ता और साहित्य के बीच अधिकतम संभव दूरी हो गई है। संवाद यही नहीं है कि गायब है, वह लगभग असंभव, कम से कम राजनीति और सत्ता को अनावश्यक लगने लगा है। हमारे ज्यादातर प्रधानमंत्री लालकिले की प्राचीर से हर वर्ष देश को संबोधित करते हुए जिस एक क्षेत्र का भूल से भी जिक्र नहीं करते वह संस्कृति है! आप शायद ही किसी राजनेता पर यह आरोप लगा सकते हैं कि उसकी साहित्य या संस्कृति में कोई दिलचस्पी है। अधिक से अधिक अखबार या भविष्यफल पढ़ने वाले नेता कभी भूले-भटके एकाध पुस्तक पढ़ते हैं, ऐसा संदेह करने का भी कोई आधार नहीं है।

बिहार के मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी, देर से सही, पर उद्घाटन करने आए और हालांकि उन्हें गया जाना था, पूरे सत्र में बैठे रहे। उन्होंने असाधारण विनय से यह स्वीकार किया कि इतने सारे कवियों और विद्वानों के बीच वे अटपटा अनुभव कर रहे हैं। यह भी कहा कि जब कभी हम लोग मुश्किल में पड़ते हैं तो हमें कोई न कोई कविता याद आती है, जो राहत देती है और कई बार रास्ता भी दिखाती है। उन्होंने यह घोषणा की कि कला, संस्कृति और साहित्य के लिए बिहार सरकार दोनों हाथों से धन सुलभ कराने के लिए तैयार है। यों तो, उनके अनुसार, कवि और कविता रास्ता दिखाते हैं, पर कभी-कभी भटक भी जाते हैं: हमारे दो महाकवियों ने क्रमश: ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ में लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला और सूर्यपुत्र कर्ण के साथ जो अन्याय किया है उसे उन्होंने भटकाव माना और यह जोड़ा कि लेकिन यह भटकाव कभी-कभार ही हुआ है।

मूर्धन्य कवि रमाकांत रथ ने यह मर्मोक्ति की कि कोई भी कवि यह दावा नहीं कर सकता कि वह वैसी कविता लिखने में सफल हुआ है जैसी कि वह चाहता था। कविता एक स्तर पर कवि की विफलता का आख्यान होती है।

अयोध्या में संगीत और कविता

इस बार लंबे अंतराल के बाद अयोध्या जाना हुआ। विमला देवी फाउंडेशन ने इस बार पंडित राजन और साजन मिश्र को संगीत के लिए, चंद्रकांत देवताले को कविता के लिए और संस्कृति प्रतिष्ठान दिल्ली के ओमप्रकाश जैन को सामाजिक कार्य के लिए अपने सम्मानों से विभूषित किया। राजसदन के विशाल परिसर में सुरुचि और भव्यता दोनों ही थीं और अच्छी संख्या में अयोध्या के रसिक जन आए। मिश्र द्वय के दो युवा शिष्यों ने तैयारी और समझ से गायन किया- उसमें अच्छी शिक्षा और विनयशीलता प्रगट थी। समापन मिश्र द्वय ने गाकर किया। बनारस की संगीत-परंपरा अपने पूरे निखार, लालित्य और आवेग में सुनने को मिली। यह भी समझ में आया कि वहां ध्रुपद के कई तत्त्वों को खयाल गायकी में समाहित किया गया है। ऐसा तराना भी सुना, जिसमें फारसी के शब्दों के अलावा हिंदी शब्दों में बंदिश थी। बाद में पता चला कि इस परिवार के बुजुर्गों ने ऐसे कई तरानों की रचना की है।
अगले दिन सुबह धूप कुछ ज्यादा ही कड़ी थी। एक अपेक्षाकृत अधिक आत्मीय लगते चौगान में कविता के रसिक जुड़े। अस्वस्थ होने के कारण न आ सकने वाले चंद्रकांत देवताले की संगीतकार बेटी अनुप्रिया देवताले ने उनकी कुछ कविताओं का सीधा-सच्चा पाठ किया। फिर हम तीन कवियों लीलाधर मंडलोई, अष्टभुजा शुक्ल और मैंने कविताएं सुनार्इं। सभी ने ध्यान से सुनीं। श्रोताओं में कुछ ऐसे भी थे, जिन्हें कुछ कवियों की कविताएं याद भी थीं और उन्होंने उन्हें सुनने का आग्रह किया। अष्टभुजाजी को अपने छंद मुखाग्र हैं और उन्हें वे प्रभावशाली ढंग से याद करते हुए प्रस्तुत करते हैं। लीलाधरजी ने अपनी कई छोटी कविताएं ही पाठ के लिए चुनीं: संक्षेप के बावजूद उनका मर्म संप्रेषित हुआ।

अयोध्या जिन कारणों से विख्यात-कुख्यात है उनमें वहां धीरे-धीरे विमलादेवी फाउंडेशन के प्रयत्नों से विकसित हुए आत्मीय रसिक समाज की गिनती नहीं होेती। लेकिन वह है और उसे अच्छा शास्त्रीय संगीत सुनने, शास्त्रीय नृत्य देखने और अपने समय की प्रासंगिक कविता सुनने-गुनने में दिलचस्पी है इसका एहतराम करना चाहिए। यह स्थिति उम्मीद जगाती है कि निरंतर सांस्कृतिक विपन्नता का शिकार हो रहे हिंदी अंचल में कुछ सांस्कृतिक रोकथाम संभव है, सुरुचि पोसी जा सकती है। ऐसे प्रयत्नों या पहलों को सत्ता का मुंह नहीं जोहना चाहिए- वे, सौभाग्य से, ऐसा कर भी नहीं रहे हैं। हिंदी अंचल में उत्तर प्रदेश सरकार ही साहित्य और संस्कृति से सबसे विमुख सत्ता है। उसकी संस्थाएं अप्रासंगिक हो चुकी हैं और वह इस किस्म की पहल को न तो बढ़ावा देती है और न ही उसे भयानक तेजी से बढ़ रही विपन्नता की कोई खबर है। एक जमाने में निजी पहल से शुरू किए गए सम्मेलन, सभाएं, संस्थान सब धुरी से कब का हट चुके। ऐसे अंधेरे में अयोध्या जैसे प्रयत्न रोशनी की आशा जगाते हैं और यह भी जाहिर करते हैं कि निजी पहल से अभी बहुत कुछ संभव है।
अपनी पुरानी जगह

सागर विश्वविद्यालय हमारी पुरानी जगह है। वह दो बरस में सत्तर बरस का हो जाएगा। मैं जब वहां बीए तक का छात्र था तो उसे पचपन बरस होने आए। अब जहां उसका विशाल परिसर है, जिसे बनाने में हमारे पिता की वहां अधिकारी होने के नाते बड़ी भूमिका थी, वहां तब विश्वविद्यालय स्थित नहीं था। वह मकरोनिया में था, सेना की द्वितीय विश्वयुद्ध की बैरकों में। उसके संस्थापक डॉ. हरिसिंह गौर थे, जिन्होंने 1946 में इस विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए लगभग दो करोड़ रुपए का दान दिया था। इस समय, पता चला, विभिन्न देशों में उनकी जो संपत्ति शेयरों के रूप में है उनका आकलन लगभग एक अरब रुपए के बराबर है।

डॉ. गौर का जन्मदिन हर वर्ष धूमधाम से मनाया जाता है: इस वर्ष वहां के उत्साही कुलपति एसपी व्यास की पहल पर आयोजन बृहत् और विशेष हुआ। गौर स्मृति व्याख्यान के अलावा एक कवि सम्मेलन, पूर्व कुलपतियों और कुछ पुराछात्रों का सम्मान समारोह आदि आयोजित हुए। अब यह विश्वविद्यालय केंद्रीय हो चुका है, लेकिन नियमित कुलपति का पद दसेक महीनों से रिक्त है।

जब हम वहां छात्र थे तो शहर विश्वविद्यालय के परिसर से भौतिक रूप से काफी दूर था। नए परिसर में अंतरित होने के बाद से वह शहर के निकट आ गया है। सागर शहर को भारत के नक्शे पर जगह दिलाने का काम इसी विश्वविद्यालय ने किया। अन्यथा सागर एक छोटा मध्यप्रादेशिक शहर भर बना रहता, जिसकी प्रसिद्धि उसके तालाब और चिरोंजी की बरफी की वजह से ही थोड़ी-बहुत होती! इस विश्वविद्यालय ने इस शहर को बदला, जिसके प्रति शहर को अपार कृतज्ञ होना चाहिए। मैंने वहां जोर देकर यह कहा कि शहर को विश्वविद्यालय पर हावी होने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, जो कि वह, दुर्भाग्य से, थोड़ी आक्रामकता से कर रहा है। कई वर्षों से करता रहा है। शहर को विश्वविद्यालय को उसका एकांत वापस करना चाहिए, ताकि वह ज्ञान और सृजन का काम अबाध रूप से कर सके। वहां काफी बड़ी संख्या में नई फैकल्टी आई है और उनमें नया और सार्थक करने की उत्सुकता और बेचैनी है। उन्हें पूरा अवसर और समर्थन मिलना चाहिए न कि स्थानीय प्रतिभा और दादागण से निराधार लांछन और धमकियां।

यह जान कर बहुत अच्छा लगा कि तीन बत्ती से गौर समाधि तक जो लंबा जुलूस आया उसमें शहर के बहुत लोग बहुत उत्साह से शामिल हुए: हमारे पुराने मुहल्ले में कहते हैं कि बड़ी दूर तक सड़क नहीं, लोग ही लोग दीख रहे थे। मैं याद कर रहा था कि उस समय सागर विश्वविद्यालय को जो प्रतिष्ठा बहुत जल्दी मिल गई थी वह आचार्य नंददुलारे वाजपेयी, डॉ श्यामाचरण दुबे, डॉ दयाकृष्ण, प्रोफेसर स्वामीनाथन, डॉ वेस्ट आदि अध्यापकों के कारण थी, जिनमें से प्राय: कोई भी सागर का नहीं था। यह वह समय था जब मध्यप्रदेश में अपना मध्यवर्ग बनने की शुरुआत हो रही थी। स्वयं इस वर्ग को आकार देने में इस विश्वविद्यालय ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

सागर जाकर अच्छा लगता है, हालांकि हमारा मुहल्ला लगभग बाजार में बदल गया है जो क्लेशकारी है। पर एक अर्थ में वह सुना भी हो गया है, क्योंकि हमारे बालसखा कवि-मित्र रमेशदत्त दुबे अब नहीं हैं। उनकी स्मृति में एक बड़ा आयोजन अगले वर्ष करने का विचार है।

 

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