ताज़ा खबर
 

कभी-कभार : घटता-सिकुड़ता हिंसक नेता

इस समय की बड़ी विडंबना यह है कि अगर अच्छे दिन आ नहीं गए हैं तो कम से कम उनका वादा तो है; जिस लोकतंत्र की वजह से या उसके कंधों पर चढ़ कर यह वादा हम तक पहुंचा है..

Author नई दिल्ली | September 6, 2015 09:30 am

इस समय की बड़ी विडंबना यह है कि अगर अच्छे दिन आ नहीं गए हैं तो कम से कम उनका वादा तो है; जिस लोकतंत्र की वजह से या उसके कंधों पर चढ़ कर यह वादा हम तक पहुंचा है, वही घट, सिकुड़ और कई स्तरों पर हिंसक हो रहा है। यह सीधे राज्य की हिंसा नहीं है: यह उन शक्तियों का धड़ल्ले से, बिना संकोच या मर्यादा के, सिर उठाना है जिनके मन और कर्म में, वचन में असहमति का, अपने से भिन्न और विपरीत दृष्टि या विचार का कोई सम्मान या जगह नहीं है। समाज में बहस जैसे बंद-सी हो रही है याकि ऐसे मुद्दों पर दिन-रात हो रही है, जो अपनी जड़ और व्याप्ति में बेहद सतही, लगभग अप्रासंगिक हैं।

जैसी राजनीति चल रही है और, दुर्भाग्य से, वह सत्तारूढ़ गठबंधन के अलावा अन्यत्र भी फल-फूल रही है वैसी राजनीति में असहमति को देश-निकाला देने की मानो तैयारी हो रही है। असहमति का लगभग रोज शत्रुता में अनुवाद किया जा रहा है। शत्रु हैं तो उन्हें नष्ट करना नैतिक कर्तव्य बन रहा है: ऐसे कर्तव्य-पालन में हिंसा का सहारा लेने में कोई संकोच नहीं। अपने लोकतंत्र में हम किस मुकाम पर आ गए हैं कि तर्क, विवेक, प्रज्ञा हमें बर्दाश्त नहीं। कन्नड़ विद्वान डॉ. कलबुर्गी की उनके घर में घुस कर हत्या ताजा उदाहरण है।

यह आकस्मिक तो नहीं हो सकता कि ऐसे शर्मनाक हमलों के पीछे वही सामाजिक शक्तियां सक्रिय हैं जो किसी न किसी रूप में, या तो सीधे या परोक्ष रूप से उस राजनीति से जुड़ी हैं, जिनकी इस समय केंद्र और कई राज्यों में सत्ता है। कैसे महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, केरल, बंगाल आदि कई प्रदेशों में लगातार हत्याएं हो रही हैं और उन पर वहां की सत्ताएं न तो काबू पा सक रही हैं, न ही अपराधियों को दंड दिलाने के लिए विशेष सक्रिय हैं। ऐसा माहौल बनता जा रहा है कि यह नतीजा दूर की कौड़ी लाना नहीं लगता कि इन हत्यारी वृत्तियों और सत्तारूढ़ गठबंधन और उसके तथाकथित परिवार में गठबंधन-सा है। खुल कर आतंक फैलाया जा रहा है और कोशिश यह हो रही है कि असहमति की सब जगह और संभावना छेंक दी जाए। इसका एक प्रभाव तो यह देखा जा सकता है कि इस सबको लेकर बौद्धिक और सृजनशील समुदाय प्राय: चुप है। उसकी चुप्पी सहमति का लक्षण तो शायद नहीं है, पर उसे अवसरवादी कायरता से अलगाना कठिन लगने लगा है। कन्नड़ के लेखक-कलाकार एकजुट होकर विरोध में सामने आए। लेकिन महाराष्ट्र आदि राज्यों में ऐसी ही घटनाओं के बाद कुछ खास बौद्धिक-सृजनशील विरोध हुआ नहीं जान पड़ता।

भारतीय लोकतंत्र इस समय अपने एक भीषण अंतर्विरोध के मुकाम पर है: उसमें आम लोगों की भागीदारी बढ़ रही है, लेकिन उसमें हिंसा भी बढ़ती जा रही है। शायद ही दुनिया में किसी और लोकतंत्र में हर दिन और हर रात इतनी हिंसा होती हो, जितनी भारत में इस समय होती है: उसके रूप और कारण भले अलग-अलग हों, लेकिन है वह हिंसा ही, जिसकी वैसे लोकतंत्र में कोई जगह नहीं होनी चाहिए। क्या ऐसा समय नहीं आ गया है कि लोकतंत्र की मूल आत्मा को बचाने के उद्देश्य से हिंसा, घृणा, आतंक और संस्थाओं के अवमूल्यन के विरुद्ध एक देशव्यापी सत्याग्रह आंदोलन छेड़ा जाए और उसकी अगुआई लेखक और कलाकार, बुद्धिजीवी करें।

सरकारी फिजूलखर्ची :
सरकार में हर समय सुना जाता है कि पैसे की कमी है; किफायत करने और कटौती के निर्देश रस्मी तौर पर जारी होते रहते हैं। लेकिन ऐसे बहुत सारे खर्चे हैं, जो बराबर बढ़ते रहते हैं और अक्सर नजर से ओझल रहते हैं। पता नहीं क्यों आॅडिट वाले भी उनको नजरअंदाज करते हैं और कम एतराज उठाते हैं। उनमें से एक है सरकार या मंत्री बदलने पर उनके कार्यकक्ष और सरकारी आवास पर होने वाला खर्च। इस पर ध्यान गया जब यह खबर पढ़ी कि वर्तमान सरकार के एक राज्यमंत्री के कार्यकक्ष का शास्त्री भवन में नवीकरण किया जा रहा है और यह कार्य तभी होता है या हो पाता है जब मंत्रीजी विदेश यात्रा पर होते हैं।

याद आया कि जब मैं भारत सरकार के संस्कृति विभाग में संयुक्त सचिव था तब एक नए मंत्री आए और उनकी रुचि के अनुकूल कार्यकक्ष के नवीकरण का काम हाथ में लिया गया। चूंकि वे राजघराने से थे और नागर विमानन मंत्री रह चुके थे, उनका कक्ष किसी एयरलाइंस के कक्ष जैसा बनाया गया। मैं विभागीय प्रशासन का प्रभारी था। जब काम पूरा हो गया तो मेरे निदेशक ने उस पर हुए खर्च के भुगतान का अनुमोदन करने के लिए एक फाइल मुझे भेजी। मैंने उसका विषय देख कर और पूरी टिप्पणी को पूरा पढ़े बगैर निदेशक से फोन पर कहा कि साढ़े छह लाख को चार में बांट दीजिए, क्योंकि उस समय मानव संसाधन मंत्रालय में चार विभाग थे और संस्कृति उनमें से एक था।

निदेशक ने बताया कि चार हिस्सों में बराबर-बराबर बांटने के बाद ही हमारे विभाग के जिम्मे साढ़े छह लाख का भुगतान आया है। दूसरे शब्दों में, कार्यकक्ष पर कुल खर्च छब्बीस लाख रुपए का 1995 में हुआ था। इस आलीशान कक्ष और खर्च से मंत्रीजी की या विभाग की कार्यक्षमता में कोई इजाफा हुआ हो इसका मुझे कभी अहसास नहीं हुआ। इन्हीं मंत्री ने विदेश में हुए भारत महोत्सव में जाने पर वहां के सबसे खर्चीले होटल में ठहरने का इसरार किया था, जो कि दुनिया के सबसे महंगे पांच होटलों में गिना जाता था। संयोगवश वहां भारतीय राजदूत के अथक प्रयत्न के बावजूद जगह नहीं मिल सकी और दो लाख रुपए सार्वजनिक कोष के बच गए होंगे!

यह फिजूलखर्ची राजनेताओं तक सीमित नहीं है। सिविल सेवकों में भी इसके लिए लगभग होड़ लगी रहती है। सचिव से लेकर संयुक्त सचिव, उपसचिव, महानिदेशक आदि अपने प्रशासनिक व्यवहार और प्रक्रियाओं में तो कोई परिवर्तन प्राय: नहीं लाते और न ही उसकी कोई आकांक्षा रखते या कोशिश करते हैं, पर अपने कार्यकक्ष का फर्नीचर आदि बदलने के लिए बहुत उत्साहित और सक्रिय रहते हैं। इस पर भी हर वर्ष सरकार का लाखों, शायद करोड़ों रुपया खर्च होता रहता है। इसका बहुत कम साक्ष्य है कि कुछ ने अपने को इस फिजूलखर्ची से दूर रखा हो। ‘परधन धूरि समान’ की कटूक्ति में इतना भर संशोधन किया जा सकता है कि सरकारी धन धूरि समान। वह सार्वजनिक धन है इसकी याद धीरे-धीरे उन्हीं में सबसे कम हो जाती है, जो उसके रखवाले और नीति नियामक हैं।

विराट की आराधना

हालांकि मैं सैयद हैदर रज़ा, उनकी कलासाधना को तीन दशकों से अधिक जानता हूं और उन्हें व्यापक रूप से अद्भुत रंगकार माना जाता है, पिछले कई महीनों से वे जो काम कर रहे हैं, अपनी उमर और कमजोरी, थकान के बावजूद वह चकित करने वाला है। अपनी मंद पड़ती आंखों और कांपते हाथों से वे कैनवस पर ऐसे रंग लगाते हैं, जो उनकी परिचित कला-ज्यामिति को एकदम पुनर्नवा कर देते हैं। उन्हें रोज अपने स्टूडियो में घंटों बैठ कर चित्र बनाते देखना सृजन और जिजीविषा में आस्था का पुनर्वास करना है। वे विराट की आराधना कर रहे हैं। कैनवस बड़े आकार के हैं, पर उनमें विराट स्पंदित होता है- एक तरह की आदिमता में जैसे कोई अकलुषित विराट को सबसे पहले देख और रच रहा हो। अगर कला का हमारे सीमित समय में कैद हो रहे समय को उसकी याद दिलाना है, जो समयातीत है तो रज़ा इन दिनों अपने अटूट जतन से वही कर रहे हैं। उनकी कला, बिना ऐसा कोई नाटकीय दावा किए, आज की चालू कला का प्रतिलोम है: उसमें विराट चित्रित, स्पंदित और रंगचरितार्थ होता है। यह आश्वस्तिकर है कि यह विराट हमारी, अब भी, पहुंच में है, क्योंकि उनकी कला में है।

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App