ताज़ा खबर
 

सरोकार की लय

अजेय कुमार निर्मला गर्ग के संग्रह दिसंबर का महीना मुझे आखिरी नहीं लगता की कविताएं वामपंथी दर्शन से प्रेरित हैं। पुस्तक का समर्पण पृष्ठ ही इसका खुलासा कर देता है, जिसमें लिखा है- ‘उस दिन के लिए जब किसान आत्महत्या नहीं करेंगे’। इन कविताओं में कवि और कार्यकर्ता के बीच दूरी बहुत कम दिखाई देती […]

Author January 4, 2015 11:10 PM

अजेय कुमार

निर्मला गर्ग के संग्रह दिसंबर का महीना मुझे आखिरी नहीं लगता की कविताएं वामपंथी दर्शन से प्रेरित हैं। पुस्तक का समर्पण पृष्ठ ही इसका खुलासा कर देता है, जिसमें लिखा है- ‘उस दिन के लिए जब किसान आत्महत्या नहीं करेंगे’। इन कविताओं में कवि और कार्यकर्ता के बीच दूरी बहुत कम दिखाई देती है। पुस्तक की भूमिका में निर्मला बताती हैं कि उन्होंने ऐसी कविता लिखनी चाही, जो ‘सांप्रदायिकता, जात-पांत, ऊंच-नीच, मानव-विरोधी तमाम षड्यंत्रों को समझे। आर्थिक, राजनीतिक कोई विषय उससे अछूता न रहे।’ उसके बाद एक अन्य स्वीकृति है भूमिका में कि जब ‘विषय का दबाव ज्यादा होता है, तो ऊबड़-खाबड़ शिल्प से ही मैं काम चला लेती हूं।’
अच्छी बात है कि वैचारिक आग्रह प्रबल होते हुए भी भावात्मक स्तर पर ये कविताएं मन को छूती हैं। इनमें अनुभव और विचारधारा का सही समीकरण है। ये कविताएं हमारे वर्तमान के प्रति सजग हैं, समसामयिक और विचार के स्तर पर बेहद आधुनिक हैं। इनमें जीवन है, संघर्ष है और मृत्यु का कोई भय नहीं है। निर्मला विश्व के किसी भी कोने में हुई घटना या दुर्घटना के प्रति निर्वैयक्तिक संगति अनुभव करती हैं।

निर्मला गर्ग ने नागार्जुन की परंपरा को ‘काठमांडो बदल रहा है’, ‘हम हत्यारों का स्वागत नहीं करते’, ‘गाजा-पट््टी’, ‘ऊगो चावेज’ जैसी कविताएं देकर बखूबी निभाया है। 2008 में लिखी कविता ‘काठमांडो बदल रहा है’ में जो सवाल कवयित्री तत्कालीन प्रधानमंत्री माओवादी नेता प्रचंड से पूछती हैं, वे आज बहुत प्रासंगिक लगते हैं और वहां की माओवादी राजनीति का जो हश्र हुआ है, ऐसा लगता है कि उसका अक्स मानो निर्मला ने काठमांडो की अपनी यात्रा में ही देख लिया हो। ऐसी कविता नेपाल की परिस्थितियों पर किसी पुस्तक को पढ़ कर नहीं लिखी जा सकती। इन्हें जीकर या झेल कर और समस्त मानवता के दुख-दर्द को अंतरराष्ट्रीयतावादी दृष्टिकोण से देखने और महसूस करने के बाद ही लिखी जा सकती है। एक अन्य कविता में कवयित्री सोचती है: ‘मनुष्य को धनपशु में तब्दील करता है अमेरिका/ सरोकारों के सारे तंतु काट कर/ सिखाता है सिर्फ अपने लिए जीना’। (मैं बांग्लादेश जाना चाहती हूं)

प्राय: देखा जाता है कि केवल राजनीतिक-आर्थिक संदर्भों को अंतर्वस्तु के रूप में ग्रहण करने के प्रति आग्रहशील कवि अपने चयन क्षेत्र और अनुभव-जगत के फैलाव को कम विस्तार दे पाते हैं। निर्मला गर्ग की कविताओं में ऐसा नहीं है। उनकी अनेक कविताएं ऐसी हैं, जिनमें उन्होंने प्रकृति, सौंदर्य और मानवीय संबंधों पर बड़े ही कलात्मक अंदाज से अपनी बात कही है। ऐसा कहते हुए वे बुनियादी सामाजिक परिवर्तन के लिए अनिवार्य वर्ग-संघर्ष की प्रक्रिया को आंखों से ओझल नहीं होने देतीं। मुन्नार की पहाड़ियों पर ‘पहली चाय पीते हुए’ उन्हें याद आते हैं माकपा के ‘खांटी कम्युनिस्ट’ अच्युतानंदन, जिन्होंने ‘बागानों के बीच टाटा टी स्टेट’ नहीं बनने दिया, जिससे ‘चाय और जेब की दोस्ती बरकरार रही’।

संग्रह की कई कविताओं में सांप्रदायिकता विरोध किसी नारेबाजी और विचारधारा के यांत्रिक प्रयोग की तरह नहीं आता। वे जानती हैं कि सांप्रदायिकता के विरुद्ध असली युद्ध तो मूल्यों और संस्कारों के स्तर पर लड़ा जाना है, इसलिए उनकी ये कविताएं केवल विचार तक सीमित नहीं रहतीं, इससे आगे जाती हैं। अपने जीवनानुभवों की प्रक्रिया को सामने लाते हुए निर्मला धर्म की भूमिका पर भी अंगुली उठाती हैं। यह कुछ स्वाभाविक भी है उनके लिए, क्योंकि उन्होंने कविता का रास्ता ही इसलिए चुना कि ‘घर में सामंती आचार-व्यवहार और धार्मिक अंधविश्वासों का कुहासा छाया था। मन में सवाल उठते थे, जिन्हें पूछना धृष्टता माना जाता। लिहाजा मैंने कविता चुनी।’
‘जीवन-जगत माया है मेरा संसार’, ‘वे स्त्रियां कोलकाता से आई थीं’, ‘आरती’, ‘हाट’, ‘भोज पत्र’, ‘सबको तालीम मिले मौला’, ‘तर्जुमा’, ‘आस्था का कारोबार’, ‘फे्रम से बाहर’ आदि कविताओं में रोजमर्रा के आम मध्यवर्गीय जीवन में फैले संस्कारों, अंधविश्वासों और सांप्रदायिक विचारों के दर्शन होते हैं। पुष्कर पर सातों कविताएं बहुत महत्त्वपूर्ण बन पड़ी हैं। इनमें स्त्री, दलित और धर्म के आपसी रिश्तों की बुनियाद पर चोट की है निर्मला ने। ‘सरस्वती- अपनी ही बेटी से ब्रह्मा ने बलात्कार किया/ यह एक ऐसी तारीख थी/ जब पिता-पुत्री के पवित्र संबंधों पर/ कालिख पोत दी सृष्टि के आदि पिता ब्रह्मा ने ही’।

बाजार पर बहुत सुंदर कविता ‘फेयर एंड लवली’ है: ‘कविताएं जुटी रहती हैं चींटी सी/ समाज की संरचना को बदलने के लिए/ फेयर एंड लवली अंगूठा दिखाती है/ उस श्रम को।’ पर आश्चर्य होता है कि पूरे संग्रह में प्रेम कविता एकदम गायब है। हां यह इच्छा जरूर व्यक्त की है, निर्मला ने एक कविता में, कि ‘ऐसे ही सही/ बची रहे मुझमें/ थोड़ी सी नमी।’

एक शिकायत जरूर है मेरी। और यह शिकायत केवल निर्मला से नहीं, बल्कि उन तमाम कवियों से है, जो कविता के बारे में कविताएं लिखते हैं। क्या उन्हें कविता की ताकत पर संदेह है? निर्मला गर्ग ने अपनी कई कविताओं में समूची सामाजिक प्रक्रिया के केंद्र में सांस्कृतिक संघर्ष को रखा है। पर कविता केंद्रित कविताओं में सांस्कृतिक संघर्ष के मूल में सिर्फ अपनी विधा को देखना चाहा है। क्या यह प्रवृत्ति आत्ममुग्धता की ओर नहीं ले जाती? ‘कविता के पक्ष में एक बयान’ नामक कविता में निर्मला ने बिना नाम लिए ऐसे कई जाने-माने कथाकारों, लेखकों और संपादकों पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी की है, जिन्होंने कभी कहीं कविता की सार्थकता पर संकोच प्रकट किया होगा। इससे बचा जा सकता था।

आज मानव जीवन पहले से कहीं अधिक जटिल, अस्थिर, अस्त-व्यस्त और अराजक हुआ है। ‘सुरक्षित दूरी से’ प्रश्न पूछने से नहीं, बीच भंवर में घुस कर बहुआयामी वास्तविकता को देख-परख कर ही हमारे मूल्यबोध को झकझोरने वाली कविता लिखी जा सकती है। निर्मला गर्ग की अधिकतर कविताएं इसी श्रेणी में आती हैं।

दिसंबर का महीना मुझे आखिरी नहीं लगता: निर्मला गर्ग; बोधि प्रकाशन, एफ-77, से. 9, रोड नं. 11, करतारपुरा इंडस्ट्रियल एरिया, बाईस गोदाम, जयपुर; 60 रुपए।

 

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App