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कभी-कभार : हुआ यह है…

अशोक वाजपेयी हुआ यह है कि अपनी जिंदगी के इस मुकाम पर आकर अपने कुछ विश्वासों पर संदेह होने लगा है। यह तो सही है कि अगर साहित्य, कविता और कलाएं न होतीं तो मेरी जिंदगी अकारथ होती। मैं यही मानता रहा कि इन्होंने ही, जितना थोड़ा-बहुत मानवीय मैं हो पाया, मुझे बनाया है: इन्हीं […]

Author May 31, 2015 3:45 PM

अशोक वाजपेयी

हुआ यह है कि अपनी जिंदगी के इस मुकाम पर आकर अपने कुछ विश्वासों पर संदेह होने लगा है। यह तो सही है कि अगर साहित्य, कविता और कलाएं न होतीं तो मेरी जिंदगी अकारथ होती। मैं यही मानता रहा कि इन्होंने ही, जितना थोड़ा-बहुत मानवीय मैं हो पाया, मुझे बनाया है: इन्हीं से सार्थकता, उम्मीद और राहत मिलती रही है। इन्होंने ही सिखाया कि सत्ता और संपत्ति के रौब में आना जरूरी नहीं है। इन्हीं से विनय का पाठ सीखा। इन्हें ही अपनी नीति, राजनीति और नागरिकता माना। हमारे समय में सत्ता, शक्ति और हिंसा के बढ़ते आतंक के बरक्स इन्हें ही अपना प्रतिरोध माना। अपनी जिजीविषा और नश्वरता के गहरे बोध के लिए यही मूल स्रोत बने। सीधे अनुभवों के धनी न हो पाने के कारण इन्हीं से मिले जीवनानुभवों को उत्तराधिकृत किया।

हुआ यह है कि इन सभी की हमारे समय और समाज में जो स्थिति, उपस्थिति और हैसियत है उसे हिसाब में लेते हुए लगता है कि साहित्य और कलाओं से इतनी उम्मीद करना शायद सही नहीं है। रोना अपनी अनिवार्य अल्पसंख्यकता का नहीं, अपनी व्यर्थता का है। हम जो भी रचते हैं, उसकी इतनी कम व्याप्ति है कि वह न उत्सव है, न प्रतिरोध। हमने अपनी एक संकरी-सी दुनिया बना ली है, जिसमें हम रहते-रमते, लड़ते-झगड़ते रहते हैं और इससे बाहर जो बड़ी भारी दुनिया है उसको हमारी कोई परवाह नहीं होती। उसे पता ही नहीं कि हम हैं, कि उसे लेकर हम इतने उत्सुक-चिंतित हैं। पढ़े-लिखे लोग तक नहीं जानते कि हम कौन हैं, क्या करते हैं। एक तरह से तो यह विनय का पाठ बार-बार सीखना है। पर दूसरी तरह से यह अपनी व्यर्थता से हमारी अनचाही फिर फिर मुलाकात है।

हुआ यह है कि अब हम अपने ही बनाए ढर्रे पर चलने की आदत के इस कदर अभ्यस्त हैं कि यह जान कर कि हम व्यर्थ के एक व्यसन में फंसे हैं, हम उससे बाहर नहीं आ सकते। बाहर इतनी असुरक्षा होगी कि उसका सामना करने के लिए हम लैस नहीं। हम थोड़ा-बहुत आध्यात्मिक-सा संतोष, अलबत्ता, पा सकते हैं कि हमारी हालत हमारे पुरखों की हालत से शायद थोड़ी ही बदतर है! यह भी कि हमें अपने लिखे-किए के भौतिक परिणामों की आशा नहीं करनी चाहिए। यह भी कि हम अपनी मातृभाषा को बचाने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि अधिकांश मातृभाषी और चिकने-चुपड़े लोग, जिनमें बहुत बड़ी संख्या में नवयुवक भी शामिल हैं, उसे लगातार भ्रष्ट और बरबाद कर रहे हैं। हुआ यह है कि हम यह पूछने से हिचकते हैं कि हम यह सब किसके लिए कर रहे हैं!

हुआ यह है कि साहित्य और कलाएं न आशा का, न निराशा का कर्तव्य नहीं रह गई हैं। वे हमारी किंकर्तव्यविमूढ़ता का, अटल विफलता की जगह भर हैं, जहां से ‘न भागा जाए है मुझसे, न ठहरा जाए है मुझसे’।

पुराने कागजों में

मेरी सार्वजनिक छवि तो व्यवस्थापक की है, पर निजी और पारिवारिक मामलों में खासा अव्यवस्थित हूं। चीजें, कागज, कई बार अपना लिखा तक संभाल के नहीं रख पाता हूं। बहुत कुछ भूलता भी रहता हूं। इधर पत्रों का एक गट्ठर मिला, जिसमें कई लेखक-मित्रों के पत्र हैं। मैंने अपने ऐसे मित्रों के जो पत्र पुस्तकाकार ‘अपने दूसरे’ नाम से सूर्य प्रकाशन मंदिर बीकानेर से प्रकाशित किए हैं उनमें ये पत्र शामिल नहीं हैं। अब अलग से कुछ करना होगा। पर उन्हीं में अर्जेंटीना के बड़े और अब दिवंगत कवि राबर्तो ख़्वारोज़ के साथ हुए एक इंटरव्यू की प्रति मिल गई, जो उन्होंने निश्चय ही मुझे 1989 में भारत भवन में आयोजित विश्व कविता समारोह में या तो आने या उसके बाद घर लौटने पर दी या भेजी होगी। यह छोटा-सा इंटरव्यू ‘ल नासिओं’ नामक पत्रिका में जनवरी 1989 में प्रकाशित हुआ था।

ख़्वारोज़ ने उसमें एक पते की बात कही थी: ‘कविता मनुष्य का बुनियादी शब्द है, भाषा का ध्रुवांत जो अलग से खड़ा होता है, एक ऐसे संसार में अर्थ और मूल्य के साथ जिसका जैसा कि भारतीय कहते हैं, अवनति और ह्रास हो रहे हैं। इसलिए यह महत्त्वपूर्ण है कि मिला जाए अपनी भूमिका पहचानने, अपना प्रयोजन समझने, इस शब्द के विस्तार और समागम को मनुष्य की विभिन्न भाषाओं के माध्यम से दो या तीन विचारों के आधार पर संभव किया जाए। उदाहरण के लिए, गांधी का एक विचार उद्धृत करना दिलचस्प है, जिससे मैं इत्तफाक करता हूं और मैंने एक बार लिखा था- कविता वह आयाम है जो, एक तरह से, इतिहास को हरा सकती है।’

हिंदी में कवियों-लेखकों का दो चीजों को लेकर, जैसे इतिहास और दर्शन को, रुख बहुत भोला और अबोध है, ज्यादातर। यह बावजूद दशकों से बहुत प्रभावशाली ढंग से व्यक्त और प्रतिपादित इन अवधारणाओं के, कि कविता दूसरा या वैकल्पिक इतिहास है और कविता अपने आप में विचार या दर्शन की विधा है और वह इन दोनों के नाम से जिन बोधों का जिक्र होता है, उनका अपने श्रेष्ठ और सर्जनात्मक क्षणों में अतिक्रमण करती है। उसकी अद्वितीयता इतिहास या दर्शन को साथ लेकर चलने से नहीं, उनसे अलग संसार को देखने-समझने से उपजती है।

दुर्भाग्य यह है कि इतिहास को लेकर हमने अपने ही समय में दो किस्म के अत्याचार और अनाचार देखे हैं। इतिहास की गति बदलने का दावा करने वाली सत्ताओं ने बेहिचक जनसंहार किए और लाखों लोगों की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति को क्रूर ढंग से ध्वस्त-बाधित किया। दूसरे किस्म की समझ है वह औपनिवेशिक जहनियत, जो इधर भारतीय समाज में फिर सक्रिय-सशक्त हो गई है और जिसे फिर लाखों की जिंदगी, शुद्धता और पवित्रता के नाम पर हराम करने और उन पर हिंसा उकसाने का बड़ा उत्साह है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, यह आकस्मिक नहीं है, एक तरह के इतिहास-बोध का ही परिणाम है, दुष्परिणाम है और उसे फैलाने और हमारी लोकतांत्रिक सामाजिकता को विषाक्त करने में व्यस्त है। इस कुप्रयत्न में उसे छद्म धार्मिकता से सहायता मिल रही है, जबकि अधिकांश कविता जम कर उसके विरुद्ध खड़ी है।

इतिहास-बोध का एक और आशय प्रचलित है: शोषण और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष। अपने आप में यह उदात्त और वांछनीय है। पर स्वयं इतिहास का साक्ष्य यह नहीं बताता कि हम अन्याय और शोषण से मुक्ति की ओर बढ़ते रहे हैं। दोनों को लेकर अधिक सजगता है, लेकिन उनके अनेक रूपांतर हमारे समय में मौजूद हैं। दूसरे, सारे साहित्य को इस तरह के संघर्ष के रूप में न तो देखा जा सकता है, न ही बदला। साहित्य से अधिक किसे पता होगा कि किसी भी समय हम इतिहास में रहते हैं और उससे बाहर भी: साहित्य अक्सर इतिहास से बाहर रहने का इतिहास है!

शेष अकादेमी-कथा

हमारी राष्ट्रीय अकादेमियों की प्रतिष्ठा में गिरावट और उनके महत्त्व के अवमूल्यन का एक बड़ा कारण वे लोग हैं, जो उनमें पदारूढ़ होते हैं। वह युग बहुत पीछे छूट गया लगता है जब आप याद कर सकते हैं कि इन अकादेमियों के सचिवों की सार्वजनिक प्रतिष्ठा और हैसियत थी, वे सचिव बन कर प्रतिष्ठा नहीं पाते थे, व्यापक साहित्य-कला जगत में उनकी पहले से प्रतिष्ठा होती थी। इन दिनों जो सचिव हैं वे शुद्ध बाबूगीरी से ऊपर आए लोग हैं, जिनकी वैसे कोई हैसियत या उपलब्धि नहीं है। यों उनमें से अधिकांश अच्छे बाबू भी शायद ही हों: किसी तरह की साहित्य या कला दृष्टि रखने का लांछन उन पर नहीं लगाया जा सकता!

नई सरकार ने संगीत नाटक अकादेमी का नया अध्यक्ष एक ऐसे रंगकर्मी को बनाया है जिनकी कुल उपलब्धि उनके द्वारा विवेकानंद, संत कवियों पर की गई उनकी लोकप्रिय रंगप्रस्तुतियां हैं। उन्हें रंगजगत या संगीतजगत का कोई कद्दावर व्यक्ति नहीं कहा जा सकता। सुनते हैं कि वे विनयशील और उत्साही हैं। उससे पहले एक नृत्यांगना अध्यक्ष थीं, जिन्हें पिछली सरकार ने इस कदर अधिमूल्यित कर रखा था कि वे कलाक्षेत्र की निदेशक, सेंसर बोर्ड की अध्यक्ष और अकादेमी की अध्यक्ष एक साथ थीं। उन्होंने कला क्षेत्र में बहुत अच्छा काम किया था, पर तीन-तीन पदों पर एक साथ रह कर कुछ कर पाना उनकी प्रतिभा और योग्यता के बस का न था। सो सब बिगड़ता गया।

साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष एक हिंदी साहित्यकार हैं, जो विनयशील और उदार दृष्टि रखते हैं, पर उनका मीडियाक्रिटी के प्रति आकर्षण इतना प्रबल है और अकादेमी की बाबूगीरी ने उनको इस कदर आतंकित किए रखा है कि साहित्य अकादेमी मीडियाक्रिटी का भीड़-भरा परिसर बन कर रह गई है। नई सरकार के प्रति वफादारी का, जिसकी कोई जरूरत यों अकादेमी को नहीं होनी चाहिए, क्योंकि वह स्वायत्त है, आलम यह है कि उसने स्वच्छता अभियान की पुष्टि में एक साहित्यिक आयोजन करना जरूरी समझा! समय आ गया है कि अब स्वयं लेखकों-कलाकारों को अपने साधनों से स्वायत्त राष्ट्रीय संस्थाएं बनाने की सोचना चाहिए, जो सहज खुले संवाद और द्वंद्व के मंच हों और उनके व्यावसायिक हितों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करने में सन्नद्ध हों।

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