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निनाद : नाम में बहुत कुछ रखा है

शेक्सपियर की बहुत प्रसिद्ध उक्ति है: ‘नाम में क्या रखा है? गुलाब को किसी भी नाम से पुकारो, वह गुलाब ही रहेगा’। लेकिन क्या वाकई ऐसा है? क्या गुलाबो और मिस रोज में कोई फर्क नहीं?..

Author नई दिल्ली | September 6, 2015 15:41 pm

शेक्सपियर की बहुत प्रसिद्ध उक्ति है: ‘नाम में क्या रखा है? गुलाब को किसी भी नाम से पुकारो, वह गुलाब ही रहेगा’। लेकिन क्या वाकई ऐसा है? क्या गुलाबो और मिस रोज में कोई फर्क नहीं? क्या नाम के साथ हमारी वैचारिक मान्यताएं और सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यबोध नहीं जुड़े हैं? क्या आज भी अनेक परिवार ऐसे नहीं हैं, जहां विवाह के बाद ससुराल आने पर बहू का नाम बदल दिया जाता है? इसके पीछे वर पक्ष के लोगों की दृढ़ मान्यता होती है कि शादी के बाद बहू का मायका और माता-पिता का परिवार ही पराया नहीं हुआ, उसका विवाह से पहले का समूचा अस्तित्व भी उसके लिए पराया हो गया है- यहां तक कि उसका नाम भी अब उसका नहीं रहा। क्या हमारी नजर में इकबाल सिंह और इकबाल खां एक ही जैसे हैं? क्या वाकई नाम से कोई अंतर नहीं पड़ता?

आम लोगों को तो शायद नहीं पड़ता, लेकिन नाम बदलने वालों को जरूर पड़ता है, क्योंकि ऐसा करके वे अपना कोई न कोई वैचारिक आग्रह पूरा कर रहे होते हैं। मैं आज तक नहीं समझ पाया कि जवाहरलाल नेहरू के जमाने में बनारस का नाम बदल कर वाराणसी क्यों किया गया? क्या इसलिए कि यह उसका बौद्धकालीन प्राचीन नाम है और नेहरू की बौद्ध धर्म, दर्शन और परंपरा में गहरी दिलचस्पी थी? लेकिन इससे आम आदमी को क्या फर्क पड़ा? वह तो आज भी उसे या तो काशी कहता है या बनारस। बनारस संज्ञा से बना विशेषण बनारसी न जाने कितनी जगह काम आता है- बनारसी लहजा, बनारसी संस्कृति, बनारसी ठुमरी, बनारसी बाज (तबले में), बनारसी साड़ी, बनारसी पान और न जाने क्या-क्या….। बिस्मिल्लाह खां बनारसी थे। लेकिन वाराणसी से तो कोई विशेषण नहीं बनता। फिर क्यों बनारस को वाराणसी में बदला गया?

इसी तरह मद्रास को चेन्नई, बंबई (अंगरेजी में बॉम्बे) को मुंबई और कलकत्ता को कोलकाता बना दिया गया। लेकिन इतिहास कैसे बदलेंगे? ‘ऐ दिल है मुश्किल जीना यहां, ये है बॉम्बे, ये है बॉम्बे, ये है बॉम्बे मेरी जां’- इस सदाबहार फिल्मी गीत को कैसे बदलेंगे? फिल्म ‘बॉम्बे टु गोवा’ का नाम अब क्या कुछ और हो जाएगा? इतिहास में तो मद्रास प्रेसीडेंसी और बॉम्बे प्रेसीडेंसी ही रहेगा न! और इस फेरबदल से क्या फायदा है?

आम आदमी को भले इससे परेशानी होती हो, लेकिन अस्मिता की राजनीति करने वालों के लिए यह फायदे की चीज लगती है। और, अस्मिता की राजनीति केवल मुसलिम लीग, अकाली दल, शिवसेना, द्रविड़ पार्टियां या भाजपा नहीं, बल्कि वामपंथी दल भी करते हैं। कलकत्ते को कोलकाता वामपंथियों ने ही बनाया था, क्योंकि उन्हें बंगाली उपराष्ट्रवाद को हवा देने में मार्क्सवाद की राह पर चलने के मुकाबले ज्यादा फायदा नजर आ रहा था। मैं पहले भी कई बार इसका जिक्र कर चुका हूं कि इसी बंगाली अस्मिता की राजनीति करने के चक्कर में वामपंथियों ने पश्चिम बंगाल विधानसभा में खुशवंत सिंह के खिलाफ सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कराया था, क्योंकि उन्होंने रवींद्रनाथ ठाकुर के साहित्यिक लेखन के बारे में एक निरामिष-सी टिप्पणी कर दी थी।

जब से सुना है कि एक भाजपा विधायक की मांग पर नई दिल्ली में औरंगजेब रोड का नाम बदल कर एपीजे अब्दुल कलाम रोड किया जा रहा है, तब से मन में ऐसे ही कई सवाल घूम रहे हैं। सभी जानते हैं कि कलाम असाधारण रूप से लोकप्रिय राष्ट्रपति थे, बेहद सादगी से रहते थे और राष्ट्र के प्रति पूरी तरह समर्पित थे। देश के मिसाइल कार्यक्रम के विकास में उनका योगदान भी सभी जानते हैं। लेकिन वे भाजपा के प्रिय केवल इसी कारण नहीं बने थे। कलाम शाकाहारी थे, वीणा बजाते थे, संस्कृत जानते थे और गीता के प्रशंसक थे।

उनके बरक्स औरंगजेब की छवि एक कट्टर, निर्मम और हिंदूविरोधी मुसलिम शासक की है, जिसने मंदिरों को तोड़ा, हिंदुओं पर उस जजिया कर को फिर से लगाया, जिसे उसके पड़दादा अकबर ने खत्म कर दिया था, और पहले गुरु गोबिंद सिंह के पिता गुरु तेगबहादुर को मरवाया और फिर उनके दो नाबालिग पुत्रों को दीवार में चुनवा दिया। यही नहीं, वह इतना कट््टर मुसलमान था कि संगीत को उसने इतने गहरे दफनाने का हुक्म दिया था कि वह कभी बाहर न निकल सके। कहां वीणा बजाने वाले कलाम और कहां संगीत-विरोधी औरंगजेब!

दिलचस्प बात यह है कि इस तथाकथित राष्ट्रवादी सोच वाले लोगों को यह आभास भी नहीं होता कि उन पर अंगरेज उपनिवेशवादी इतिहासकारों का कितना असर है और उनकी इतिहासदृष्टि उनसे कितना अधिक प्रभावित है। इन इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास को हिंदू, मुसलिम और ब्रिटिश- तीन कालों में विभाजित किया। इनसे किसी ने नहीं पूछा कि अंतिम काल ब्रिटिश क्यों, ईसाई क्यों नहीं? इस कालविभाजन का असर आज तक चला आ रहा है। ब्रिटिशपूर्व के शासकों को हम राजनीतिक सत्ता के प्रतिनिधि के रूप में नहीं, धार्मिक सत्ता के प्रतिनिधि के रूप में देखते हैं। हिंदू शासक हिंदू की तरह फैसले कर रहे थे और मुसलिम शासक मुसलमान की तरह, लेकिन अंगरेज शासक ईसाई की तरह नहीं, सिर्फ राजनीतिक सत्ता संभालने वालों की तरह काम कर रहे थे।

इस इतिहासबोध का ही असर है कि हम भूल जाते हैं कि औरंगजेब ने सूफी सरमद को भी सूली पर लटकवा दिया था, जबकि वह मुसलमान था। उसने अपने जिन भाइयों को मारा वे भी मुसलमान थे। दकन के जिन राज्यों के खिलाफ युद्ध अभियान चलाने में उसने अपने जीवन का काफी बड़ा हिस्सा जाया किया, वे भी मुसलिम शासकों के अधीन थे। औरंगजेब के दरबार में जितनी बड़ी संख्या में हिंदू उच्च पदों पर आसीन थे, उतने किसी भी अन्य मुगल बादशाह के दरबार में नहीं थे। जिन मानसिंह और भगवानदास के नाम पर नई दिल्ली में सड़कें हैं, वे भी मुगल दरबार में ही थे। मानसिंह ने तो राणा प्रताप से युद्ध भी किया था।

उसने कुल मिला कर पंद्रह मंदिर तोड़े, लेकिन जिन मंदिरों को जागीरें और अन्य अनुदान दिए, उनकी संख्या इससे कई गुना ज्यादा थी। इनमें बनारस का जंगम बाड़ी मठ, चित्रकूट का बालाजी मंदिर, इलाहाबाद का सोमेश्वरनाथ महादेव मंदिर और गुवाहाटी का उमानंद मंदिर शामिल हैं। इस सबका उल्लेख करने का आशय यह सिद्ध करना नहीं है कि औरंगजेब एक निर्मम शासक नहीं था। सिर्फ यह कि उसने जो भी काम किए, उनके पीछे सत्ता का तर्क था, धर्म का नहीं। उसने उन्हीं मंदिरों को तोड़ा, जो उन शासकों के राज्य में पड़ते थे, जो उसके खिलाफ सिर उठा रहे थे।

और यह उसी तक सीमित नहीं था। ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी में कश्मीर पर राज करने वाले सम्राट हर्षवर्धन ने अनेक मंदिरों को लूटा और स्वर्णमूर्तियों को गलवा कर उनके सोने से अपना खजाना भरा था। 1791 में मराठा सेना ने शंकराचार्य द्वारा स्थापित शृंगेरी मठ पर हमला करके उसे क्षतिग्रस्त कर दिया था, क्योंकि उसे उनके शत्रु टीपू सुल्तान का संरक्षण प्राप्त था। बाद में टीपू ने उसकी मरम्मत कराई।

अपने जीवन के अंतिम वर्षों में औरंगजेब संगीत से विमुख हुआ था, लेकिन अधुनातन शोध से पता चलता है कि उसने संगीत पर प्रतिबंध नहीं लगाया था। एलिजाबेथ बटलर शोफील्ड ने साक्ष्य के आधार पर सिद्ध किया है कि औरंगजेब खुद संगीत का मर्मज्ञ था और उसके दरबार में उच्चकोटि के अनेक संगीतकार थे। उसके राज्यकाल में संगीत पर जितने ग्रंथों की रचना हुई उतनी पहले के किसी मुगल बादशाह के समय में नहीं हुई। जैसा कि प्रसिद्ध इतिहासकार इरफान हबीब ने आशंका प्रकट की है, क्या औरंगजेब के बाद राजनीतिक सत्ता का अगला निशाना अकबर और शाहजहां होंगे?

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