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निनाद : आपातकाल का मानस

कुलदीप कुमार आपातकाल की चालीसवीं वर्षगांठ आई और चली गई। इस अवसर पर वे सभी रस्मी बातें की गर्इं, जो ऐसे अवसरों पर हमेशा की जाती हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी, जो इन दिनों महत्त्वपूर्ण सवालों पर कभी अपने ‘मन की बात’ नहीं करते, ट्वीट के जरिए इसे ‘सबसे अंधकारमय काल’ बताया। लेकिन आपातकाल […]

Author June 28, 2015 4:46 PM

कुलदीप कुमार

आपातकाल की चालीसवीं वर्षगांठ आई और चली गई। इस अवसर पर वे सभी रस्मी बातें की गर्इं, जो ऐसे अवसरों पर हमेशा की जाती हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी, जो इन दिनों महत्त्वपूर्ण सवालों पर कभी अपने ‘मन की बात’ नहीं करते, ट्वीट के जरिए इसे ‘सबसे अंधकारमय काल’ बताया। लेकिन आपातकाल के पीछे की मानसिकता के बारे में किसी ने कोई बात नहीं की। इस मानसिकता को तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने ‘इंदिरा इज इंडिया ऐंड इंडिया इज इंदिरा’ (इंदिरा भारत है और भारत इंदिरा है) के नारे में बखूबी व्यक्त कर दिया था। एक नेता को सबके ऊपर मानना, उसकी तनिक-सी आलोचना भी बर्दाश्त न करना, उसे ही पार्टी, सरकार और देश का पर्याय मान लेना- संक्षेप में यह कि हर प्रकार के लोकतंत्रविरोधी रवैए और मूल्य को वैधता प्रदान करना, आपातकाल के पीछे की मानसिकता रही।

बिना आपातकाल लगाए भी इस मानसिकता को पाला-पोसा जा सकता है। पिछले तेरह माह का इतिहास इस बात का गवाह है कि इस दौरान सत्तापक्ष की ओर से इस मानसिकता को जितना उभारा गया है, उतना शायद पहले कभी नहीं उभारा गया। इसका एक प्रमाण तो यह है कि आपातकाल का अधिकतर समय जेल में गुजारने वाले भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठतम नेता लालकृष्ण आडवाणी को आपातकाल से संबंधित कार्यक्रमों में बुलाया तक नहीं गया। सरकार और पार्टी पर एकछत्र वर्चस्व स्थापित करने की लालसा इसके पीछे साफ देखी जा सकती है।

पर ऐसा नहीं कि आपातकाल के दमन को झेलने वाले आडवाणी जैसे नेताओं की पीढ़ी ने आपातकाल हटने के बाद उस प्रक्रिया को रोकने के लिए कुछ किया हो, जिसके कारण किसी लोकतांत्रिक देश में आपातकाल संभव होता है। जनता पार्टी की सरकार ने संविधान में संशोधन करके केवल उसे लगाना बेहद मुश्किल बना दिया। लेकिन राजनीतिक व्यवहार के स्तर पर कुछ नहीं बदला। आपातकाल के दौरान जगमोहन का नाम खलनायक की तरह लिया जाता था। संजय गांधी को आपातकाल का सूत्रधार माना जाता था। जगमोहन को भाजपा ने केंद्रीय मंत्री और राज्यपाल बनाया। मेनका गांधी को सिर्फ इसलिए पार्टी में लिया गया और सांसद तथा मंत्री बनाया गया, क्योंकि वे संजय गांधी की पत्नी हैं। ऐसे अनेक उदाहरण हैं और इस प्रक्रिया में चंद्रशेखर समेत दूसरे नेता भी शामिल रहे हैं।

आज दुनिया भर में भारत सबसे युवा देश है। जो व्यक्ति आज पैंतालीस-पचास साल के बीच की आयु का है, उसे आपातकाल की कोई याद नहीं। उसके लिए वह वैसी ही है जैसे आजादी की लड़ाई, जिसके बारे में सुना और पढ़ा तो है, लेकिन उसका कोई अनुभव हमारे पास नहीं है। इसलिए आपातकाल की वर्षगांठ अधिकतर भारतीयों के लिए कोई खास महत्त्व नहीं रखती। लेकिन पिछले पच्चीस सालों में जो हुआ, उसकी स्मृति अब भी काफी लोगों को है। इस अवधि के दौरान यह हुआ है कि अल्पसंख्यकविरोध को राजनीतिक वैधता मिली, सेक्युलर मूल्यों की खिल्ली उड़ाना इतना स्वाभाविक हो गया कि देश का प्रधानमंत्री विदेश जाकर सार्वजनिक मंच से यह काम करता है, बिना यह सोचे कि उसने सेक्युलर संविधान की रक्षा करने की शपथ खाई है। 1984 में सिखों के खिलाफ हिंसा को वैधता मिली तो 2002 में मुसलमानों के खिलाफ हिंसा को। लोग आज भी यह सोच रहे हैं कि अच्छे-भले, पढ़े-लिखे और सभ्य-सुसंस्कृत लोग कैसे ऐसी हिंसा को जायज ठहरा सकते हैं?

यूरोप और अमेरिका में इस प्रश्न का जवाब ढूंढ़ने की काफी कोशिश की गई है कि 1920 और 1930 के दशक में अचानक इटली और जर्मनी में फासीवाद और नात्सीवाद के पनपने और इतना शक्तिशाली होने के पीछे की ऐतिहासिक प्रक्रिया क्या थी? लाखों यहूदियों का इतनी आसानी से कैसे सफाया कर दिया गया? कैसे लोकतंत्र के कंधों पर चढ़ कर एक ऐसी दमनकारी राजनीतिक व्यवस्था ने पूरे जर्मन राष्ट्र को अपने कब्जे में कर लिया, जिसकी मिसाल यूरोप के रक्तरंजित इतिहास में मिलनी मुश्किल है? इसका जवाब यह है कि नात्सीवादी विचारधारा अनेक दशकों से बिना इस लेबल के फैल रही थी और गोरे लोगों के सामान्यबोध का अंग बन गई थी। हिटलर का अक्षम्य अपराध यह था कि गोरों के उपनिवेशों के निवासियों- अल्जीरिया के अरबों, भारत के कुलियों और अफ्रीका के नीग्रो- के साथ जो बर्ताव स्वाभाविक माना जाता था, उसे उसने यूरोपियनों के साथ कर डाला और समूचे यूरोप को ही एक विशाल उपनिवेश में बदल दिया।

प्रसिद्ध अश्वेत कवि और उपनिवेशवाद-विरोधी आंदोलन के नेता एमि सिजेर का निष्कर्ष था: ‘बीसवीं सदी के बहुत विशिष्ट, बहुत मानवीय और बहुत ईसाई बुर्जुआ के भीतर भी एक हिटलर सोया रहता है।’ यह मान्यता बुर्जुआ सामान्यबोध का हिस्सा बन गई थी कि साम्राज्यवाद ने धरती से हीनतर नस्लों का सफाया करके सभ्यता की सेवा की है। राजनीतिशास्त्री महमूद ममदानी ने इस तथ्य की ओर ध्यान आकृष्ट किया है कि जब ब्रिटिश प्रधानमंत्री लॉर्ड सेलिसबरी 4 मई, 1898 को अल्बर्ट हॉल के अपने प्रसिद्ध भाषण में यह कह रहे थे कि विश्व के राष्ट्रों को दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है- जीवंत और मृतप्राय, उस समय हिटलर नौ साल का था और यूरोपीय विचार में यह धारणा बहुत गहरे जड़ जमा चुकी थी कि हीनतर नस्लों का विनाश प्रकृति के नियमों के अनुसार एक अनिवार्यता है। 1803 में यूरोपीय उपनिवेशवादी तस्मानिया पहुंचे, जो आयरलैंड के आकार का द्वीप था। अगले वर्ष से ही वहां के मूल निवासियों का सफाया शुरू हो गया और 1869 में अंतिम मूल निवासी की मृत्यु हुई।

यहां इस इतिहास को याद करने का आशय सिर्फ इतना है कि जिस तरह मानवता को श्रेष्ठतर और हीनतर नस्लों में बांट कर अकल्पनीय हिंसा की गई, उसी तरह हमारे देश में समाज को ‘राष्ट्रवादी श्रेष्ठ समुदाय’ और ‘राष्ट्रविरोधी हीन समुदाय’ में बांटा जा रहा है। हमारे यहां लगातार होने वाले सांप्रदायिक दंगों में- जिन्हें सुनियोजित हिंसा कहना अधिक सही होगा- कम अमानवीयता के दर्शन नहीं होते।

पिछले वर्ष छपी अपनी पुस्तक ‘सम्राट’ में सुजाता आनंदन ने एक बेहद मर्मस्पर्शी घटना का विवरण लिखा है। शिवसेना से प्रभावित एक युवक मुंबई दंगों के दौरान उस बूढ़े पर हमला करने वाले दल में शामिल था, जो उनकी बस्ती को डबल रोटी और अंडे वगैरह बेचने साइकिल पर आया करता था और जिसे वह बचपन से देख रहा था। उस समय उसे लग रहा था कि देश और समाज के लिए बहुत बड़ा काम कर रहा है, लेकिन बाद में उसे इसकी व्यर्थता समझ में आ गई। उसने उस बूढ़े के लड़के के लिए एक दुकान खोल दी, उस पर शिवसेना का झंडा लगा दिया और उससे कहा कि हालांकि दुकान का मालिक वही है, लेकिन अगर कोई पूछे तो वह उसका (उस युवक का) नाम बता दे, ताकि वह सुरक्षित रहे।

आज लालकृष्ण आडवाणी को यह आशंका सता रही है कि आपातकाल की वापसी मुश्किल भले हो, असंभव नहीं है। उन्हें यह भी सोचना चाहिए कि इस स्थिति के लिए कौन जिम्मेदार है? आज विधायक, सांसद और मंत्री खुलेआम लोगों को पाकिस्तान जाने और समुद्र में डूब जाने को कह रहे हैं। सत्तारूढ़ पार्टी का महासचिव और आरएसएस का पूर्व प्रवक्ता उपराष्ट्रपति पर लांछन लगा रहा है। पिछले गणतंत्र दिवस पर भी उन पर इसी तरह का लांछन लगाया गया था, कहा गया कि उन्होंने सलामी नहीं ली। ये लांछन इसीलिए लगाए गए, क्योंकि उपराष्ट्रपति अल्पसंख्यक समुदाय के हैं। ऐसे लांछन लगाने वाले खेद भी प्रकट करते हैं, लेकिन इन्हें लगाना बंद नहीं करते।

इन लोगों को ‘हाशिये पर के तत्त्व’ कहना देश को गुमराह करना है। ऐसी बातें करने वाले तथाकथित योगी हों, साध्वी या फिर सामान्य जन, ये सभी राजनीति की मुख्यधारा के लोग हैं और जिम्मेदार पदों पर बैठे हैं। इनकी ऐसी मानसिकता इसीलिए बनी है कि आपातकाल हटने के बाद के दशकों में भी उसी मानसिकता को बढ़ावा दिया गया, जिसके कारण आपातकाल जैसी स्थिति पैदा होती है। क्या इस धारा का रुख मोड़ना अब संभव है? क्या कोई राजनीतिक दल या आंदोलन इस दिशा में पहल करेगा?

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