देखी-सुनी : उस सड़क का नाम लो - Jansatta
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देखी-सुनी : उस सड़क का नाम लो

इससे पहले कि लीग कबड्डी की टीमों का हश्र आइपीएल जैसा हो, ‘कबड्डी’ देख लेनी चाहिए। प्रोमो में पहली कबड्डी खुद अमिताभ देते हैं: हुर्र कबड्डी कबड्डी कबड्डी कबड्डी!...

Author नई दिल्ली | September 6, 2015 9:43 AM

इससे पहले कि लीग कबड्डी की टीमों का हश्र आइपीएल जैसा हो, ‘कबड्डी’ देख लेनी चाहिए। प्रोमो में पहली कबड्डी खुद अमिताभ देते हैं: हुर्र कबड्डी कबड्डी कबड्डी कबड्डी!

कबड्डी का सीजन है। लगभग हर रात आती है फिल्मी चैनल स्टार गोल्ड पर! क्रिकेट के बाद यह दूसरा खेल है, जो लीग स्तर पर खेला जाने लगा है।

एक शाम एनडीटीवी में निधि राजदान ‘बक स्टाप्स हियर’ छाप चर्चा में नौकरशाहों के ताजा तुरंता तबादलों पर बहस छेड़ कर बैठ गर्इं कि बताइए इस तरह तबादलों का क्या मतलब है? पांच महीने में तीन-तीन गृहसचिव बदले गए! कांग्रेस के टाम वडक्कन साहब बरसने लगे कि देखा, ये क्या हो रहा है? भाजपा के जीवीएल राव साहब ने फरमाया कि इस सरकार को जनादेश मिला हुआ है, वह विकास के एजेंडे से प्रतिबद्ध है। यूपीए के दिनों में नेता और नौकरशाही की मिलीभगत थी। यह सरकार मेरिट देख कर नियुक्त करती है! दो दिन मेरिट दिखी। तीसरे दिन गायब हो गई, तो सरकार का क्या कसूर? उसे जनादेश मिला हुआ है न! सवाल कुछ हो, कई भाजपा प्रवक्ता अपनी सरकार को मिले जनादेश को ही अमोघ तर्क की तरह चलाने लगते हंै! सवाल कुछ और, जवाब में ‘जनादेश’! आपको शासन का जनादेश मिला है, यह सब जानते हैं। लेकिन सवाल तो तबादलों पर है। तबादले का कारण बताइए या न बताइए, जनादेश की तोप हर बार तो मत चलाइए सरजी!

एनडीटीवी कलबुर्गी की हत्या को लेकर बहस में था। मोहनदास पई हत्या से बेहद नाराज थे। पूछते थे कि ये क्या हो रहा है? यह जनतंत्र की हत्या है। लाइन लिखी आ रही थी कि बजरंग दल के आदमी ने धमकी ट्वीट की थी। भाजपा के राव ने सबसे पहले हत्या को कंडम किया और ‘अपराधियों को पकड़ा जाय’ कहा। बहस का दम निकलने लगा। दूसरों को शायद इस मुद्रा की उम्मीद नहीं थी। संघ के एक विचारकजी यानी राकेश सिन्हाजी ने फरमाया कि भारतीय संस्कृति ‘नेति नेति’ वाली जनतांत्रिक है। हत्यारे को संघ का क्यों मानते हंै आप? स्वामी दयानंद ने मूर्तिपूजा का विरोध किया था, कांग्रेस ने बनारस में इसका विरोध किया था। हत्या की जांच करें, सजा दें! इस तरह बहस का प्रतिपक्ष ही खत्म कर दिया गया!

उपराष्ट्रपति महोदय ने ‘सबका साथ सबका विकास’ के संदर्भ में मुसलमानों के विकास की बात कह दी, तो चैनल उत्तेजित नजर आए। इंडिया टुडे से लेकर एनडीटीवी पर बहसें रहीं। पूछती रहीं कि उपराष्ट्रपति को विवादास्पद होने से परहेज करना चाहिए था।

लेकिन अपने अर्णव भैया ने शीना हत्याकांड का पीछा नहीं छोड़ा और इन दिनों मुंबई पुलिस से बेहद खफा दिखे। उनके बुलाए कई बड़े वकील और कई रिटायर्ड पुलिस अफसर समझाते रहे कि भैया, मुंबई पुलिस को अपना काम करने दीजिए।

लेकिन अर्णव अर्णव नहीं, वे स्वयं राष्ट्र हंै, हत्याकांड के ‘समांतर जांच आयोग’ हैं, पुलिस को नसीहत न दें तो कैसे काम चले! उनकी शिकायत रही कि पुलिस सही तरह से पूछताछ नहीं कर रही है। बहस करने वालों में से ज्यादातर का मत था कि मीडिया ने कहानी को जरूरत से ज्यादा तूल दे दिया है, उसे किसी की प्राइवेसी की परवाह नहीं है! इस बीच मुंबई पुलिस के पूर्व अधिकारी एमएन सिंह ने क्रोध में कह डाला कि हत्या के इस केस में मीडिया के कुछ बॉस भी शामिल हैं और आप यानी अर्णव इससे अपने को अलग न समझें! फिर क्या था, अर्णव अपनी फार्म में आए और अपनी मीडिया थियरी ही दे डाली कि हम नामी और ताकतवर लोगों की ऐसी कहानियों का पीछा इसी कारण नहीं छोड़ते कि ऐसे लोग मीडिया को प्रभावित करने की ताकत रखते हैं, आरुषि और तेजपाल केस इसके प्रमाण हंै! और हम एक्सपोज करते रहेंगे!
हाय! बलि बलि जाऊं इस बहादुरी पर!

लीजिए सबसे पहले सबके पास पहुंचने वाला, सबसे पहले खबर की खोपड़ी ब्रेक करने वाला टाइम्स नाउ इंद्राणी के पहले पति/ लिव इन पार्टनर सिद्धार्थ दास से बात करने लगा। पहले रिपोर्टर ने बात की, फिर अर्णव ने की और बंदा भी किसी जासूसी कथा का नकाबपोश गवाह बन कर आया! रूमाल से नाक तक चेहरा ढंका हुआ, सिर पर लाल रंग की गोल्फ कैप। बार-बार हाथ से रूमाल को नाक तक चढ़ाता हुआ। रोशनी इतनी कम कि आंखें तक साफ न दिखें। तेईस मिनट तक के वीडियो को बार-बार दिखाया गया। सिद्ध हुआ- जहां न पहुंचे ‘क्राइम्स’ वहां पहुंचे टाइम्स नाउ! और फिर ‘स्पेशल अपीअरेंस’ की तरह प्रकट हुआ यह पूर्व पति माइक निकाल कर बाहर निकल गया। टीवी पर थोबड़ा दिखाने की होंस में बावला भूल ही गया कि अब खैर नहीं। पुलिस टीम आई ही आई और लीजिए आ गई! और छिपा ले बेटा चेहरा!

इस बार एमटीवी रोडीज तो चर्चा से बाहर रहे, लेकिन रोड पॉलिटिक्स यानी सड़क राजनीति बीच बहस में आ गई। सबसे पहले एबीपी ने बड़ी बहस कराई। उसके बाद अंगरेजी चैनलों में आई। सड़क राजनीति पर इंडिया टुडे और एनडीटीवी अपेक्षाकृत अधिक संवेदनशील दिखे। वे चकित से थे कि औरंगजेब रोड को एपीजे अब्दुल कलाम रोड किया जा रहा है!

लेकिन बहस अपने पहले चक्र में ही दम तोड़ गई: जैसे ही भाजपा समर्थक पत्रकार स्वप्न दासगुप्ता ने कहा कि अगर सड़क का नाम बदलना राजनीति है तो फिर है, वैसे ही बहस खत्म हो गई। भाजपा प्रवक्ता संबित महापात्र ने इस बहस में ‘बुरे मुसलमान बरक्स अच्छे मुसलमान’ का तर्क पेश किया और बताया कि औरंगजेब बहुत बुरा मुसलमान था, क्रूर था, लाखों की हत्या की थी और अपने सगे भाई का हत्यारा था। ऐसे बुरे मुसलमान का नाम लेने की जगह कलाम जैसे अच्छे मुसलमान का नाम लेना बेहतर है! पूर्व राष्ट्रपति कहलाने की जगह कलाम साहब ‘अच्छे मुसलमान’ मात्र हो गए!

बिहार में स्वाभिमान रैली। लख्खी भीड़। भीड़ को नीतीश उतना नहीं तिकतिका पाए, जितना लालू! भीड़ से ताली पिटवाने में लालू का अब भी जवाब नहीं। मोदी की परिवर्तन रैली में उतनी तालियां नहीं दिखीं, जितनी लालू ने पटना में पड़वार्इं!

(अजदक)

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