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कभी-कभार : अथक यायावरी

हिंदी में तीन बड़े यायावर हुए हैं: राहुल सांकृत्यायन, अज्ञेय और कृष्णनाथ। इन घुमक्कड़ों की जानने की जिज्ञासा जितनी नए अनुभवों और प्रश्नों को लेकर थी उतनी ही नई जगहों..

Author नई दिल्ली | September 20, 2015 10:44 AM

हिंदी में तीन बड़े यायावर हुए हैं: राहुल सांकृत्यायन, अज्ञेय और कृष्णनाथ। इन घुमक्कड़ों की जानने की जिज्ञासा जितनी नए अनुभवों और प्रश्नों को लेकर थी उतनी ही नई जगहों को लेकर भी। यह आकस्मिक नहीं है कि तीनों का ही बौद्ध धर्म से गहरा और सर्जनात्मक-बौद्धिक संबंध था। सबसे अधिक यात्रावृत्तांत कृष्णनाथ ने लिखे: वे हिमालयीन अंचल के बहुत सघन-उत्कट चितेरे थे। ऐसी अनेक जगहें हैं जिन तक हम जैसे कई उनके वृत्तांत से ही पहुंचे। हाल में कृष्णनाथ का देहावसान हो गया और यायावरों की इस वृहत्त्रयी का भौतिक अंत भी। अपने अंतिम दिनों में कृष्णनाथ कृष्णमूर्ति फाउंडेशन के एक शैक्षणिक परिसर में रहते थे और वहीं उन्होंने प्राण त्यागे।

कृष्णनाथ का गद्य अपने साफ-सुथरेपन, सरसता और पठनीयता का हमारे समय में एक आदर्श ही रहा है। उनकी यायावरी का वितान बहुत बड़ा था: वे अर्थशास्त्र की प्रोफेसरी, समाजवादी आंदोलन, बौद्ध चिंतन, साहित्य, पत्रकारिता, शोध, संपादन, दर्शन, संस्कृति आदि अनेक क्षेत्रों में सक्रिय रहे। वे उस परंपरा में थे, जिसमें चिंतन और कर्म, सृजन और समाज, बुद्धि और अध्यात्म के बीच दूरी बहुत कम थी। अकारण नहीं है कि कृष्णनाथ जैसे निर्मल चित्त और सजग बुद्धि वाला व्यक्ति छात्रों-युवजनों, लेखकों-बुद्धिजीवियों से लेकर किसानों-आदिवासियों में समान रूप से लोकप्रिय था। उनका निकट का संबंध आचार्य नरेंद्र देव और डॉ. राममनोहर लोहिया से था और ‘अंगरेजी हटाओ’ जैसे आंदोलनों के वे लगभग संचालक ही थे। सिविल नाफरमानी के सिलसिले में कृष्णनाथ तेरह बार स्वतंत्र भारत में जेल में बंद किए गए। इस सबके बावजूद वे अपनी राजनीति और सामाजिक सक्रियता को तमगे की तरह नहीं पहनते थे। उनके जैसा विनयशील और दूसरों को ध्यान से सुनने वाला लेखक और बुद्धिजीवी हमारे समय में, उनके जाने के बाद, और भी दुर्लभ हो गया है।

उनकी स्मृति में जो सभा हाल ही में दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में हुई, उसमें एक युवा गायक ने कबीर के पद गाए। याद आया कि कृष्णनाथ की कुमार गंधर्व से भी घनिष्ठता थी। कबीर ने तो दावा किया था कि उन्होंने बिना मैली किए ‘ज्यों की त्यों धर दीन्ही चदरिया’। हमारे समय में अगर किसी को अपनी चादर मैली होने से बचाने का लगातार जतन करते पाया जा सकता था तो वे कृष्णनाथ ही थे। कई बार उनका चेहरा बहुत दीप्त लगता था: वह ज्ञान और अध्यात्म की दीप्ति भर नहीं थी- वह मानवीयता की दीप्ति थी। ऐसे लोग कम नहीं होंगे और मैं उनमें से एक भर हूं, जिन्हें कृष्णनाथ के साथ समय बिताने के बाद हर बार लगा हो कि वे उजाले में, बिना किसी चकाचौंध पर सच्ची आत्मीयता से, बैठ कर आए हैं। कुछ लोग अपने आप में उजाला हो जाते हैं: कृष्णनाथ ऐसे ही थे, जिनसे बहुतों ने उजाला पाया और जिन्होंने पूरी उदारता से, अचूक विनय से वह देने में कभी कोताही नहीं की।

मातृभाषाएं और ज्ञान
आइआइटी खड़गपुर का कुछ हजार एकड़ों में फैला एक विशाल परिसर है। वहां इस सप्ताह जाना हुआ। यह संस्थान एक पुरानी औपनिवेशिक इमारत में शुरू हुआ था, जहां अब संग्रहालय है और जिसकी कोठरियों में अनेक स्वतंत्रता सेनानी जैसे ईश्वरचंद्र विद्यासागर आदि कैद किए गए थे। इस इमारत का अपना चरित्र है। यह देख कर क्लेश हुआ कि बाकी परिसर में जो इमारतें हैं, उनमें से एक भी वास्तुकला की दृष्टि से उल्लेखनीय नहीं कही जा सकती।

यों तो संसार भर के चिंतन में यह बात लगभग सर्वमान्य है कि भाषा और ज्ञान का अटूट संबंध होता है और मातृभाषाएं ज्ञानोत्पादन में बहुत बड़ी भूमिका निभाती हैं, हमारे यहां इसका अहसास बहुत कम है। जिस देश की भाषिक परंपरा में संसार का सबसे पहला व्याकरण, पहला नाट्यशास्त्र आदि संभव हुए और जिसमें भाषा को लेकर लगातार और मौलिक विचार किया गया है उसी देश में यह लोकप्रिय पूर्वग्रह है कि मातृभाषाओं में ज्ञान-विज्ञान संभव नहीं है! इस मनोवृत्ति से इस सिलसिले में हमारी मातृभाषाओं को अनुवाद की भाषाएं बना डाला है।

हम यह भी भूल गए हैं कि भाषा तटस्थ माध्यम या उपकरण नहीं है- उसमें अनिवार्यत: स्मृतियां, धारणाएं, सांस्कृतिक अनुगूंजें गुंथी होती हैं। भाषा के बिना ज्ञान संभव ही नहीं है: विचार, विश्लेषण, सिद्धांत-निरूपण, संवाद-संदर्भ, मूर्तन-अमूर्तन आदि जो ज्ञान के लिए अनिवार्य हैं, भाषा में ही होते हैं। हर भाषा, चाहे वह कितनी ही छोटी क्यों न हो, अपने में एक विश्वदृष्टि समाहित करती है। जब कोई भाषा लुप्त होती है तो ज्ञान का एक संग्रहालय भी लुप्त हो जाता है।

ज्ञान किसी भाषा की बपौती नहीं है: संस्कृत, ग्रीक, अरबी, चीनी, जापानी, स्पेनिश, जर्मन, फ्रेंच आदि अनेक भाषाओं में ज्ञान संभव हुआ है। आज भी जारी है। यह एक निराश तथ्य है कि हमने अपनी मातृभाषाओं को ज्ञान की विधा मानना और बरतना लगभग बंद कर दिया है। हम, खासकर हमारा चिकनाचुपड़ा और ज्यादातर नकलची मध्यवर्ग, यह भूल गया है कि कोई भी भारतीय बच्चा अगर अपनी मातृभाषा सबसे पहले सीखेगा और पढ़ेगा तो उसी में ज्ञान रचना भी उसे आएगा। फिर अधिकतर जिसे हम भ्रमवश ज्ञान समझते हैं वह निरी टेक्नोलॉजी है: उसके पीछे कोई मौलिक चिंतन नहीं है।

कई बार यह सोच कर दहशत होती है कि भारतीय अपनी परंपरा और लोकतंत्र के लिए जरूरी प्रश्नवाचकता से मुंह मोड़ रहे हैं। जिस देश में विचारों को लेकर खुले शास्त्रार्थ होते थे उसमें बहसें टीवी शो बन कर रह गई हैं, जिनका विचारों से संबंध बहुत शिथिल है। विचार और शास्त्रार्थ ज्ञान के लिए जरूरी हैं- उसके उत्पादन और विस्तार के लिए। उनसे दूरी अंतत: ज्ञान से दूरी है। हम ज्ञान-आधारित समाज नहीं, टेक्नोलॉजी से आक्रांत समाज बन रहे हैं, जहां हमारा मौलिक ज्ञान बहुत कम होगा, पश्चिम की नकल अधिक। इस दुर्गति से बचने के लिए एक बौद्धिक अभियान, अनेक स्तरों पर, चलाने की जरूरत है।

विश्वयुद्ध और हिंदी
सामान्य रूप से हम युद्ध और हिंदी के बीच किसी संबंध की कल्पना नहीं करते: जो बेचारी भाषा विचार के अनेक क्षेत्रों में प्रवेश नहीं कर पाई वह युद्ध में कैसे शामिल हुई होगी! लेकिन इसी सप्ताह इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में द्वितीय महायुद्ध की जापानी सेनाओं ने अपने कार्टून-परचों में हिंदी का प्रयोग व्यापक रूप से किया था, यह सच्चाई जाहिर हुई, एक सचित्र वार्ता से। वार्ताकार थे ओसाका अंतरराष्ट्रीय अध्ययन विश्वविद्यालय से रिटायर हुए भारत बहुभाषाविद् डॉ. तोमिओ मिजोकामी, जिन्होंने कई स्लाइड्स दिखा कर यह बताया कि कैसे जापान ने पूर्वी भारत में बांटे-बिखेरे गए इन परचों में हिंदी, उर्दू और बांग्ला का इस्तेमाल किया था: अधिकांश में भारत को अपने को ब्रिटिश शासन से मुक्त करने का सुयोग मिलने की बात कही गई थी। मूल जापानी उक्तियों का इन भाषाओं में किसने अनुवाद किया, इसका ब्योरा अभी तक नहीं मिल पाया है।

यह देखना दिलचस्प था कि इन परचों के संबोध्य भारतीय समाज के कई वर्ग थे; अनुवाद की हिंदी खासी क्लिष्ट थी और हिज्जे आदि की कई भूलें थीं। उन्हें देख कर याद आया कि भारत की राजधानी में जहां कहीं सार्वजनिक सूचनाओं में हिंदी का प्रयोग होता है, उसमें हिज्जे की भूलें अनिवार्यत: होती हैं। कोई हिंदी पखवाड़े में चाय-नाश्ते पर आने वाले भारी खर्च को रोक कर इन हिज्जों को ही ठीक कर दे!

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