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पुस्तकायन : वैचारिक शून्यता के विरुद्ध

पूनम सिन्हा भगवानदास मोरवाल के नए उपन्यास नरक मसीहा में गैर-सरकारी संगठनों द्वारा समाज के विकास की आड़ में मजबूती से जड़ जमा चुके लूटतंत्र की बखिया उधेड़ी गई है। शासन, गैर-सरकारी संगठनों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के गठजोड़ से जो एक नया साम्राज्यवाद कायम हुआ है, उसमें एक तरफ वातानुकूलित कोठियों, गाड़ियों, पांच सितारा होटलों […]

Author January 4, 2015 11:00 PM

पूनम सिन्हा

भगवानदास मोरवाल के नए उपन्यास नरक मसीहा में गैर-सरकारी संगठनों द्वारा समाज के विकास की आड़ में मजबूती से जड़ जमा चुके लूटतंत्र की बखिया उधेड़ी गई है। शासन, गैर-सरकारी संगठनों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के गठजोड़ से जो एक नया साम्राज्यवाद कायम हुआ है, उसमें एक तरफ वातानुकूलित कोठियों, गाड़ियों, पांच सितारा होटलों और हवाई यात्राओं का सुख उठा रहे कुछ लोग हैं, तो दूसरी तरफ सिद्धांतों और मूल्यों को अपनी छाती से चिपकाए गंगाधर आचार्य और कॉमरेड सोहनलाल ‘प्रचंड’ जैसे लोग हैं, जो जीवन के क्षरित मूल्यों के असह्य ताप से संघर्ष करते हैं।

इस उपन्यास में गैर-सरकारी संगठनों की वास्तविक दुनिया पुनर्सृजित हुई है, जिसमें प्रवेश करने पर समूचा परिदृश्य जीवित पात्र की तरह पूरी भयावहता के साथ सम्मुख आ खड़ा होता है। इस उपन्यास के जरिए गैर-सरकारी संगठनों की दुनिया का कटु यथार्थ उजागर होता है। इनके घेरे में लोक संस्कृति भी खतरे में है। लोक और जातीय संस्कृति के पण्यीकरण द्वारा ये संगठन निरंतर फल-फूल रहे हैं। ये तो लोगों के सपनों और संस्कृति को भी उद्योग में बदल रहे हैं। जो कुछ समाज के लिए हितकर है, बचा लेने योग्य है, सब पर इनका कब्जा है। ‘संस्कृति का उद्योग लोक और देसी संस्कृति की उपेक्षा नहीं करता। अगर उसने इनकी उपेक्षा कर दी होती, तो शायद ये बच भी जातीं। लेकिन वह तो इन्हें विदेशों में निर्यात करने योग्य कलाकृतियों में बदल देता है, जो अमीरों की बैठक और मृत्यु-पर्व मनाने वाले संग्रहालयों में सजाने के काम आती हैं।’

उपन्यासकार ने एनजीओ-संस्कृति से जुड़े एक-एक पक्ष की शिनाख्त की है। मुख्य कथा में किसानों की कर्ज-समस्या, उनकी आत्महत्याएं, आदिवासियों की समस्याएं आदि कई पहलू समावेशित हैं। उपन्यासकार ने मुख्य कथा के साथ आनुषंगिक प्रसंगों को कुशलता से समेटते हुए उपन्यास को परिणति तक पहुंचाया है।

‘नरक मसीहा’ में आदर्श को थामे हुए गांधीवादी गंगाधर आचार्य और कम्युनिस्ट सोहनलाल ‘प्रचंड’ हैं। दूसरी तरफ बहन भाग्यवती हैं, जो गांधीवादी मूल्यों को ताक पर रख कर जुगाड़ द्वारा राष्ट्रीय बाल एवं महिला कल्याण परिषद की अध्यक्ष बन कर दफ्तर के वातानुकूलित कक्ष और गाड़ी का सुख उठाते हुए गैर-सरकारी संगठनों को दिए जाने वाले अनुदानों पर कमीशन खाने में लगी रहती हैं। कैसी विडंबना है कि गंगाधर आचार्य जून की लू से भरी दोपहरी में दिल्ली की सड़क नापते हुए सर्वोदयी कल्याण सभा के लिए अनुदान की आस में परिषद अध्यक्ष भाग्यवती के दफ्तर में घंटों प्रतीक्षा करते हैं। कॉमरेड सोहनलाल ‘प्रचंड’ अपने सिद्धांतों और मूल्यों के साथ उम्र की ढलान पर सीली हुई कोठरी में खस्ताहाल तख्त पर उद्विग्न होकर पड़े रहते हैं। कॉमरेड ‘प्रचंड’ के कम्युनिस्ट चेले सर्वहारा फाउंडेशन के कर्ता-धर्ता कबीर और ग्रासरूट फाउंडेशन की एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर सानिया पटेल दोनों पति-पत्नी मार्क्सवादी सिद्धांतों को तिलांजलि देकर अपने-अपने गैर-सरकारी संगठनों के माध्यम से दोनों हाथों से पैसे बटोर रहे हैं।

बहन भाग्यवती गंगाधर आचार्य से कहती हैं- ‘क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि जनाधार सत्याग्रह यात्रा के नाम पर विदेशों से भी धन मिला है कबीर को… इतना ही नहीं, इसके सर्वहारा फाउंडेशन को अमेरिका-यूरोप से सिल्क रूट फेस्टिवल, गोल्डन पाथ, हिमालय दर्शन, जल सागर जैसी अनाम परियोजनाओं के नाम पर लाखों डॉलर और यूरो के रूप में इतना अनुदान मिल चुका है कि उन्हें रुपयों में तब्दील कर, उनके पीछे लगे शून्यों को गिना जाए तो गिनते-गिनते आपको चक्कर आ जाएं…।’

इस मामले में इंस्टीट्यूट फॉर वीमेंस स्टडीज की डायरेक्टर डॉ वंदना राव, अखिल भारतीय अबला मंच की अध्यक्ष सरला बजाज, डॉ आंबेडकर दलित महिला उद्धार सभा की सुमन भारती, राहत फाउंडेशन चलाने वाली अमीना खान और हॉरमनी फॉर गोल्डन फाउंडेशन की सीइओ टीना डालमिया- सभी एक ही थैली के चट््टे-बट््टे हैं। इनके लिए इनके संगठन कमाने-खाने और लूट-खसोट के साधन हैं। ‘इस देश की गरीबी, भुखमरी, कुपोषण, जैसी असाध्य व्याधियों को मिटाने के नाम पर पौंड, डॉलर और यूरो हथियाया जाता है।’ शासन, गैर-सरकारी संगठनों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के गठजोड़ से लूटतंत्र दिनोंदिन मजबूत होता जा रहा है।

वैचारिक शून्यता के इस युग में सारी संपत्ति कुछ थोड़े-से लोग हथिया लेना चाहते हैं। क्षोभ होता है जब भाग्यवती अपने गांधीवादी विचारों को दरकिनार करते हुए गंगाधर आचार्य को नसीहत देती हैं- ‘ऐसा भी क्या अनुशासन, जिसे आदमी जिंदगी भर छाती से चिपकाए रखे।’

उपन्यास की अंतर्वस्तु उपन्यासकार के अनुभव की दुनिया है। लेकिन कोई भी अनुभव रचनाकार के मानस की भट्ठी में पक कर नए रंग-रूप में अभिव्यक्ति पाता है। ‘नरक मसीहा’ की कथावस्तु जहां कहीं ले जाती है, मन वहीं गोते लगाने लगता है। जंतर मंतर और इंडिया गेट पर आए दिन होने वाले धरनों और रैलियों की भीतरी सच्चाई को भी उपन्यासकार ने पूरी बेबाकी से उजागर किया है, ‘ये कोई पुरातात्त्विक-ऐतिहासिक स्थल न होकर, ऐसे सार्वजनिक संडास बन गए हैं कि देश में मरोड़ कहीं भी उठे, बस गांधी टोपी पहन कर दौड़ लो इन संडासों की तरफ। और अपना मीडिया, वह तो लोटा लिए जैसे इनकी धोने के लिए चौबीस घंटे तत्पर ही रहता है।’

एनजीओ के लिए अनुदान पाने के नुस्खे क्या हैं, पाए हुए ग्रांट के अधिकतर हिस्से को पचा कर उसका समायोजन कागज पर कैसे करना है, देशी या विदेशी डेलिगेशन को कैसे विश्वास में लेना है कि ग्रांट बंद न हो- गैर-सरकारी संगठनों की इन कारगुजारियों को उपन्यासकार ने अत्यंत सजीव भाषा में बहुत सुंदर ढंग से बुना है। संवाद पटुता विलक्षण है। मसलन, सर्वहारा फाउंडेशन वाला कबीर राहत फाउंडेशन वाली अमीना खान से कहता है- ‘एक बार यह डेलिगेशन खुश होकर चला जाए, अमीना फिर देखना बहनजी का यह प्रेजिडेंट आॅर्गेनाइजेशन कैसे डॉलरों की खेप भेजवाता है। कैसे मैं अमेरिकियों का टटलू काटता हूं।’

एनजीओ के नाम पर मजलूम लड़कियों को गोद लेकर घरेलू नौकरानी के रूप में उनके श्रम का जो शोषण होता है, उसका लोमहर्षक वर्णन इस उपन्यास में है। डॉ आंबेडकर दलित महिला उद्धार सभा की मुखिया सुमन भारती ऐसी ही एक लड़की मार्था एक्का से घरेलू नौकरानी का काम लेती हैं। परिषद की उपसचिव मिसेज मौर्य को खुश करने के लिए उनकी बेटी की शादी में उसे वहां काम करने के लिए पहुंचाती हैं। वहां जिस अमानवीय ढंग से उससे निरंतर काम लिया जाता है, वह सिहरा देने वाला है। इतना ही नहीं, जब सुमन भारती मार्था को लेने मिसेज मौर्य के यहां जाती हैं, तो मिसेज मौर्य उनसे मार्था को अपने लिए मांगती हैं, जैसे वह जीती-जागती लड़की न होकर कोई सामान हो। मिसेज मौर्य कहती हैं, ‘एनजीओ के नाम पर आपको और मेड मिल जाएगी, पर मुझे नहीं मिलेगी। मेरी भी अगर कोई एनजीओ होता तो आपसे कहने की जरूरत नहीं होती।’

किसानों की कर्ज-समस्या और आत्महत्याओं की चर्चा संक्षिप्त, पर बेधक है। मोरवालजी ने इस उपन्यास में ग्राम और नगर के जीवन के अपने अनुभवों और भाषा का दोहरे संसाधन के रूप में उपयोग किया है। उन्होंने गांव के मिट््टी-सने शब्दों को झाड़-पोंछ कर इस प्रकार उपयोग किया है कि उनमें ताजगी-भरी चमक आ गई है।
उपन्यासकार का मकसद गैर-सरकारी संगठनों के कटु यथार्थ को उजागर करना है, पर उपन्यास पढ़ना समाप्त करते हुए रोशनी की कुछ किरणें हमारे साथ होती हैं। उपन्यास में मानवीय संवेदना से युक्त पार्टी अध्यक्ष हैं, जो शोषित, पीड़ित और वंचित स्त्रियों को अपने सीने से चिपका कर उनके दुखों पर फाहा डालना चाहती हैं। गंगाधर आचार्य और ‘प्रचंड’ हैं। दबाव डाल कर भी परिषद अध्यक्ष भाग्यवती और उपसचिव मिसेज मौर्य आचार्यजी से अनुदान के पैसे का गलत समायोजन कागज पर नहीं करवा पातीं।

सिविल सोसाइटी की असलियत को आचार्यजी समझ चुके हैं। वे भाग्यवती से कहते हैं, ‘… मैं आपसे यही निवेदन करने आया हूं कि मुझे इस ठगों और धोखेबाजों के स्वर्ग से मुक्त करिए… मुझसे निहत्थों के विरुद्ध होने वाली यह हिंसा, जो भले दिखाई न देती हो, अब बर्दाश्त नहीं होती।… मैं सर्वोदयी कल्याण सभा की अपनी इस छोटी-सी मैली-कुचैली दुनिया में ही खुश हूं… इतना आत्मबल तो बापू ने सिखा ही दिया है कि दीन-हीनों के बीच कैसे रहा जाता है।’ रचनात्मकता का अर्थ विद्रूपताओं के बीच भी मानवीय संभावनाओं की तलाश है।

इस उपन्यास में अपने समय और समाज की समस्याओं के आभ्यंतर की पहचान कराने में संवादों की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। व्यंग्य की धार पूरे उपन्यास में आदि से अंत तक प्रवहमान है। संज्ञाओं की जगह विशेषणों के प्रयोग ने व्यंग्य की धार को प्रखर और चटुल बना दिया है। नए विषय और भाषा के नए तेवर के साथ प्रस्तुत इस उपन्यास में रोचकता के साथ ही आज के समाज की वैचारिक शून्यता पर चोट करने की ताकत भी है।

नरक मसीहा: भगवानदास मोरवाल, राजकमल प्रकाशन प्रा. लिमिटेड, 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली; 550 रुपए।

 

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