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कभी-कभार : संगीत और चित्रबद्ध कविता

अशोक वाजपेयी मुंबई की एशियाटिक सोसायटी के दरबार हॉल में जब दो खंडों में प्रकाशित पुस्तक ‘कालजयी कुमार गंधर्व’ (राजहंस और वाणी प्रकाशन) का लोकार्पण रंगकर्मी विजया मेहता ने किया तब एक बार फिर समझ में आया कि अपनी मृत्यु के बाईस वर्ष बाद भी इस अद्भुत नायक-गायक का आकर्षण और उपस्थिति रसिक समाज में […]

Author December 21, 2014 1:37 PM

अशोक वाजपेयी

मुंबई की एशियाटिक सोसायटी के दरबार हॉल में जब दो खंडों में प्रकाशित पुस्तक ‘कालजयी कुमार गंधर्व’ (राजहंस और वाणी प्रकाशन) का लोकार्पण रंगकर्मी विजया मेहता ने किया तब एक बार फिर समझ में आया कि अपनी मृत्यु के बाईस वर्ष बाद भी इस अद्भुत नायक-गायक का आकर्षण और उपस्थिति रसिक समाज में कितने गहरे और टिकाऊ हैं। विजयाजी ने यह याद किया कि कैसे 1950 के आसपास मुंबई में अनेक कवि, चित्रकार, गायक और रंगकर्मी अपनी बेचैन तलाश में आपस में मिलते-जुलते-बतियाते-बहस करते थे। सब अलग-अलग थे, पर साथ थे, क्योंकि तलाश और बेचैनी में उनका साझा था। कुछ चर्चा इसकी भी की गई कि कैसे कुमारजी ने संगीत रचने और उसके बारे में सोचने का एक नया सौंदर्यशास्त्र प्रस्तावित किया। उन्होंने संगीत की निपट नश्वरता, रागों के अपने आत्यंतिक अर्थ न होने और संगीतकार द्वारा उसमें अर्थविहित करने और परंपरा और निरा पिष्टपेषण और आवृत्ति न मानने, शास्त्रीय की लोक से उद्भूति, संगीत की अदम्य परिवर्तनशीलता आदि पर आग्रह किया और उसे सिर्फ सर्जनात्मक नहीं, बौद्धिक स्तर पर भी रूपायित किया।

अगली सुबह रायपुर जाने से पहले मैं भावजी लाड संग्रहालय गया, जहां अतुल डोडिया की नई कलाकृतियों की एक सुनियोजित प्रदर्शनी दो-तीन दिन पहले ही शुरू हुई थी। अतुल बहुत नवोन्मेषी कलाकार हैं। वे विषय और शैली दोनों ही में लगातार कुछ न कुछ नया तलाशते और चित्रित करते रहते हैं। मुझे उनका कविता और गांधीजी के प्रति आकर्षण विशेष और अनूठा जान पड़ता है। उनके यहां सामग्री की विविधता भी हमेशा रहती है। इस प्रदर्शनी में चित्रण के अलावा फोटोग्राफ, लिपियों, शिल्पित और पहले से बनी हुई वस्तुओं आदि का उपयोग भरपूर है। स्वतंत्रता-संग्राम की कुछ घटनाओं और गांधीजी के फोटोग्राफ्स का अतुल-नियोजन अनूठा है: उसमें रवींद्रनाथ ठाकुर के कुछ डूडल्स या चित्रों को अभिप्रायों की तरह रेखांकित किया गया है। एक फोटोग्राफ बहुत मार्मिक है, जिसमें गांधीजी उस जहाज की एक बेंच पर कुछ सिकुड़े हुए से चादर ओढ़े सो रहे हैं, जिसमें वे लंदन गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने गए थे।

अरुण कोलटकर की ‘काला घोड़ा’ कविताओं को मूल अंगरेजी में काफी बड़े आकार के कैनवासों पर लिखा गया है और ऐसी कृतियों के पीछे दूसरी कृति भी है, जिसमें अनेक वस्तुओं का कोलाज जैसा समूहन है। जलरंगों में कुछ व्यंग्य भाव से भारत के अनेक छोटे केंद्रों में नए संग्रहालयों के प्रस्ताव के रूप में चित्र प्रदर्शित हैं: ईटानगर, अमरावती, बीकानेर, जलंधर आदि में। जाहिर है कि इन प्रस्तावों को स्वीकार कर भारत में संग्रहालयों की एक शृंखला निकट भविष्य में बनने नहीं जा रही है, जबकि ऐसा करना सर्वथा संभव और वांछनीय है। अभी तो हम अपना कचरा हटा कर स्वच्छ भारत बनाने के अभियान में लगे हैं। कई बार लगता है कि हटाए गए कचरे का भी एक राष्ट्रीय संग्रहालय बनना चाहिए, ताकि भविष्य की पीढ़ियां जान सकें कि हमने कितना कचरा जमा किया और फैलाया था!
रायपुर में साहित्य महोत्सव

पुरखौती मुक्तांगन नए रायपुर में, शहर से बहुत दूर। उद्घाटन के दूसरे दिन वहां हो रहे साहित्य महोत्सव में जब दस बजे पहुंचा तो मुक्तिबोध मंडप में बहुत कम लोग थे। ठंडा-सा बदराया हुआ दिन था। लेकिन थोड़ी देर में लोग आने लगे और दोपहर तक सभी समांतर चलने वाले सत्रों में काफी लोग आ गए। पहला प्रयत्न, इतना महत्त्वाकांक्षी, इतना लोकप्रिय और सफल! थोड़े अचरज की बात जरूर है। साहित्य, सिनेमा, पत्रकारिता, रंगमंच आदि के लिए इतने लोग जुड़ सकते हैं, अगर ठीक से कल्पित-आयोजित हों, यह देखना सुखद रहा।

विषय विविध थे, सभी संवाद हिंदी या छत्तीसगढ़ी में थे: उनमें ‘अंधेरे में’ की अर्द्धशती, प्रतिरोध का साहित्य, क्या लुप्त हो जाएगा लोक, सत्ता साहित्य और संस्कृति, हबीब तनवीर का रंगलोक, लोकतंत्र और साहित्य, साहित्य और कलाओं की अंतर्निभरता, भारतीय भाषाएं और भारतीयता, भक्तिकाव्य: समकालीन पाठ की तलाश, साहित्य में लोकप्रियता की खोज, बदलते परिवेश में हिंदी कहानी, साहित्य में शुचिता, असहमतियों के बीच साहित्य, आभासी संसार में शब्द सर्जना आदि विषय शामिल थे। काव्यपाठ के भी कई सत्र थे। लगभग बारह सत्र छत्तीसगढ़ी साहित्य, संस्कृति आदि को लेकर थे। विनोद कुमार शुक्ल, नरेश सक्सेना, प्रभात त्रिपाठी, लीलाधर मंडलोई, अर्चना वर्मा, मैत्रेयी पुष्पा, भानु भारती, देवेंद्रराज अंकुर, जया जादवानी, राजेंद्र मिश्र, प्रयाग शुक्ल, नंदकिशोर आचार्य, प्रभाकर श्रोत्रिय, हेमलता महिश्वर, पुरुषोत्तम अग्रवाल, नादिरा बब्बर, गीताश्री, जयप्रकाश, प्रभात रंजन, पीयूष दइया आदि ने भाग लिया।

बताया गया कि उद्घाटन सत्र में मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह ने अपने वक्तव्य में वैचारिक असहमति का स्वागत करते हुए उसे शिक्षाप्रद बताया। वे उद्घाटन-वक्तव्य भर के लिए मंच पर आए, लेकिन बाकी वक्त श्रोताओं के बीच बैठे रहे। यही संस्कृति मंत्री ने किया। सिर्फ परिसर में नहीं, पूरे परिवेश में खुलापन और स्वतंत्रता थी: आप पर कोई बंदिश नहीं थी कि आप क्या कहें। नंदकिशोर आचार्य ने अपने एक वक्तव्य में लोकतंत्र की आत्मा को बहुमत के वर्चस्व की नहीं, बहुमत अल्पमत का कितना सम्मान करता है, इसे लोकतंत्र के लिए आधार और अनिवार्य कसौटी बताया। एक-दूसरे वक्तव्य में उन्होंने बहुलता को भारतीयता का मूलाधार बताया और इस बहुलता को संकुचित या नियंत्रित करने के किसी भी प्रयत्न को अभारतीय करार दिया।

हिंदी की राष्ट्रभाषा-ग्रंथि को व्यर्थ का बोझ बताते हुए मैंने कहा कि भारत में कुछ भी एकवचन शुरू से ही नहीं रहा है और उसकी भाषाएं और बोलियां उसके बुनियादी बहुवचन की सशक्त अभिव्यक्ति हैं। एकधार्मिक, एकभाषिक मॉडल पश्चिमी है और हम पर लागू नहीं हो सकता: किसी एक भाषा को थोपने और बाकी भारतीय भाषिक बहुलता और संपदा की अवहेलना करने की कोई भी चेष्टा अभारतीय होगी। सभी भारतीय भाषाएं अपने-अपने क्षेत्रों में राष्ट्रभाषाएं हैं- संविधान हिंदी को अधिक से अधिक राजभाषा का दर्जा देता है- राष्ट्रभाषा शब्द का प्रयोग उसमें है ही नहीं। उसे जबरन राष्ट्रभाषा मानना और उसे थोपने की कोशिश करना उसे तानाशाह बनाना होगा जो हिंदी की प्रकृति के अनुकूल नहीं है।

हिंदी अपने आप फैल-बढ़ रही है और भारतीय भाषाओं के हित संरक्षण का उसे प्रखर पक्षधर और प्रवक्ता बनना चाहिए। मुझे लगता है कि इस समय हिंदी को खतरा चौतरफा है: राजनीति से जो उसका शोषण करती और उसका दुरुपयोग करती है; शिक्षा-व्यवस्था से जो उसे अरुचिकर-नीरस और ज्ञानोत्पादनहीन बनाने पर तुली है; धर्मांधता और सांप्रदायिकता से जो चूंकि हिंदी अंचल में सबसे सक्रिय-उग्र-निर्णायक हैं उसे संकीर्णता-पिछड़ापन-अत्याचार की भाषा बना कर पेश करने पर उतारू हैं और मीडिया से जो भाषा की सारी मर्यादाओं का उल्लंघन कर उसका सबसे विकृत और मनमाना उपयोग कर रहा है। स्वयं राजभाषा बनना हिंदी के लिए एक विराट पाखंड का शिकार होना भर रहा है: वह सचमुच राजभाषा बन ही नहीं पाई। उसका राजभाषाई रूप उसके जन और साहित्य दोनों से इतना दूर है कि उसने हिंदी को एक अबूझ भाषा बना दिया है।

 

वर्षांत के नजदीक

वर्ष का आखिरी महीना चल रहा है। दिल्ली में विलंबित सर्दी आ गई है। सांस्कृतिक गतिविधियां इतनी अधिक हो रही हैं कि आप चाहें तो सारा दिन संस्कृति में ही बिता सकते हैं। कम से कम पूरी शाम तो निश्चय ही। हम जैसे निठल्ले अक्सर ऐसा करते भी हैं। कुछ तो रुचि का दबाव, कुछ अच्छा देख-सुन पाने की ललक, कुछ यारबाशी का तकाजा। बड़ी अड़चन दिल्ली के अराजक और अड़ंगा-प्रधान यातायात से होती है और कई बार एक वीथिका से भाग कर समय पर दूर स्थित किसी सभागार में संगीत-सभा के लिए समय पर पहुंचना बहुत कठिन हो जाता है। यह मानवीय अस्तित्व की एक स्थाई विडंबना है: जीवन सुविधाएं देता चलता है और कठिनाइयां भी साथ-साथ बढ़ाता रहता है।

एक हितैषी ने जिज्ञासा की कि एक ही शाम में भाग-दौड़ कर इतना सारा देखना-सुनना संभव भले हो, उस सब का धीरज और समझ से, संवेदनशीलता से रसास्वादन कर पाना क्या संभव हो पाता है? लगता है कि इस पर ध्यान कम गया है कि इस कदर झटपटापन हमारी समझ और आस्वाद की क्षमता को प्रभावित भी कर रहा है। विलंबन लगभग गैरजरूरी हो गया है। हम अधिक तीक्ष्णता से देखने-सुनने लगे हैं। विलंब को एक तरह की नई तात्कालिकता ने अपदस्थ-सा कर दिया है। हो सकता है कि यह अपनी अधीरता को महिमामंडित करना भर हो, महज खामखयाली हो। पर इतना तो, फिर भी, मानना ही होगा कि समझ और आस्वाद का न सिर्फ भूगोल तेजी से फैल रहा है, उसके रूपाकार और तत्त्व भी बदल रहे हैं। यह भी अलक्ष्य नहीं किया जा सकता कि कई कलारूप और शैलियां इस झटपटेपन को अभ्यंतर कर आत्मसात और आवश्यक बना रही हैं।

हड़बड़ी का रूपक जब चल ही रहा है तो यह भी लग रहा है कि यह वर्ष कुछ जल्दी बीत गया: बहुत तेजी से परिवर्तन हुए और बहुत सारी ऐसी वृत्तियां और कुप्रवृत्तियां, जिन्हें हम भूल चुके थे, फिर तेजी से वापस आ गई हैं। तेजी से भागने वाले ठिठक कर यह तमाशा देख रहे हैं।

 

 

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