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भाषा-भूषा : कैद में बुलबुल

कुछ दिनों पहले दिल्ली के एक मशहूर महिला कॉलेज में जाना हुआ। कॉलेज में घुसते ही चटर-पटर करती लड़कियों से सामना हुआ। तरह-तरह के कपड़े, जूते, थैले, पर्स, मोबाइल...

नई दिल्ली | Updated: September 13, 2015 3:48 PM

कुछ दिनों पहले दिल्ली के एक मशहूर महिला कॉलेज में जाना हुआ। कॉलेज में घुसते ही चटर-पटर करती लड़कियों से सामना हुआ। तरह-तरह के कपड़े, जूते, थैले, पर्स, मोबाइल आदि से लैस ये लड़कियां अपनी ही दुनिया में खोई थीं। आगे बढ़ कर एक कमरे में पहुंची, तो वहां दूसरी ही श्रेणी की लड़कियों से भेंट हुई। लंबी बाजू वाले कुरते-सलवार, चुन्नियां, चेहरे पर कांतिहीनता, नजरें झुकी हुर्इं, नाम पूछने पर शरमाती हुर्इं। ये सब हिंदी पढ़ने वाली लड़कियां थीं। हैरानी की बात नहीं कि इन्हें बाकी लड़कियां बहनजी कह कर पुकारती होंगी!

पिछले बीस साल से लड़कियों में दो श्रेणियां पाई जाती हैं। एक वे जो पश्चिमी वेश-भूषा के ब्रांडेड कपड़े पहनती हैं। आमतौर पर उनके कटे बाल फर-फर उड़ते हैं और अंगरेजी के अलावा कुछ नहीं बोलतीं। दूसरी वे होती हैं, जिनका वर्णन ऊपर किया गया। इन्हें हिंदी वाली बहनजी कह कर पुकारा जाता है। ये हंसी उड़ाने लायक ही मानी जाती हैं। इनकी गरीबी, निम्न मध्यवर्गीय आर्थिक स्थिति इन्हें बाकी लड़कियों से अलग करती है जैसा कि उस मशहूर कॉलेज में दिखाई दिया।

तो क्या हिंदी सिर्फ साधनहीन की भाषा है! लेकिन ऐसा क्यों और कैसे हुआ होगा कि जिस भाषा को पचपन करोड़ से अधिक लोग बोलते हों उसकी लड़कियां और स्त्रियां इतनी विपन्न और दरिद्र नजर आएं। या जिन्हें किसी और विषय में प्रवेश नहीं मिलता, नंबर कम होते हैं, इसलिए वे हिंदी को चुनती हैं। या कि जिन लड़कियों को सिर्फ इसलिए पढ़ना है कि जल्दी ही माता-पिता अपनी बला टाल कर उनकी शादी कर देंगे। आखिर बहुत से माता-पिता आज भी लड़कियों को बला ही समझते हैं। और उनका परम उद्देश्य होता है कि जल्दी से जल्दी लड़की को घर से धक्का दे दिया जाए। जब आगे पढ़ना ही नहीं, तो किसलिए कठिन विषयों से मगजपच्ची की जाए। हिंदी ही ठीक है।

सिर्फ यही नहीं, दफ्तरों में हिंदी बोलने वाली लड़कियां, मेट्रो में सफर करने वाली सब एक अजूबे की तरह देखी जाती हैं। अजूबे से भी ज्यादा अपने से नीचे। सच यह भी है कि आज सिर्फ हिंदी जानने वाले को कहीं नौकरी नहीं मिलती है। कॉरपोरेट में सरकारी स्कूलों में और हिंदी माध्यम से पढ़े बच्चों के रिज्यूमे एक तरफ खिसका दिए जाते हैं।

हिंदी का कितना दुर्भाग्य है कि उसे अपनों द्वारा ही न केवल पिटाई झेलनी पड़ती है, बल्कि गरीब लड़कियों की तरह हर वक्त खदेड़े जाने का डर बना रहता है। यह तब है, जबकि आजकल हिंदी कमाऊ भाषा मानी जाती है। उसकी तेज चाल और विकास की बातें भी होती रहती हैं। लेकिन जो भाषा अमीर अभिनेता-अभिनेत्रियों को करोड़ों में पारिश्रमिक दिलवाती है, जब वही लोग बातचीत करने आते हैं, तो हिंदी बोलना अपनी तौहीन समझते हैं। क्योंकि इनके आसपास हिंदी उसी गरीब और काम वालों की भाषा है, जिन्हें ये अपने बराबर का नहीं मानते। यही नहीं, अच्छी तरह से हिंदी जानने वाले, हिंदी प्रदेशों में पढ़े-लिखे लोग इस बात को कहने में बहुत गौरव समझते हैं कि यू नो माई हिंदी इज नॉट दैट गुड।

हिंदी क्षेत्र में होने वाले सभा-सेमिनारों में हिंदी बोलना, इसमें भाषण देना किसी अपराध की तरह है। लोगों को यह डर दिखाया जाता है कि अन्य लोग जो इस जगह उपस्थित हैं वे हिंदी नहीं समझेंगे। जबकि अन्य भाषाभाषी इस बात की चिंता कभी नहीं करते कि कौन उनकी भाषा को समझेगा और कौन नहीं। आप उनकी भाषा न समझें यह आपकी समस्या और कमजोरी है, उनकी नहीं। दरअसल, हिंदी बोलना लोग अपनी शान के खिलाफ समझते हैं। इसीलिए हिंदी बोलने वाली लड़कियों को सिर्फ घरेलू काम वाली बनाने लायक ही समझा जाता है।

बेचारी हिंदी की हालत संयुक्त परिवार के बड़े बेटे जैसी है, जिसे हर हाल में घर और कुनबे को बांध कर रखना है। कोई कुछ भी कहता रहे वह चुप लगाती रहे या आदर्श बघारना सुनती रहे, या वह प्रेमचंद की ‘बड़े घर की बेटी’ है जो मारपीट सहती रहे, मगर उफ न करे। यों संयुक्त परिवार के टूटने की बातें की जाती हैं और उन्हें स्त्री शोषण का सबसे बड़ा प्रतीक कहा जाता है। हिंदी के प्रति इस जेंडर दुराग्रह को कैसे दूर किया जाए, जो उसे स्त्रीलिंग होते हुए भी विशेष सुविधाएं देने की जगह हिंसा का व्यवहार करता है। और इस भाषा के प्रति हर तरह की हिंसा करके लोग बच निकलते हैं। उन पर घरेलू हिंसा के खिलाफ केस भी दर्ज नहीं किया जा सकता।

तुलसी का वह पद सुनते आए हैं कि समरथ को नहिं दोष गुसार्इं। मगर हिंदी के बारे में यह सर्वथा गलत साबित होता है। हिंदी समर्थ है, मगर हर बार दोषी ठहरा दी जाती है। हर बार उसे किसी गरीब बच्ची की तरह इसलिए ठोका जाता है कि वह अपने मालिकों के मुकाबले अधिक सामर्थ्यवान क्यों है। उसे तो हमेशा रोते-बिसूरते ही दिखना चाहिए, जैसी कि उस मशहूर कॉलेज में पढ़ने वाली लड़कियां इस लेखिका को दिखी थीं। और बार-बार आग्रह करने पर भी वे अपने शर्म के खोल से बाहर नहीं आ सकी थीं। एक ही कॉलेज में यह नए किस्म का जातिवाद था, जो लड़की लड़की में फर्क करता था।

जब से इस लेख को लिखने बैठी हूं एक बहुत ही पुराना गाना याद आ रहा है- कैद में है बुलबुल सय्याद मुसकराए, कुछ कहा भी न जाए चुप रहा भी न जाए। अगर इन पंक्तियों को हिंदी के बारे में सोचें तो ये बिल्कुल ठीक बैठती हैं। हिंदी रूपी बुलबुल इन दिनों उद्योग की कैद में है। उद्योग को पचपन करोड़ हिंदीभाषियों की जेब से पैसा निकालना है। इसलिए विज्ञापन हिंदी में बनाने हैं और रिसर्च अंगरेजी में करनी है। इसके अलावा हिंदी की एक कैद और है, जो उसे अहिंदीभाषियों ने नहीं, बल्कि हिंदीभाषियों ने ही सौंपी है। हिंदी विरोध, उसे पिछड़ी हुई कहना उसके कोई स्टेटस न होने की बात कहना, और तो और उसे सांप्रदायिकता से भी जोड़ना, उसे साम्राज्यवादी कहना जैसे कि हिंदी अमेरिका या यूरोप की साम्राज्यवादी शक्तियों की पहचान हो, भारत से उसका कई मतलब ही न हो।

हिंदी में प्रगतिशील कहलाने के लिए बेहद जरूरी माना जाता रहा है कि आप हिंदी को अन्य भाषाभाषियों के सामने कितनी चुनिंदा गालियां दे सकते हैं। एक ओर यही लोग तमाम अन्य मातृभाषाओं के विकास की बातें करते रहे हैं, मगर हिंदी का नाम आते ही जब तक उसमें चार-छह लातें न जड़ें इनका काम नहीं चलता। क्या ये बांग्ला, मलयालम, तमिल या किसी और भारतीय भाषा के साथ ऐसा कर सकते हैं। करके देखें तो इन्हें फौरन उचित जवाब मिलेगा। इसके लिए श्रेय इन भाषाओं को बोलने वाले लोगों को देना होगा, जो अपनी भाषा के सम्मान की रक्षा किसी भी कीमत पर करते हैं।

यही नहीं, दो बांग्लाभाषी अगर मिलें और वे कितने ही बड़े पद पर काम करते हों, वे बिना जान-पहचान के भी आपस में बांग्ला में बातें करने लगते हैं। वे कभी यह नहीं सोचते कि मातृभाषा बोलने के कारण कोई उन्हें हीन समझेगा।

कुछ साल पहले अंगरेजी माध्यम के एक तमिल स्कूल में जाना हुआ था। वहां अधिकतर अध्यापिकाएं तमिल में ही बातें कर रही थीं। मातृभाषाओं की आए दिन पुरजोर वकालत करने वाले इन लोगों से कभी अपनी मातृभाषा का सम्मान करना नहीं सीखते।

जिस तरह हिंदी को पैसा कमाते हुए भी रोजगार की स्पर्धा से बाहर कर दिया गया है, वह बेहद खतरनाक है। दिल्ली के जिस मशहूर कॉलेज की लड़कियों की बात ऊपर की गई, आखिर अगर वे नौकरी करने निकलीं तो कहां रोजगार पाएंगी।

(क्षमा शर्मा)

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