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सिनेमा : हिंदी सिनेमा का बदलता मिजाज

आज के हिंदी सिनेमा ने तमाम तरह की रूढ़ियों को तोड़ा है। इसने अपने समय की नब्ज को पहचाना और नया दर्शक वर्ग तैयार किया है। इसने विषय, भाषा, पात्र, प्रस्तुति सभी स्तरों पर अपने..

Author नई दिल्ली | August 30, 2015 11:54 AM

आज के हिंदी सिनेमा ने तमाम तरह की रूढ़ियों को तोड़ा है। इसने अपने समय की नब्ज को पहचाना और नया दर्शक वर्ग तैयार किया है। इसने विषय, भाषा, पात्र, प्रस्तुति सभी स्तरों पर अपने को बदला है। भारतीय दर्शक ने भी सिनेमा के इस परिवर्तित और अपेक्षाकृत समृद्ध रूप को स्वीकार किया है। इधर कुछ ऐसी फिल्में भी बन रही हैं, जिन्होंने सिनेमा और समाज के बने-बनाए ढांचों को तोड़ा है।

‘हंसी तो फंसी’, ‘हाईवे’ और ‘क्वीन’ जैसी फिल्मों ने बिल्कुल नए तरह के सिनेमाई-सौंदर्यशास्त्र का विकास किया है। ‘हाईवे’ की वीरा एक उच्चवर्गीय और रसूखदार परिवार की लड़की है। बचपन से ही वह अपने पिता के बड़े भाई से शारीरिक शोषण का शिकार होती आई है। जब वह इसके बारे में अपनी मां को बताती है, तो उसकी मां उसे चुप रहने और इस बाबत किसी से न कहने की सलाह देती है। यही वह तथाकथित सभ्य वर्ग है, जहां बात-बात पर लड़कियों को तहजीब और सलीके की दुहाई दी जाती और दीवारों के पीछे स्त्री को सजी-संवरी वस्तु की तरह इस्तेमाल किया जाता है। वीरा की मां का उसे चुप रहने की सलाह सिर्फ वीरा को नहीं, पूरे स्त्री समूह को दोषी बनाती है।

फिल्म का एक महत्त्वपूर्ण पात्र है महावीर भाटी। वह वीरा का अपहरणकर्ता है। फिल्म में फ्लैश बैक के माध्यम से महावीर की मां से परिचय होता है, जो एक ग्रामीण, निम्नवर्गीय पात्र है। पति से पिटना और गाली सुनना जैसे उसकी नियति है। वीरा और महावीर की मां की नियति लगभग एक जैसी है और इस तरह दोनों के जीवन की कड़ियां एक ही बिंदु पर जाकर मिलती हैं।

अंतर सिर्फ दोनों के सामाजिक स्तर में है, शोषण के तरीकों, शोषण के हथियारों और शोषण करने वालों में कोई अंतर नहीं। फिल्म में महावीर का एक संवाद इस शोषण के एक नए पहलू की ओर भी इशारा करता है- ‘गरीबन की लुगाई की कहां इज्जत’! इसी अन्याय का बदला लेने के लिए महावीर वीरा को कोठे पर बेचने की बात सोचता है। यहां फिल्म जेंडर के सवाल से आगे निकल कर वर्गीय टकराव की तरफ ले जाती है।

‘हंसी तो फंसी’ की मीता एक बिल्कुल नए तरह का चरित्र है। एक तरफ तो वह लापरवाह, साहसी और मनमौजी है, पर दूसरी तरफ उसमें कुछ कर गुजरने की चाहत भी है। वह इंजीनियरिंग की पढ़ाई और शोध के लिए विदेश जाना चाहती है, पर अपने बड़े भाई के दबाव में आकर उसके पिता उसे आगे पढ़ने के लिए पैसे देने को तैयार नहीं होते। मीता के चाचा को लड़की की पढ़ाई पर पैसे खर्च करना नागवार गुजरता है। उन्हें चिंता रहती है कि मीता से शादी कौन करेगा? उन्हें मीता के लड़कों जैसे कपड़ों और छोटे बालों से हमेशा चिढ़ होती है। चाचा मीता के पिता से कहते हैं: ‘यह तुम्हारे घर में दामाद नहीं, बहू लाएगी’। यह पुरुषवादी जुमला अक्सर भारतीय मध्यवर्गीय घरों में उछाला जाता है।

मगर फिल्म के अंत में मीता के पिता का उसके साथ खड़ा होना और यह कहना कि ‘यह सब इसी का तो है’ एक बदले हुए नजरिए और समाज में लड़की के पिता की मजबूत होती स्थिति को दर्शाता है। इसी तरह मीता के प्रेमी का मीता को उसके ‘तथाकथित मर्दाना मनमौजीपने’ के साथ सहज रूप में उसे प्रेम करना और उसके अनुरूप खुद को ढालना- एक बदले हुए पुरुष के साथ-साथ एक बदली हुई मानसिक अवस्था का भी द्योतक है।

‘क्वीन’ स्त्री स्वातंत्र्य और स्त्री अस्मिता से जुड़े पहलुओं को आधारभूत और जरूरी स्तर पर समझने की कोशिश करती है। एक आम लड़की के कमजोर होने, बिखरने और फिर संभलने की कहानी है। रानी नामक पात्र के माध्यम से फिल्मकार ने स्त्री की जिजीविषा और संघर्ष का बेहतरीन चित्रण किया है। जिस समाज में बचपन से स्त्री को घोड़े पर चढ़ कर आने वाले राजकुमार के सपने दिखाए जाते रहे हों, उसमें अपने मंगेतर द्वारा ठुकरा दिए जाने पर उसकी क्या स्थिति होती होगी, समझा जा सकता है। रानी इसके लिए खुद को गुनहगार समझती है, आस-पड़ोस के लोग और रिश्तेदार उस पर दया दिखाने से नहीं चूकते।

थोड़ा संभलने के बाद वह अकेले यूरोप घूमने जाने का फैसला करती है। वही रानी, जिसे पड़ोस की दुकान भी जाना होता तो उससे सात-आठ बरस छोटे भाई को उसके पीछे लगा दिया जाता था, यूरोप अकेले जाती है। रानी की यह यात्रा सिर्फ उसकी नहीं, हर उस स्त्री के अस्तित्व और मानवीय गरिमा की यात्रा है, जिसे पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने सदियों से ‘चिर शिशु’ बना कर रखा है। क्वीन इसी चंगुल से आजाद होने की कहानी है।

ये फिल्में न सिर्फ जेंडर के सवालों से टकराती, बल्कि पूरी सामाजिक व्यवस्था से जूझती हैं। इन फिल्मों ने स्त्री नायकत्व को रचा है। सुखद यह है कि भारतीय दर्शकों ने इस सिनेमा को दिल खोल कर सराहा है। इन्होंने व्यवसाय भी खूब किया। इन फिल्मों ने मानो समांतर सिनेमा की अवधारणा को ही समाप्त कर दिया। कला सिनेमा और मुख्यधारा सिनेमा के अंतर को मिटा दिया है। कला फिल्में कही जाने वाली उन फिल्मों का दौर बीत गया लगता है, जिनका दर्शक एक खास किस्म का अभिजात वर्ग हुआ करता था। आज का सिनेमा अगर मुख्यधारा या व्यावसायिक सिनेमा है तो साथ ही वह अपने भीतर कला फिल्मों की सादगी और सौंदर्य को भी समेटे है।

स्त्री पात्रों को नायक के रूप में प्रस्तुत करने वाली इन फिल्मों की स्त्रियां अपने शर्म और संकोच की कैद से निकल जाती हैं। ये तथाकथित सभ्रांत समाज से बेपरवाह होकर ठहाके लगाती, चीखती, जोर-जोर से गाती और तब तक नाचती हैं, जब तक कि उनका मन नहीं भर जाता।

नए हिंदी सिनेमा में औरत की शख्सियत की वापसी हुई है। औरत की इस वापसी, उसके जुझारूपन को दर्शकों ने हाथोंहाथ लिया है। दर्शक अब अस्सी-नब्बे के दशक की शिफॉन साड़ियों की फंतासी से बाहर निकल कर यथार्थ की खरोंचों को महसूस करना चाहता है। वह आईने में अपने को देखना और खुद को जानना चाहता है।

इन फिल्मों ने जेंडर की बहसों को नया मोड़ दिया है। यहां पुरुष स्त्री का शत्रु या उसका प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि उसका साथी है। वह अपने पुरुष अहंकार और वर्चस्ववाद से मुक्त होकर, स्त्री के मर्म और उसके अधिकारों को समझते हुए नए तरीके से अपना विकास कर रहा है। स्त्री छवियों के साथ-साथ पुरुषों की सामंती छवियां भी खंडित हुई हैं और अब ये पूरी तरह स्वीकार्य हैं।

आज सिनेमा ने मनोरंजन के अर्थ और पैमाने बदले हैं। सिनेमा ने समझ लिया है कि बदला हुआ यह दर्शक केवल लटकों-झटकों से तुष्ट नहीं होने वाला, उसे कुछ ठोस देना होगा। यही कुछ वजहें हैं कि करण जौहर सरीखे सिनेमा के असली व्यवसायी फिल्मकार को भी अपने रूमानी किले से बाहर निकलना और ‘माइ नेम इज खान’ और ‘बॉम्बे टाकिज’ जैसी स्तरीय फिल्में बनाने को मजबूर होना पड़ा।

अब हिंदी सिनेमा ने दर्शकों की बेचैनी को समझा है, उसे आवाज दी है। अनुराग कश्यप, दिवाकर बनर्जी, इम्तियाज अली जैसे युवा निर्देशकों और जोया अख्तर, रीमा कागती, किरण राव जैसी सशक्त महिला फिल्मकारों ने हिंदी सिनेमा को तीखे तेवर दिए हैं। उसके रंग-ढंग बदले हैं। इनकी स्त्रियां जीने के नए रास्ते और उड़ने को नया आसमान ढूंढ़ रही हैं। दर्शक भी रोते-बिसूरते, हर वक्त अपने दुखड़े सुनाते चरित्रों पर कुछ खास मुग्ध नहीं हो रहा। उसे भी पात्रों के सशक्त व्यक्तित्व की खोज है।

(शिप्रा किरण)

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