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पुस्तकायन : पौ फटने का प्रतिमान

समालोचक चौथीराम यादव की पुस्तकें- उत्तरशती के विमर्श और हाशिए का समाज, हजारीप्रसाद द्विवेदी समग्र पुनरावलोकन और लोकधर्मी साहित्य की दूसरी धारा- उनके लगभग आधी शताब्दी के अध्ययन, मनन, चिंतन और सिंहावलोकन का परिणाम हैं। हजारों साल से जो साहित्य रचा जा रहा है, उसका पचहत्तर प्रतिशत हिस्सा ‘परलोक साहित्य’ है, रामचरित मानस से लेकर […]

Author नई दिल्ली | September 6, 2015 15:40 pm

समालोचक चौथीराम यादव की पुस्तकें- उत्तरशती के विमर्श और हाशिए का समाज, हजारीप्रसाद द्विवेदी समग्र पुनरावलोकन और लोकधर्मी साहित्य की दूसरी धारा- उनके लगभग आधी शताब्दी के अध्ययन, मनन, चिंतन और सिंहावलोकन का परिणाम हैं।

हजारों साल से जो साहित्य रचा जा रहा है, उसका पचहत्तर प्रतिशत हिस्सा ‘परलोक साहित्य’ है, रामचरित मानस से लेकर हनुमान चालीसा तक। चौथीराम यादव को पढ़ कर लगा कि उन धर्मग्रंथों की अधार्मिकता पर प्रश्न क्यों नहीं उठाया जाना चाहिए, जो मनुष्य की पैदाइश अलग-अलग जगहों से बताते हैं? उस ईश्वर पर प्रश्न क्यों नहीं उठाया जाना चाहिए, जो अपना नाम लेने मात्र से बड़े-बड़े पापियों को पाप मुक्त कर अपना स्वरूप और धाम प्रदान करता है? वह ईश्वर इतना पक्षपाती कैसे हो सकता है, जो एक दुर्विनीत ब्राह्मण के लात मारने पर उसके पैर पकड़ कर क्षमा याचना करता है और दूसरी ओर तपस्या करने वाले निरपराध शूद्र शंबूक का सिर काट लेता है?

यह वही हमारा धर्म है, जो अपने अनुयायियों को देवालयों में जाने से रोकता है। उन्हें किसी प्रकार की शिक्षा-दीक्षा से रोकता है। उन्हें अछूत और अस्पृश्य मानता है। आखिर ऐसे साहित्य और समाज, धर्म और कानून पर अब तक हिंदी आलोचना मौन क्यों थी? अगर आज भी हमारे देश का वर्ग चरित्र अर्द्धसामंती और अर्द्ध औपनिवेशिक है, तो मार्क्सवादी आलोचना से लेकर सुरुचिवादी आलोचना तक इस बात पर मौन क्यों थी? भक्ति आंदोलन के निर्गुण कवियों ने जो आवश्यक प्रश्न उठाए थे, तुलसी के बाद उन पर धूल क्यों डाल दी गई। आज हिंदी का दलित साहित्य जिन प्रश्नों को उठा रहा है उन पर चुप्पी क्यों है।

हिंदी आलोचना में ऐसे बहुत सारे असुविधाजनक प्रश्नों के उत्तर खोजते हुए चौथीराम यादव की पुस्तक ‘लोकधर्मी साहित्य की दूसरी धारा’ एक सार्थक संवाद स्थापित करती है। ‘अवतारवाद का समाजशास्त्र व लोक धर्म’ एक ऐसा ही बहस-तलब विमर्श है। ‘हिंदी नवजागरण और उत्तर सदी के विमर्श’, ‘दलित चिंतन की परंपरा और कबीर’, ‘भक्ति आंदोलन की पृष्ठभूमि व संत साहित्य’, ‘स्त्री विमर्श की चुनौतियां व छायावाद का मुक्ति स्वर’, ‘सांप्रदायिकता व सामाजिक उत्पीड़न’, ‘सही इतिहासबोध को रेखांकित करती दूसरी परंपरा की खोज’, ‘मध्यकालीन समाज और हिंदी साहित्य में नारी-मुक्ति-चेतना’, ‘रोती हुई संवेदनाओं की आत्मकथा’, ‘नागार्जुन की कविता में प्रतिरोध का स्वर’, ‘इक्कीसवीं सदी का गल्प और काशी का अस्सी’, ‘रेहन पर-रग्घू या इक्कीसवीं सदी का गांव-घर’, ‘प्रति-संस्कृति के हिंदी साहित्य पर एक नजर’ आदि ऐसे निबंध हैं, जिन्होंने समकालीन आलोचना में एक नई दृष्टि का उन्मेष किया है।

‘उत्तरशती के विमर्श और हाशिए का समाज’ नामक पुस्तक तो ‘पौ फटने का प्रतिमान’ गढ़ती आलोचना का घोषणा-पत्र है। चौथीराम यादव उत्पीड़ितों के ‘आलोचना शास्त्र’ का निर्माण कर रहे हैं। यह एक अलग आलोचना विमर्श है, जिसे आज तक की बहुरंगी हिंदी आलोचना ने अस्पृश्य मान लिया था।

यह मुक्तिबोध जैसे पुरखों की बात को आगे बढ़ाती हुई समीक्षा दृष्टि है, जो बहुजन हिताय बहुजन सुखाय की बात कर रही है। स्त्रियों के संदर्भ में यादव की आलोचना अपाला, गार्गी आदि ऋषिकाओं, चांपा, अंबपाली आदि थेरियों, विज्जिका, शीला भट््टारिका, शशिप्रभा, रेवा आदि संस्कृत-प्राकृत कवयित्रियों, मीरा, अंडाल से लेकर महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान तक की कलम को सलाम करती आलोचना है। यह ‘स्त्री शूदं न धीयते’ जैसे ऋषि वाक्य को जीभ चिढ़ाती, अंगूठा दिखाती आलोचना है। यह ‘व्रजसूची’ और ‘बुद्धचरित’ के रचयिता अश्वघोष और धर्मकीर्ति से हाथ मिलाती आलोचना है। यह कबीर की कसौटी पर शान चढ़ाती आलोचना है। इसीलिए मैं इसे ‘पौ फटने के प्रतिमान गढ़ती आलोचना’ कहना चाहता हूं।

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के ‘कबीर’ और नामवर सिंह की ‘दूसरी परंपरा की खोज’ को आगे बढ़ाते हुए चौथीराम यादव ने ‘हजारीप्रसाद द्विवेदी- समग्र पुनरावलोकन’ अस्मिता और अस्मिता विमर्श के जो प्रश्न उठाए हैं, उन्हें इन दोनों पुरोधा आलोचकों ने भी इस तरह नहीं उठाया था। इस पर हिंदी समाज में मुंह चिढ़ाने वाले बहुत सारे लोग मिल जाएंगे। पर उससे उस सैद्धांतिकी का कद कम नहीं होता, जो हिंदी में पहली बार गढ़ी जा रही है।

किसी भी विषय के दो पक्ष होते हैं- एक सैद्धांतिक, दूसरा व्यावहारिक। इसमें किसी एक पक्ष की अवहेलना करने से विषय के साथ न्याय नहीं हो पाता। चौथीराम यादव ने दोनों पक्षों को सम्यक दृष्टि से उठाया है। किसी भी देश और समाज के समक्ष जो मुद्दे और ज्वलंत समस्याएं सामने आती हैं, वे साहित्य के सरोकार बनते हैं। लोकतांत्रिक मूल्यों का क्षरण, स्त्रियों, दलितों, वंचितों और आदिवासियों के साथ सहस्राब्दियों का अन्याय, अनाचार, साम्यवादी समाज का सपना, भारतीय कम्युनिस्टों की भयंकर भूलें, सांप्रदायिकता का सवाल, धर्म और जाति के सवाल आज साहित्य के मुख्य सरोकार हैं।

आज दलित, प्रताड़ित, उत्पीड़ित, शोषित, मजदूर, किसान तथा समाज के निर्धन और निर्बल लोगों की बात करना, ‘आउट ऑफ फैशन हो गया’ है। जबकि गरीबी, भुखमरी, पिछड़ापन, अवैज्ञानिक धारणाएं, रूढ़ियां और अंधविश्वास समाज में बढ़ते जा रहे हैं। यही नहीं, तरह-तरह के अंधविश्वास, भाग्यवाद, पाखंड आदि को मीडिया और धार्मिक सभाओं द्वारा फैलाया जा रहा है। तरह-तरह के रक्षा कवच, तावीज और गंडे बेचे और प्रचारित किए जा रहे हैं।

पर इनके खिलाफ बुद्धिजीवियों का लिखना और बोलना लगभग बंद हो गया है। ऐसे में हिंदी साहित्य और समाज में चौथीराम यादव का आलोचना ग्रंथ ‘उत्तरशती के विमर्श और हाशिए का समाज’ का आना हिंदी समाज में आ रही जागरूकता का संकेत है। इसके लिए यादव ने कम श्रम नहीं किया है। फिर भी वर्चस्ववादी आलोचना के नक्कारखाने में प्रतिरोध और सामाजिक न्याय की आलोचना के इस प्रयास को तूती की आवाज सिद्ध करने और उपहास उड़ाने वाले मिल ही जाएंगे।

(दिनेश कुशवाह)

उत्तरशती के विमर्श और हाशिए का समाज, लोकधर्मी साहित्य की दूसरी धारा, हजारीप्रसाद द्विवेदी: समग्र पुनरावलोकन: चौथीराम यादव; क्रमश: अनामिका पब्लिशर्स ऐंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, 4697/3, 21-ए, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली; 400 रुपए और 550 रुपए और लोकभारती प्रकाशन, दरबारी बिल्डिंग, महात्मा गांधी मार्ग, इलाहाबाद; 400 रुपए।

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वे तुमसे पूछेंगे डर का रंग

अपने पहले कविता संग्रह ‘कहते हैं तब शहंशाह सो रहे थे’ से एक उल्लेखनीय ख्याति प्राप्त कर चुके उमा शंकर चौधरी का यह नया कविता संग्रह है। जैसा कि संग्रह के शीर्षक ‘वे तुमसे पूछेंगे डर का रंग’ से भी स्पष्ट है कि उमा शंकर चौधरी की कविताओं की सबसे बड़ी विशेषता है उनका राजनीतिक तेवर। अब इधर जबकि कविताओं में वायवीयता और कोरी भावुकता बढ़ती जा रही है तब इन कविताओं में अपने समय को लेकर गजब की सजगता, चिंता और उससे बढ़ कर बेचैनी है।

उमा शंकर अपने समय और अपने समय की चुनौतियों को बखूबी समझते हैं, लेकिन उनकी कविताओं में सिर्फ इन चुनौतियों को समझ कर उस पर अपना रोष भर प्रकट कर देना नहीं है। वे अपनी कविताओं से बड़ा परिवर्तन चाहते हैं। यही कारण है कि वे कविताओं से अपने समय की सत्ता में हस्तक्षेप करते हैं। यही हस्तक्षेप वह कारण है कि यहां राजनीति की हर वह गिरह खुलती है, जो बंद कमरे में आम आदमी को हाशिये पर रखने का षड्यंत्र रचती है। ‘प्रधानमंत्री पर अविश्वास’, ‘प्रधानमंत्री लेते हैं निर्णय और हम डर जाते हैं’ जैसी कविताएं भी कवि तभी लिख सकता है जब यह उसके भीतर की बेचैनी हो।

लेकिन उमा शंकर की कविताओं का एक दूसरा मिजाज भी है, जहां वे इस भूमंडलीकृत होते समाज का सांस्कृतिक स्तर पर कितना ह्रास होता जा रहा है उसकी चिंता करता है। यहां वे संबंधों के बीच कम हो रही ऊष्मा पर लिखते हैं, या फिर वे स्त्रियों, बच्चियों की उन यंत्रणाओं पर लिखते हैं, जो एक स्त्री को स्त्री बने रहने के लिए मजबूर करती है। इन कविताओं की बड़ी खासियत यह है कि इनमें गजब की संप्रेषणीयता है।

वे तुमसे पूछेंगे डर का रंग: उमा शंकर चौधरी; आधार प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, एससीएफ, 267, सेक्टर-16, पंचकूला; 200 रुपए।

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बॉलीवुड सेल्फी

बॉलीवुड सेल्फी हिंदी की एक ऐसी किताब है, जिसमें फिल्मी सितारों से जुड़ी प्रामाणिक कहानियां हैं। इस किताब में लेखक ने सितारों से जुड़े प्रसंगों को इस तरह से पाठकों के सामने पेश किया है कि पूरा दौर जीवंत हो उठता है। इसमें ग्यारह फिल्मी हस्तियों को केंद्र्र में रख कर उनकी जिंदगी का विश्लेषण और अनछुए पहलुओं को उजागर किया गया है। इस किताब के नाम से ही साफ है कि इसमें सितारों के जीवनानुभव के आधार पर लेखक उनके व्यक्तित्व का विश्लेषण करते हैं। इस तरह से यह हिंदी में अपनी तरह की अकेली किताब है।

अपनी एक टिप्पणी में नामवर सिंह ने कहा है कि मैं अनंत विजय के लिखने की शैली की दाद दूंगा। इतनी अच्छी और पारदर्शी भाषा है और पारदर्शी होते हुए भी थोड़े से शब्दों में हर लेख अपने आप में इस तरह बांधे रखता है कि आप आलोचना को कहानी की तरह से पढ़ते चले जाएं। इतनी रोचक, पठनीय और गठी हुई भाषा से मैंने पहली बार अनंत विजय की प्रतिभा को जाना।

फिल्मी सितारों से जुड़े अनछुए-अनजाने पहलुओं को अनंत विजय इस किताब में साकार करते हैं। इसमें रोचकता अंत तक बनी रहती है। फिल्मों की समीक्षा तो बहुत लिखी जाती है, लेकिन फिल्मों से जुड़े रोचक प्रसंग पुस्तकाकार उपलब्ध नहीं हैं। इस किताब में ऐसी तमाम कमियों को पूरा करने का प्रयत्न किया गया है।

बॉलीवुड सेल्फी: अनंत विजय; वाणी प्रकाशन, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 150 रुपए।

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साक्ष्य

शशिभूषण द्विवेदी इक्कीसवीं सदी की उस भावी प्रतिभा का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनके पास कहने को बहुत कुछ है। इसीलिए इन कविताओं की भूमि आज के कई कवियों से अलग किस्म की है और उनके यहां कविता दर्शन, इतिहास, मिथक, साहित्य और राजनीति की कई गुत्थियों के साथ गुत्थमगुत्था होकर अपने ‘होने’ में समाज का होना निर्धारित करने का रोल अदा कर रही है।

ये कविताएं अपने समय के साथ उसकी आंखों में आंखें डाल जिस विरल लय के साथ चलती और बातें करती हैं; उसी विरलता के साथ अपनी मिथकीय और सांस्कृतिक धरोहरों से अपने समय के लिए कुछ पाने की बेचैनी से जूझती भी हैं। जाहिर है इनमें भविष्य की शताब्दियों के विमर्श भी अगर मौजूद हैं तो क्या ताज्जुब!

निपट गांव-गंवई से लेकर आइंस्टीन के सिद्धांत तक की यात्रा करती शशिभूषण की ये कविताएं इस बात का प्रमाण हैं कि सक्षम हाथों में पड़ी कोई भी वस्तु अपनी उपस्थिति में सिर्फ अचरज पैदा नहीं करती, प्रतिभा का लोहा भी मनवाती है। इन कविताओं में सक्षम आंखों को बहुत कुछ मिलेगा और रौशनी ‘बहुत कुछ’ को रौशन करेगी।

साक्ष्य: शशिभूषण द्विवेदी; अनामिका प्रकाशन, 52, तुलाराम बाग, इलाहाबाद; 350 रुपए।

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