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प्रसंग : क्या बदला बयालीस सालों में

वीणा भाटिया कुछ दिनों पहले बासठ साल की अरुणा रामचंद्र शानबाग की बयालीस वर्षों तक लगातार कोमा में रहने के बाद मृत्यु हो गई। वे कोई असाधारण महिला नहीं थीं। पर उनके जीवन और मौत में कुछ तो असाधारणता है, जिसने संवेदनशील लोगों, बुद्धिजीवियों और महिला अधिकार के लिए लड़ने वाले लोगों के दिलो-दिमाग में […]

Author May 31, 2015 4:06 PM

वीणा भाटिया

कुछ दिनों पहले बासठ साल की अरुणा रामचंद्र शानबाग की बयालीस वर्षों तक लगातार कोमा में रहने के बाद मृत्यु हो गई। वे कोई असाधारण महिला नहीं थीं। पर उनके जीवन और मौत में कुछ तो असाधारणता है, जिसने संवेदनशील लोगों, बुद्धिजीवियों और महिला अधिकार के लिए लड़ने वाले लोगों के दिलो-दिमाग में एक जुंबिश पैदा की। एक हलचल-सी पैदा हुई, जो दिलों के सुकून पर भारी है। अरुणा की मौत ने एक बार फिर उन सवालों को हमारे सामने जलते अंगारों के रूप में रख दिया है, जिनसे हम आंख नहीं चुरा सकते।

बयालीस साल पहले मुंबई के केइएम अस्पताल में कार्यरत नर्स अरुणा के साथ अस्पताल के ही तलघर में बर्बर बलात्कार हुआ था। वे उस समय बीस वर्ष की थीं और जल्दी ही उनकी शादी होने वाली थी। अरुणा के साथ बलात्कार अस्पताल के ही एक वार्ड बॉय सोहनलाल ने किया था। बलात्कार के पहले उसने अरुणा के गले में कुत्ते को बांधने वाली जंजीर बांध दी थी, जिससे उनके मस्तिष्क में आॅक्सीजन का प्रवाह रुक गया और वे कोमा में चली गर्इं। सोहनलाल को गिरफ्तार कर लिया गया, पर सबूतों के अभाव में उस पर बलात्कार का मुकदमा नहीं चल सका। कोमा में चली जाने के कारण अरुणा कोई बयान दे पाने में असमर्थ थीं।

चिकित्सीय जांच में बलात्कार की पुष्टि नहीं हो सकी। पता नहीं, डॉक्टरों पर किस तरह का दबाव था। पर बाद में की गई जांच में अरुणा के साथ बलात्कार की पुष्टि हुई, पर अभियुक्त सोहनलाल पर सिर्फ हत्या के प्रयास और लूट का मामला दर्ज हुआ। उसने अरुणा की सोने की चेन और सगाई की अंगूठी छीन ली थी। उसे महज सात साल की सजा हुई और अरुणा शानबाग अगले बयालीस वर्षों तक जिंदा लाश बनी केइएम अस्पताल के वार्ड नंबर चार में पड़ी रहीं। इन बयालीस वर्षों के दौरान केइएम अस्पताल की नर्सों ने अरुणा शानबाग की जो सेवा की, वह मेडिकल इतिहास में बेमिसाल है।

अरुणा की मृत्यु के बाद वहां की नर्सों को एक अजीब-से खालीपन ने घेर लिया है। हालांकि अरुणा के कोमा में होने के कारण उनका अस्तित्व महज भौतिक रूप में था, पर इतना भी वहां की नर्सों को संबल प्रदान करता और उनके अपने अस्तित्व को रेखांकित करता था। अब उनके अस्तित्व पर एक स्त्री होने की वजह से सवाल उसी रूप में है, जैसे बयालीस वर्ष पहले था। उनकी सुरक्षा खतरे में है। पुरुष समाज में उनकी स्थिति दोयम दर्जे की है।

यह स्थिति निम्न वर्ग से लेकर तमाम वंचित वर्ग की स्त्रियों के साथ है। मध्य और उच्च वर्ग की महिलाओं के साथ बर्बर बलात्कार की वारदात कम ही होती है, कुछ अपवादों के सिवा। यह अलग बात है कि यौन शोषण के मामले हर वर्ग और समुदाय की स्त्रियों के साथ कमोबेश होते ही हैं, पर निम्न और वंचित वर्ग की स्त्रियां बलात्कारियों की आसान शिकार होती हैं। स्त्रियों को अपना शिकार बनाने वालों में आवारागर्द तत्त्वों से लेकर दबंग अपराधी और अय्याश अमीरजादे तक होते हैं, जिन्हें न कानून का भय होता है, न न्यायालय का, क्योंकि अपने अनुभवों और पूर्व उदाहरणों से वे भली-भांति समझ जाते हैं कि कानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। वे किसी भी तरह उसे प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।

अरुणा शानबाग के मामले में कानून अपना काम कर पाने में विफल रहा। वह एक बर्बर अपराधी के पक्ष में झुक गया। ऐसा क्यों? इसलिए कि ऐसी लोमहर्षक घटना को किसी ने गंभीरता से नहीं लिया। न अस्पताल प्रशासन, न पुलिस और न ही न्यायालय ने इस मामले में संवेदनशीलता दिखाई। सबूत इकट््ठे नहीं किए गए। मेडिकल जांच में डॉक्टरों ने कोताही बरती, क्योंकि अरुणा एक सामान्य नर्स थी। दूर-दराज के किसी गांव से नौकरी करने मुंबई जैसे महानगर में आई थी। हजारों-लाखों ऐसी औरतें गांवों से पलायन कर रोजी-रोजगार के लिए महानगरों में आती हैं। कौन उनकी इज्जत की परवाह करता है!

स्त्रियों की इज्जत की जो गलत अवधारणा भारतीय मानस में गहराई से जड़ जमाए हुए है, वह भी बलात्कार को बढ़ावा देने के लिए जिम्मेदार है। बलात्कार या यौन शोषण का मामला सामने आने पर परिवार के लोग उसे दबाना चाहते हैं। उनका मानना होता है कि मामला प्रकाश में आने पर परिवार की बेइज्जती होगी। यही कारण है कि बलात्कार के अधिकतर मामलों में पुलिस में रिपोर्ट होती ही नहीं। अरुणा शानबाग मामले में भी उसके होने वाले पति ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराने का विरोध किया था। दूसरी तरफ, पुलिस में मामला दर्ज कराए जाने के बावजूद न्यायिक प्रक्रिया की विसंगतियों के कारण शायद ही पीड़िताओं को न्याय मिल पाता है।

भारतीय समाज में बलात्कार की जड़ें बहुत गहरी हैं। सामंती समाज से लेकर आज के दौर तक बलात्कार स्त्रियों पर अत्याचार का औजार बना हुआ है। बलात्कार की हर घटना के बाद जब बड़े पैमाने पर विरोध होता है तो लगता है कि इस प्रवृत्ति पर कुछ लगाम लगेगी। लेकिन बलात्कार के मामलों पर कानून सख्त किए जाने की जितनी बात होती है, बलात्कार की घटनाएं और बढ़ने लगती हैं। मानो बलात्कारी कानून और शासन-व्यवस्था को खुलेआम चुनौती देना चाहते हों। निर्भया कांड के बाद बलात्कार संबंधी कानूनों की पुनर्समीक्षा की गई और इस संबंध में नए सिरे से कानूनों को परिभाषित किया गया, लेकिन कानून के भय से बलात्कार की घटनाओं में कोई कमी नहीं आई। आंकड़े इसके गवाह हैं।

इससे स्पष्ट है कि बलात्कार की समस्या कानून-व्यवस्था से नहीं, बल्कि समाज-व्यवस्था से जुड़ी है। अमीरी-गरीबी और शोषण-दमन पर आधारित इस व्यवस्था में बलात्कार को मिटा पाना संभव नहीं लगता। पुरुष वर्चस्व और हर स्तर पर स्त्री उत्पीड़न शोषणमूलक व्यवस्था का अपरिहार्य गुणधर्म है। यह व्यवस्था हजारों वर्षों से बदस्तूर कायम है। कानूनी उपायों और सुधारवादी प्रयासों से बलात्कार और स्त्री उत्पीड़न के विविध रूपों को समाप्त नहीं किया जा सकता।

स्त्री की वास्तविक आजादी एक समतावादी समाज में ही संभव है। शोषण पर आधारित सामाजिक व्यवस्था में स्त्री का स्थान दोयम दर्जे का है और रहेगा। यह ऐतिहासिक तथ्य है। स्त्री उत्पीड़न के रूप पूरी दुनिया में कमोबेश एक जैसे हैं। इसलिए स्त्री मुक्ति का संघर्ष सामाजिक-व्यवस्था के बदलाव के संघर्ष से अलहदा नहीं हो सकता।

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