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संस्कृति : परिधान और पहरा

सवाईसिंह शेखावत इधर स्त्रियों के साथ कुछ भी गलत घटने पर उनके कपड़े-लत्तों को इसके लिए जिम्मेदार ठहराने और दूसरी ओर ऐसा मानने वालों को घोर दकियानूसी और बर्बर करार देने की रिवायत-सी चल पड़ी है। मानो परिधान आज घोषित-अघोषित रूप से हमारी आचार संहिता में शुमार कर लिया गया है। खासकर स्त्रियों को लेकर, […]
Author November 30, 2014 12:25 pm

सवाईसिंह शेखावत

इधर स्त्रियों के साथ कुछ भी गलत घटने पर उनके कपड़े-लत्तों को इसके लिए जिम्मेदार ठहराने और दूसरी ओर ऐसा मानने वालों को घोर दकियानूसी और बर्बर करार देने की रिवायत-सी चल पड़ी है। मानो परिधान आज घोषित-अघोषित रूप से हमारी आचार संहिता में शुमार कर लिया गया है। खासकर स्त्रियों को लेकर, पुरुष हमेशा ही कुछ विशेष रियायतों के हकदार रहे हैं। जहां तक वस्त्रों के चयन की बात है, उसका सीधा संबंध माहौल, मौका, निजी पसंद और सुविधा-असुविधा से जुड़ा है। किसी सामाजिक ‘कोड आॅफ कंडक्ट’ से उसका दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन हम हैं कि ऐसा न मानने पर आमादा हैं। स्त्रियों की परदेदारी को लेकर भी दुनिया में कभी कोई सर्वमान्य सिद्धांत नहीं रहा। इस्लाम में परदेदारी की तमाम रिवायतों के बावजूद 1920 के दशक में ईरान के शाह रजा पहलवी ने बाकायदा फरमान जारी कर स्त्रियों के परदे उतार फेंके थे, जिन्हें बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में अयातुल्ला खुमैनी ने फिर पहना दिया।

परंपरा और पहनावे का सवाल उतना पेचीदा कभी रहा भी नहीं, जितना अतिरेकी छोरों पर खड़े-अड़े पक्षकारों ने आज बना दिया है। इसका सबसे खराब और दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष यह है कि कोई किसी की बात सुनने-मानने को तैयार नहीं। हर पक्ष केवल खुद को सही मानने पर अड़ा है, जबकि सच कभी अड़ा-अड़ी का बायस नहीं होता। सच हमेशा समावेशी रहा है। जैसा कि नैयायिकों ने ‘दीपक देहरी न्याय’ में कहा है कि देहरी पर रखा दीपक घर और बाहर दोनों को प्रकाशित करता है। उसी तरह जीवन के तमाम दावों की सच्चाई भी दोतरफा पर्यवेक्षण के जरिए ही बेहतर ढंग से समझी जा सकती है।
अगर जीवन का कोई क्रम आज और अब के अनुकूल नहीं रह गया है, तो उसमें परिस्थितिगत बदलाव होना ही चाहिए। इससे परंपरा के अंधभक्तों को तकलीफ भले हो, लेकिन शेष समाज को कोई फर्क नहीं पड़ेगा। पोशाक हो या फिर कोई अन्य मुद्दा, सवाल सीधा और साफ है कि आज की पीढ़ी आधुनिकता के नाम पर जिस तरह की और जितनी छूट लेना चाहती है, उसे देखते हुए क्या पिछली पीढ़ी के तमाम जीवनानुभवों को हमें हमेशा के लिए तिलांजलि दे देनी चाहिए?

बेहतर यही होगा कि मूल सवाल पर आने से पहले कुछ उन बातों पर गौर कर लिया जाए, जो बेसिर-पैर यों ही हांक दी जाती हैं- जिनका जीवन की सच्चाई से कोई वास्ता नहीं होता। जो लोग लिबास को ही छेड़छाड़ या महिला अतिचार के लिए जिम्मेवार मानने पर आमादा हैं वे कुछ महीनों या फिर कुछ वर्षों की अबोध बच्चियों के साथ घट रही ऐसी घटनाओं को लेकर क्या कहेंगे? इन दिनों बूढ़ी, बीमार और अशक्त महिलाओं के साथ जो दर्दनाक वाकए दरपेश आ रहे हैं, उसके लिए किसे दोष देंगे?

दरअसल, ये तमाम हादसे कुत्सित यौन मानसिकता के परिणाम हैं- जिनमें शराब का साथ कोढ़ में खाज का काम करता है। बलात्कार के लगभग सभी मामलों में पाया गया है कि अभियुक्त नशे में थे। सारी कुत्सित यौन मानसिकता के बावजूद अगर वे नशे की हालत में नहीं होते तो शायद वे हादसे नहीं होते। इस विकट सच्चाई के बावजूद इसे लेकर देश में कोई गंभीर विमर्श नहीं हो रहा। शराबखोरी मुल्क में लगातार बढ़ रही है। उसकी जद में अब महिलाएं और बच्चे भी आ गए हैं। लेकिन सरकार पूरी तरह सोई हुई है, क्योंकि शराब उसके राजस्व का मुख्य जरिया है। उधर सामाजिक संगठन भी इस दिशा में विशेष सक्रिय नहीं हैं।

इधर टीवी हो या प्रिंट मीडिया, सभी में उत्तेजक यौन विज्ञापनों की बाढ़-सी आ गई है। गली, चौराहे, खंभे, दीवार इन इश्तहारों से पटे पड़े हैं। कुत्सित यौन विकृतियों को बढ़ावा देने वाले इस संजाल से, जाहिर है कि, प्रतिक्रियाएं और प्रत्याक्रमण बढ़ेंगे ही। चौतरफा वाबस्ता इस माहौल से आदमी का मनोस्वास्थ्य गड़बड़ाएगा ही। हमें यह भी याद रखना चाहिए कि मात्र किसी परिधान से आदमी की विकृत मानसिकता को ढांपा नहीं जा सकता। उपनिषद बताते हैं कि यौन उत्सुकता हो या फिर कोई अन्य संवेग, वह सृष्टि की संरचना में बद्धमूल है। उसके लिए किसी प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं है। अलबत्ता, शिक्षा के जरिए कामवृत्ति और अन्य संवेगों का शमन-परिशोधन किया ही जाना चाहिए, क्योंकि इनका अतिरेक हमेशा घातक रहा है।
जीवन में यथार्थ और आदर्श के बेहतर तालमेल के लिए हम भारतीय जन प्राय: कुछ नैतिक सूत्रों का पालन करते आए हैं, जिनसे व्यक्ति और समाज दोनों के हित बेहतर सधे हैं। एक उदाहरण के जरिए इसे समझना उपयुक्त होगा। वैदिक काल में पति के छोटे भाई को द्विवर (दूसरा पति) यानी देवर कहा जाता था। उस वय में देवर और भाभी के बीच इस तरह का रिश्ता बन जाना स्वाभाविक है। लेकिन इस यथार्थ के बावजूद जीवन के गहन अनुभवों ने हमें सिखाया कि इस तरह के सेक्स संबंध कालांतर में दांपत्य और परिवारों को तोड़ने वाले सिद्ध होते हैं।

ऐसे में हमने कुछ नैतिक मर्यादाएं कायम कीं, जिनके चलते भारत में देवर-भाभी के ऐेसे अनूठे चरित हुए, जिनकी मिसाल दुनिया में दुर्लभ है। सीता और लक्ष्मण जैसे देवर-भाभी विश्व में कहां मिलेंगे! सीता हरण के बाद राह में पड़े मिले सीता के आभूषणों को लक्ष्मण यह कह कर पहचानने से इनकार कर देते हैं कि उनकी निगाह कभी सीता के चरणों से ऊपर उठी ही नहीं। इस तरह वे भारतीय समाज के आदर्श मानक बने। सातवाहन कालीन महाकवि हाल की ‘गाथा सतसई’ में उल्लेख है कि मनचले देवरों को प्रशिक्षित करने के लिए भाभियां घर की दीवार पर लक्ष्मण का चित्र बना दिया करती थीं। यह बात तुलसी से बहुत पहले की है।

यथार्थ और आदर्श के इसी संतुलन को हमें वस्त्र-विन्यास में भी साधना होगा। यह मानना कि परिधान का जीवन व्यवहार पर कोई असर नहीं होता, एक तरह की बदगुमानी है, जिसका कोई इलाज नहीं। हर अच्छी-बुरी चीज की तरह इसका भी तदनुकूल असर होगा ही। मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि शिष्ट-शालीन पोशाक जहां पहनने वाले के प्रति मन में सम्मान जगाती है, वहीं भड़काऊ लिबास हमारे भीतर की अनुचित वृत्तियों को उकसाता है। अब हमें आदमी को आदमी की तरह ही देखना चाहिए न कि देवदूत की तरह, जो हर हाल में स्थितप्रज्ञ बना रहता है। चित्त वृत्तियों के परिशोधन के लिए पुरखों ने जो अनुभवसिद्ध सूत्र खोजे-पाए थे उन्हें जीवन यथार्थ के नाम पर तिलांजलि देना अक्लमंदी नहीं होगी।

शोधवेत्ता बताते हैं कि जेलों में ऊंची दीवारें, कंटीली बाड़, विद्युत प्रवाह, सायरन, चौबीस घंटे की सख्त पहरेदारी जैसी व्यवस्थाएं अधिकतम पांच प्रतिशत कैदियों के लिए जरूरी है। बाकी के लिए सामान्य सुरक्षा से भी काम चल सकता है। लिबास के मामलों में भी पंचानबे प्रतिशत लोगों को कोई समस्या नहीं है। पर बचे हुए पांच प्रतिशत के लिए यह नहीं कहा जा सकता। इनके मन-मस्तिष्क में हमेशा कुछ न कुछ गड़बड़ चलता रहता है। भड़काऊ लिबास का इन पर कितना मारक असर होगा, सोचा जा सकता है और सोचा जाना भी चाहिए, क्योंकि सारे फसाद की जड़ यही लोग हैं। हमारी तमाम सामाजिक सुरक्षाएं इन्हीं लोगों को ध्यान में रख कर तय की गई हैं।

पर इसका यह आशय कतई नहीं है कि सारे स्त्री-पुरुषों को वस्त्रों से लाद देना चाहिए, ताकि ऐसा कोई अंदेशा रहे ही नहीं। परदों के अपने अलग आक्रामक असर हैं। घूंघट में हर स्त्री विश्वसुंदरी जान ही पड़ती है! परिधान को लेकर बस इतना कहना है कि शिष्टता और शालीनता का निर्वाह इस क्षेत्र में भी सभी के लिए हितकर होगा!

 

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