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पुस्तकायन : रवींद्र प्रणति की सुखद परिणति

रणजीत साहा रवींद्रनाथ ठाकुर की डेढ़ सौवीं जयंती के अवसर पर इंद्रनाथ चौधुरी के प्रधान संपादकत्व में रवींद्रनाथ टैगोर रचनावली नाम से उनकी रचनाओं के पचास खंड आकर्षक साज-सज्जा के साथ प्रकाशित हुए हैं। इस रचनावली में रवींद्रनाथ की रचनाएं प्रमुख साहित्यिक विधाओं- कविता, नाटक, उपन्यास, कहानी, निबंध, यात्रा-साहित्य, आत्मकथा और बाल-साहित्य के अंतर्गत प्रकाशित […]

Author May 31, 2015 3:49 PM

रणजीत साहा

रवींद्रनाथ ठाकुर की डेढ़ सौवीं जयंती के अवसर पर इंद्रनाथ चौधुरी के प्रधान संपादकत्व में रवींद्रनाथ टैगोर रचनावली नाम से उनकी रचनाओं के पचास खंड आकर्षक साज-सज्जा के साथ प्रकाशित हुए हैं। इस रचनावली में रवींद्रनाथ की रचनाएं प्रमुख साहित्यिक विधाओं- कविता, नाटक, उपन्यास, कहानी, निबंध, यात्रा-साहित्य, आत्मकथा और बाल-साहित्य के अंतर्गत प्रकाशित हैं।

कविता खंड (भाग 1-3) का संयोजन रामेश्वर मिश्र ने किया है। इसमें रवींद्रनाथ की छोटी-बड़ी तीन सौ कविताएं संकलित हैं। कवि की आरंभिक काव्यकृति ‘शैशव संगीत’ से लेकर अंतिम कृति ‘शेष लेखा’ तक 1878 से 1941 तक, यानी लगभग साठ वर्ष की अनवरत कविता-यात्रा को इस खंड में कालक्रमानुसार संयोजित किया गया है, जिससे रवींद्रनाथ की काव्य-सर्जना के विकास के साथ उनके निरंतर उत्कर्ष से भी पाठक परिचित हो सकें। अपनी भूमिका में डॉ मिश्र ने रवींद्र काव्य का वर्गीकरण तीन चरणों में किया है- गीतांजलि-पूर्व युग, गीतांजलि युग और गीतांजलि-परवर्ती युग। गीतांजलि युग (1901-1914 ई.) में ‘नैवेद्य’, ‘उत्सर्ग’ ‘खेया’, ‘गीतांजलि’, ‘गीतिमाल्य’ और ‘गीतालि’ आदि का प्रणयन हुआ। दरअसल, इसी युग में जीवन के साथ अध्यात्म (अरूपानुभूति) का विशेष महत्त्व निरूपित है, जहां प्रकृति, मानव और आराध्य सत्ता का संज्ञान और संयोग सर्वाधिक लक्षित किया जा सकता है।

दरअसल, रवींद्रनाथ की काव्य कृतियों को युगों या चरणों में सुविधा के लिए विभाजित या वर्गीकृत किया जाता रहा है। लेकिन उनकी अबाध और अनवरत काव्य-यात्रा को उसकी प्रवहमानता और निरंतरता में ही देखा जाना चाहिए। ‘मानसी’, ‘चित्रा’, ‘सोनारतरी’, ‘चैताली’ आदि काव्य संकलन गीतांजलि-पूर्व काल के हैं और उनका भी कोई कम महत्त्व नहीं। इस बात पर आज भी बांग्ला के विद्वानों में असहमतिपूर्ण विवाद है कि उनकी ‘गीतांजलि’ से कहीं अधिक श्रेष्ठ कृति ‘सोनारतरी’ है।

रचनावली के खंड 4 और 5 में प्रयाग शुक्ल द्वारा रवींद्रनाथ रचित कुछ गानों और गीतों का हिंदी में पद्यानुवाद किया गया है। ये गान ‘गीत वितान’ और ‘गीत पंचशती’ से लिए गए हैं। इन्हें पढ़ते-गुनगुनाते हुए अनूदित गान के मर्म के साथ मूल का-सा आस्वाद मिलता है। हालांकि इन्हें रवींद्र संगीत के सुरों में ढाला या गाया नहीं जा सकता- स्वतंत्र राग रचना द्वारा उन्हें अवश्य गेय बना कर प्रस्तुत किया जा सकता है। नाटक विधा के अंतर्गत प्रकाशित दस खंड रवींद्रनाथ के नाट्य लेखन का समुचित प्रतिनिधित्व करते हैं। इसी तरह बारह खंडों में विन्यस्त रवींद्रनाथ के लगभग छोटे-बड़े समस्त उपन्यास बृहत्तर हिंदी पाठकों की रुचि के अनुरूप प्रकाशित किए गए हैं।

यह अधिक सुखकर बात है कि उपन्यास खंड में ‘गोरा’ (अज्ञेय)’, ‘योगायोग’ (इलाचंद्र जोशी), ‘आंख की किरकिरी’ (हंसकुमार तिवारी), ‘ठकुरानी बहू का बाजार’ (काली प्र. शुक्ल ‘सुरेंद्र’), ‘आखिरी कविता’, ‘राजर्षि और ‘एला दीदी’ (धन्यकुमार जैन), ‘नौकाडूबी’ और ‘करुणा’ (रणजीत साहा) आदि उपन्यास पढ़े जा सकते हैं।

रवींद्रनाथ की कृतियों, खासकर उपन्यास और कहानियों के कई पुराने हिंदी अनुवाद, पिछले कुछ सालों से इतने धड़ल्ले से प्रकाशित किए जा रहे हैं कि उनकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग गया है। कथा-साहित्य के अनुवादों में तो पहले से अराजकता रही है, लेकिन अब कोई भी चर्चित कृति या कृतिकार स्वत्वाधिकार से बाहर हुआ नहीं कि पेशेवर प्रकाशक उस पर गिद्ध की तरह टूट पड़ते हैं। ऐसे में सस्ता साहित्य मंडल द्वारा प्रकाशित इस रचनावली का बृहत्तर हिंदी पाठकों के लिए उपलब्ध कराया जाना, निस्संदेह सराहनीय कदम है।

निबंध, पत्र, बाल साहित्य, आत्मकथा, प्रवचन और विविध खंड के अंतर्गत प्रकाशित रचनाओं को अपनी सुविधा के अनुसार संपादन मंडल ने विभाजित कर पाठकों के लिए सुलभ कराया है। सात खंडों में प्रकाशित निबंध रवींद्रनाथ की वैचारिक भूमि को समझने के लिए अत्यंत उपादेय हैं। इन्हें विषयानुरूप विभाजित और कालक्रमानुसार प्रकाशित किया गया है। रवींद्रनाथ के लघु व्याख्यान और उद्बोधन (प्रवचन) जो 1909 से लेकर 1916 तक ब्राह्म मंदिर, शांतिनिकेतन में पठित और प्रस्तुत किए गए थे, ‘शांतिनिकेतन’ शीर्षक से ही चार खंडों में प्रकाशित हैं, जिनका अनुवाद रामशंकर द्विवेदी ने किया है। वैसे इनका अनुवाद शांतिनिकेतन में रहते हुए पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने बहुत पहले किया था, जो अलग से ‘शांतिनिकेतन’ नामक ग्रंथ (दो खंडों में) और उनकी रचनावली में संकलित हैं।

विविध के अंतर्गत प्रकाशित रवींद्रनाथ की ‘साधना’ को भी निबंध खंड में ही प्रकाशित किया जाना चाहिए था। इस प्रकाशन आयोजन की अंतिम कृति (पचासवां खंड) ‘दो बहनें’ रवींद्रनाथ का प्रसिद्ध उपन्यास है और इसे उपन्यास खंड के अंतर्गत रखा जाना चाहिए था। यह उपन्यास भी बहुत पहले शांतिनिकेतन के हिंदी अध्यापक मोहनलाल वाजपेयी द्वारा अनूदित और विश्वभारती द्वारा प्रकाशित हुआ था।

इसी प्रकार ‘चार अध्याय’ उपन्यास को ‘एला दीदी’ शीर्षक से प्रकाशित करने का औचित्य समझ में नहीं आता। इस बात का उल्लेख किया जाना चाहिए था कि यह रवींद्रनाथ के प्रसिद्ध उपन्यास ‘चार अध्याय’ का अनुवाद है। दरअसल, एला इस उपन्यास की एक प्रबुद्ध युवा नायिका है- उसे ‘दीदी’ से अभिहित या संबोधित करने के पीछे किसी अनुवादक की क्या मंशा हो सकती है, यह समझ के बाहर है। इसी तरह ‘स्त्रीर पत्र’ (स्त्री का पत्र) और ‘नष्टनीड़’ जैसी लंबी कहानियों को ‘उपन्यासिका’ विधा के अंतर्गत या फिर इन कहानियों की नायिका के नाम शीर्षक का जामा देकर प्रकाशित किया जाता रहा है- और फिल्में भी बनाई गई हैं। लेकिन किसी भी प्रकाशक के लिए मूल कृति का शीर्षक देना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है ताकि उसे विधिवत प्रलेखित किया जा सके।

रवींद्रनाथ के निधन के लगभग बहत्तर वर्ष बाद भी रवींद्रनाथ प्रणीत कई विशिष्ट कृतियां, खासकर उनके काव्य संग्रह, वैचारिक निबंध, पत्र, सामयिक टिप्पणियां और गान आज तक न तो अनूदित हुए हैं और न इस दिशा में गंभीर प्रयास किए गए हैं। विश्वभारती, रवींद्र भारती या साहित्य अकादेमी जैसी संस्थाओं या अन्य प्रकाशकों को यह दायित्व ग्रहण करना चाहिए। यहां यह तथ्य स्वीकार कर लेना चाहिए कि रवींद्र के गीतों के जो भी अनुवाद या रूपांतर प्राप्त हैं वे मूल के साथ पर्याप्त न्याय नहीं करते, लेकिन गद्य या पद्य में उनके कुछ भावानुवाद और छायानुवाद अवश्य प्राप्त हैं।

प्रस्तुत रचनावली का एक उज्ज्वल पक्ष यह है कि इसके प्रकाशकीय में प्रत्येक कृति के बारे में संक्षिप्त ढंग से उसकी विषयवस्तु बताई गई है। मूल रचनाओं के प्रकाशन वर्ष साथ ही, किन बांग्ला पत्र-पत्रिकाओं में वे पहली बार प्रकाशित हुर्इं और उनका पुस्तकाकार रूप कब प्रकाशन में आया। उसका हिंदी अनुवाद पहली बार कब और किसने किया।

लेकिन यह कार्य यहीं समाप्त नहीं हो जाना चाहिए। रवींद्रनाथ की अन्य कृतियों के हिंदी अनुवाद जहां कहीं भी उपलब्ध हैं और जिनके अनुवाद होने चाहिए, उन्हें क्रमश: प्रकाशित किया जाना चाहिए। साथ ही, उन प्राप्य-अप्राप्य अनूदित कृतियों का अभिलेख तैयार कराया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, प्रसिद्ध उपन्यासकार गोपालराम गहमरी द्वारा रवींद्रनाथ लिखित नाटिका ‘चित्रांगदा’ (1892) का 1895 में किया गया पहला हिंदी अनुवाद आज अप्राप्य है। इन पचास खंडों को भी दस खंडों में बड़ी आसानी से समायोजित कर कम लागत मूल्य पर उपलब्ध कराया जा सकता है। बाद में, उसमें आगामी खंड जोड़े जा सकते हैं।

रवींद्रनाथ टैगोर रचनावली: प्रधान संपादक: इंद्रनाथ चौधुरी, सस्ता साहित्य मंडल प्रकाशन, एन 77, कनॉट सर्कस, नई दिल्ली; 3930 रुपए (पचास खंड)।

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