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पुस्तकायन : विडंबना की परतें

पल्लव स्वयं प्रकाश ऐसे कथाकार हैं, जो कहानी में कथ्य की संप्रेषणीयता के लिए लगातार प्रयोगशील रहे। प्रगतिशील-जनवादी कथाकारों में इस लिहाज से वे विशिष्ट हैं कि यथार्थवादी आग्रहों के बावजूद कहानी की कलाधर्मी जरूरतों पर कमजोर नहीं पड़ते। स्वयं प्रकाश ने आमतौर पर सामान्य लंबाई की कहानियां लिखीं और कभी-कभी कुछ लंबी कहानियां भी, […]

Author May 31, 2015 3:48 PM

पल्लव

स्वयं प्रकाश ऐसे कथाकार हैं, जो कहानी में कथ्य की संप्रेषणीयता के लिए लगातार प्रयोगशील रहे। प्रगतिशील-जनवादी कथाकारों में इस लिहाज से वे विशिष्ट हैं कि यथार्थवादी आग्रहों के बावजूद कहानी की कलाधर्मी जरूरतों पर कमजोर नहीं पड़ते। स्वयं प्रकाश ने आमतौर पर सामान्य लंबाई की कहानियां लिखीं और कभी-कभी कुछ लंबी कहानियां भी, लेकिन इधर आया उनका नया कहानी संग्रह छोटू उस्ताद छोटी कहानियों का गुलदस्ता है। इस संग्रह में उनकी दो दर्जन से अधिक कहानियां हैं।

संग्रह की पहली कहानी ‘आल द बेस्ट’, में कथावाचक एक युवा से संवाद कर रहा है, जिसे झटपट कॅरिअर बनाना है। वाचक उसे नए जमाने के संभावित आसान करिअर की चर्चा करता है, जिनमें राजनीति, अपराध, साइबर हैकिंग, ज्योतिष और एनजीओबाजी के बाद वह अंत में धर्म और अध्यात्म तक पहुंचता है। एक और कहानी ‘सुलझा हुआ आदमी’ में स्वयं प्रकाश एकल संवाद की शैली में हैं: ‘कहता है भीतर जाकर मैंने क्या देखा? कि दुनिया के मजदूरों को एक होने का आवाहन करने वाले खुद एक नहीं हैं। संगठित नहीं हैं।… मैं कहता कि धर्म? दहेज? शिक्षा? आबादी? भाषा? तो कहते क्रांति के बाद सब ठीक हो जाएगा। आप क्या उम्मीद करते थे? आप मेरे प्रश्नों के उत्तर नहीं देंगे फिर भी मैं आपका वफादार सिपाही बना रहूंगा और आपके इशारे पर नाचता रहूंगा?’ यह कहानी ‘बहुत कहने’ वालों और कुछ भी न करने वालों पर बारीक व्यंग्य है।

सोवियत पराभव के बाद साहित्य के प्रगतिशील मोर्चे में पस्ती जरूर आई, लेकिन कुछ रचनाकारों ने भीतर और बाहर के मनुष्य-विरोधी उपक्रमों की पहचान करने का रास्ता चुना। विमर्शों को फैशन और आरक्षण- दोनों अतिवादों से देखा गया, लेकिन स्वयं प्रकाश विमर्शवाद की सीमा दर्शाते हैं। यहां वे चुहल और अपने ठेठ अंदाज में कहानी रचते हैं कि पाठक कथा के आनंद से वंचित न हो। ‘बाबूलाल तेली की नाक’ में वे अस्मिताई आग्रहों की खबर लेते हैं। लोककथा के अंदाज से कहानी चलती है।

मामूली आदमी बाबूलाल तेली किसी झगड़े में खामखा उलझ जाता है और एक शक्तिशाली आदमी उसकी नाक पर घूंसा मार देता है। जाहिर है, ‘समाज’ उसकी चिंता करता है और आखिरकार स्थिति यह आ जाती है: ‘तुम चिंता मत करो। तुम्हारी नाक अब तुम्हारी नाक नहीं, समाज की नाक है। चाहे जितना खर्च आए, समाज उसकी व्यवस्था करेगा। हम तुम्हारा अच्छे से अच्छा इलाज करवाएंगे। पर एक बात बताओ। हो तो तेली ही न? कोई और तो नहीं हो?’ यह है हमारे समय की मानव सूचकांक की प्रगति! इंतिहा देखिए: ‘कोई महीने भर बाद बाबूलाल तेली मुंबई से लौटे तो एकदम चंगे होकर, बल्कि कुछ हट्टे-कट्टे भी होकर। चलते-फिरते, खाते-पीते। बस, एक जरा-सी बात थी। सूखी-सड़ी, बासी पकौड़े जैसी, कैसी भी सही, जाते समय चेहरे पर एक नाक थी, आते समय नहीं थी। उसे काट कर फेंक देना पड़ा था। नाक की जगह सिर्फ दो सूराख रह गए थे।’

कहानी का लोककथा बन जाना किसी भी कथाकार के लिए उपलब्धि है। यहां एक कहानी ऐसा ही स्वाद देती है, जिसमें खेत और पगडंडी आपस में बात करते हैं। ‘बिछुड़ने से पहले’ शीर्षक से लिखी यह कहानी विकास की महानता का प्रत्याख्यान रचती है। खेत और पगडंडी की बातें चल रही हैं और खेत उन दिनों की कल्पना कर रहा है जब पगडंडी की जगह सड़क बन जाएगी- जमीन के भाव बढ़ जाएंगे। दुकानें निकल जाएंगी। गरम-गरम जलेबी छनेगी। पगडंडी का जवाब है- ‘जलेबी खाएगा मरजाना। हवस देखो इसकी। पता पड़ेगी जब होएगा।’ हवस शब्द काफी दिनों बाद कहानी में आया है और देखिए तो खाने के प्रसंग में। ध्यान से देखें तो यह बात मामूली नहीं है। विकास की हवस से जो निकल रहा है वह क्या है? विस्थापन। गरीबी। विनाश। कथाकार इशारे में सब कह दे रहा है।

इस नए दौर में बूढ़ों और लड़कियों की भी खबर इन कहानियों में है। एक बड़ा भ्रम ग्लोबलाइजेशन से निकली संपन्नता के साथ फैलाया गया है कि यह नया पूंजीवाद अपनी संभावनाओं को विकसित करने के अवसर देता है, क्योंकि उत्पादन में सबकी भागीदारी आवश्यक है। स्वयं प्रकाश इस भ्रम को तोड़ते हैं ‘लड़कियां क्या बातें कर रही थीं?’ और ‘अकाल मत्यु’ में। ऐसे ही कुछ और सरलीकरणों से स्वयं प्रकाश लड़ते हैं, जैसे सांप्रदायिकता। ‘हत्या-2’ में भी सांप्रदायिकता के भीतरी कलुष का चित्र आया है।

‘हत्या-1’, ‘हत्या-2’, ‘द ग्रेट इंडियन कुश्ती’, ‘अमीर नेहरू- गरीब नेहरू’, ‘सांत्वना पुरस्कार’, ‘अकाल मत्यु’, ‘गणित का भूत’, ‘आखिर चुक्कू कहां गया?’ स्वयं प्रकाश की अपनी शैली में लिखी गई वे कहानियां हैं, जिनमें बचपन के मीठे प्रसंग हैं। अभावपूर्ण जीवन के बीच रोमांच की जगह बनाती इन कहानियों में भारतीय मध्यवर्ग के हार्दिक चित्र भी हैं, जब समाज से सामूहिकता और पारस्परिकता के लिए पर्याप्त सम्मान और स्थान बचा हुआ था।

‘द ग्रेट इंडियन कुश्ती’ प्रेमचंद के बालक चरित्रों की याद दिलाने वाली है। दो बच्चे अपने से कहीं मजबूत एक-दूसरे बच्चे की छाती पर सवार हैं और मदद के लिए पुकार रहे हैं कि यह उठ गया तो हमें मारेगा। ‘सांत्वना पुरस्कार’ किशोरावस्था के आकर्षण का चित्र है तो ‘अमीर नेहरू-गरीब नेहरू’ जैसे बीते दौर की विलुप्त सामूहिकता का गीत। इन कहानियों के बीच ‘अकाल मत्यु’ को पढ़ना एक अनूठी कहानी को पढ़ना है, जो एक तरफ बचपन की हत्या का मर्सिया है तो दूसरी तरफ इम्मी के बहाने हमारी व्यवस्था पर टिप्पणी। अच्छी बात यह है कि कहानी अपनी तरफ से एक शब्द भी नहीं कहती और पाठक व्यवस्था की विफलता की सटीक व्याख्या कर लेता है।

संग्रह में परिवार और पारिवारिकता से संबंधित कुछ कहानियां हैं। जानना रोचक होगा कि नए समय में प्रगतिशील कथाकार इस संस्था को किस तरह देख रहे हैं। ‘एक खूबसूरत घर’ कहानी थोड़े पुराने दिनों की लगती है, जब मोबाइल नहीं आया था। एक दिन घर के मुखिया के दफ्तर से लौटने में अधिक देर हो जाने पर एकल परिवार की चिंताएं पाठक को दिलासा देती लगती हैं कि इस क्रूर और स्वार्थी समय में मनुष्य के पास अगर इस एक संस्था का सहारा भी है तो यह छोटा संबल नहीं। ऐसे ही नए जमाने के परिवार का चित्र ‘लाइलाज’ में आया है, जब कथावाचक परिवार के सदस्यों की अनुपस्थिति में अपने घर को देखता है और वहां फैली अव्यवस्था से कुढ़ता है। बुजुर्ग दंपति पर लिखी कहानी ‘लड़ोकन’ वैश्विक व्यवस्था के सुनहरे दौर में समाज के इस बड़े हिस्से की बात करती है।

एक संग्रह में आधी कहानियां भी ऐसी मिल जाएं, जिन्हें पढ़ कर पाठकीय संतोष का अनुभव होता हो तो यह संग्रह इस कसौटी पर कहीं आगे है। स्वयं प्रकाश इन कहानियों को बुनते हुए जिस तरह समाज-देश-काल की व्याख्या करते जाते हैं, वह एक ऐसे कथाकार का कौशल है, जो रचना और विचारधारा के संबंध को भलीभांति जानता हो। ये कहानियां अगर कोरे राजनीतिक बयान बन कर रह जाने से बची हैं तो इसका कारण है बतकही की चुहल और गपबाजी के अंदाज के साथ बीच-बीच में कथाकार ऐसे वाक्य लिख जाते हैं, जो देर तक स्मृति में बने रह सकें- ‘दिल को कौन पूछता है मितवा! विकास तो होके रहेगा।’

छोटू उस्ताद: स्वयं प्रकाश; किताबघर प्रकाशन, 4855-56/24, अंसारी रोड, दरियागंज, दिल्ली; 200 रुपए।

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