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मुक्तिबोध का तीसरा क्षण

मुश्किल यह है कि कविता लिख चुकने के अनंतर, उसी कविता में समाई किंतु उससे बृहत्तर, विशालतर कविता अपने स्वरूप का विकास करती हुई उद्घाटित हो जाती है। वह ‘छा’ जाती है और मेरे मन में ही अपना स्वतंत्र विकास कर लेती है।
Author August 13, 2017 05:37 am
प्रतीकात्मक चित्र।

 पवन माथुर    

प्रसिद्ध उपन्यासकार और समालोचक मार्सल प्रूस्त ने कहा था- ‘‘कलाकृतियों को आकार देते समय हम पूर्णत: स्वतंत्र नहीं होते… वे ‘पूर्व-विद्यमान’ हैं, इसलिए उन्हें आविष्कृत नहीं, मात्र खोजा जा सकता है।’’ इस ‘पूर्व-विद्यमान’ कृति की तलाश में मुक्तिबोध कहते हैं, ‘‘मुश्किल यह है कि कविता लिख चुकने के अनंतर, उसी कविता में समाई किंतु उससे बृहत्तर, विशालतर कविता अपने स्वरूप का विकास करती हुई उद्घाटित हो जाती है। वह ‘छा’ जाती है और मेरे मन में ही अपना स्वतंत्र विकास कर लेती है।’’  इस सृजन नैरंतर्य और सौंदर्यबोध की प्रक्रिया को मुक्तिबोध ने ‘तीसरा क्षण’ नामक आलेख में शब्दबद्ध किया। कला के पहले क्षण को उन्होंने ‘जीवन का उत्कट, तीव्र अनुभव क्षण’ के रूप में स्वीकार किया, जो जीवन के साधारण अनुभवों से भिन्न होता है। प्रथम क्षण- मानसिक प्रक्रिया को, आत्मभिव्यक्ति की ओर ले जाने वाला पहला जबरदस्त धक्का होता है और उसकी गति, तत्त्व रूपायित करता है। भोगतत्त्व और दर्शकत्व के मूल, कला के पहले क्षण में ही खोजे जाने चाहिए।

कला का दूसरा क्षण, अनुभव का अपने दुखते हुए मूलों से पृथक हो जाना है। वैयक्तिक से निर्वैयक्तिक होने के दौरान उस फैंटसी ने कुछ ऐसा नवीन रूप ग्रहण कर लिया, जिससे वह खुद भी वास्तविक अनुभव से स्वतंत्र बन बैठी। फैंटेसी का जनक दर्शक, जीवन के नए-नए अर्थ ढूंढ़ने लगता है और उसमें आनंद लेने की प्रक्रिया में ही जो ‘प्रसन्न’ भावना पैदा होती है, वही सौंदर्यानुभव का मर्म है। तीसरा और अंतिम क्षण, इस फैंटेसी के शब्दबद्ध होने की प्रक्रिया का आरंभ है। इस आदिम प्रवाह में फैंटेसी के सारे रंग घुल कर बहने लगते हैं, सारा व्यक्तित्व समस्त चेतना बहने लगती है। शब्दबद्ध होने की प्रक्रिया में भाषा फैंटेसी में संशोधन उपस्थित करती जाती है, फैंटेसी अपने मूल रंगों के निर्वाह के लिए भाषा पर दबाव लाती है, तीसरे क्षण में यह द्वंद्व महत्त्वपूर्ण है। शब्दबद्ध होने पर जो कृति तैयार होती है वह ‘कला के दूसरे क्षण की पुत्री’ है, प्रतिकृति नहीं।

जर्मन दार्शनिक ऐलेक्जैंडर बोमगार्टन ने सत्रह सौ पैंतीस में अपने प्रबंध ‘फिलोसोफिकल मेडिटेशन्स आॅन सम रिक्वायरमेंट्स आॅफ द पोयम’ ने ‘ऐंद्रिय संज्ञान’, ‘तार्किक संज्ञान’ के लिए जरूरी शर्त माना और ‘कला की थियरी’ में तीन क्षण महत्त्वपूर्ण बताए। पहला क्षण ‘कल्पना का अतिरेक’ है। संज्ञान की इस प्रक्रिया का एक भावात्मक पहलू भी है, जिसे उन्होंने ‘सौंदर्यबोध की उमंग’ से परिभाषित किया और माना कि ‘कलात्मक भावात्मकता’ ‘तर्कगत- परिणतियों’ से भी जुड़ती है। दूसरा क्षण ‘कल्पना के विशिष्ट पहलू’ के विस्तार से रेखांकित किया गया। इस संधि के कारण ‘कलाकृति का निर्णायक बोध’ पूर्णत: ऐंद्रियगत नहीं रह जाता। और तीसरा क्षण ‘प्रस्तुति की स्पष्टता’ से जुड़ जाता है। ‘द सिस्टम आॅफ ट्रांसंडैंटल आइडियलिज्म’ में दार्शनिक, जोसेफ शैलिंग ने सन 1800 में ‘स्वचैतन्यता’ की कथा के विभिन्न सोपानों की चर्चा की। उनके अनुसार प्रकृति की यात्रा अचेतन से चेतन तक की है, जबकि ‘कलात्मक प्रक्रिया’ चेतन से शुरू होकर, ‘चेतन के हस्तक्षेप’ के बिना ही आगे बढ़ती चलती है। कृति की प्रारंभिक सर्जना कलाकार द्वारा ही होती है, पर इसके पूर्ण निष्पादन के दौरान कलाकार किसी ‘अतिरिक्त-शक्ति’ की गिरफ्त में आ जाता है, जिसे वह नियंत्रित नहीं कर पाता। यहीं से कृति की सर्जना में ‘अचेतन तत्त्व’ की पैठ हो जाती है। शैलिंग ने इसे ‘अचेतन क्षण’ की संज्ञा दी थी।

इमैनुअल कांट का मत था कि ‘सौंदर्यबोध’ कल्पना और ‘प्रज्ञा’ की पारस्परिक क्रीड़ा का परिणाम है। सौंदर्यबोध को किसी अवधारणा के अधीन नहीं किया जा सकता। वह ‘कल्पना का वह प्रारूप’ है, जो वैचारिक उथल-पुथल करने की क्षमता तो रखता है, पर किसी ‘पूर्व-निर्धारित विचारपुंज’ से अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता। भाषा इसके लिए पर्याप्त नहीं पड़ती और ‘सौंदर्यबोध’ की सार्वभौमिकता के पीछे किसी ‘सुस्पष्ट अवधारणा’ का होना निश्चित नहीं है। सौंदर्यबोध के विवेचन के पीछे कांट की निगाह, ‘द्रष्टा/ ग्रहीता’ पर टिकी रहती है। उनका मत था कि ‘द्रष्टा’ की अभिवृत्ति किन्हीं ‘वैचारिक-परिभाषाओं’ या ‘उपयोगितावाद’ पर होने के बजाय ‘उद्देश्य-रहित उद्देश्यात्मकता’ की होनी चाहिए, जिसे ‘कांट ने एक ‘निर्लिप्त-प्रसन्न भावना’ से भी रेखांकित किया। यह ‘प्रसन्न-भावना’ न वासना को जन्म देने में समर्थ है, न ही उसमें गुंथी हुई है, यह एक ‘निर्लिप्त अवस्था’ है।
जर्मन दार्शनिक हीगेल ने कहा कि ऐंद्रियबोध और अवधारणात्मकता को अलग नहीं किया जा सकता। उनकी दृष्टि ‘द्रष्टा’ पर केंद्रित न होकर ‘कलाकार’ या ‘भोक्ता’ पर टिकती है।उनके अनुसार कलाकृति एक विशिष्ट ऐतिहासिक चेतना का संवाहक बनती है, जिसे हम ‘चुग-चेतना’ भी कह सकते हैं। जार्ज लूकाच में यही चेतना ‘वैश्विक-दृष्टि’ में तब्दील हो जाती है।
जर्मन सौंदर्यशास्त्र की इस पीठिका को आधार मानते हुए अगर ‘तीसरे क्षण’ का पुनरवलोकन करें, तो- मुक्तिबोध का ‘पहला क्षण’ अगर उत्कट-तीव्र अनुभव का है, तो वहीं ‘बोमगार्टन’ का ‘पहला क्षण’ विशिष्ट व्यक्तिपरक कल्पना का अतिरेक है। मुक्तिबोध इस ‘उत्कट तीव्र अनुभव क्षण’ के संबंध में लिखते हैं: ‘रंगीन शाम मेरे भीतर समा गई है, बस गई है, वह एक जादुई शक्ति है, मुझे उस सुकुमार ज्वालाग्राही जादुई शक्ति से यानी मुझसे, मुझे डर लगता है।… मैं नहीं जानता मैं क्या अनुभव कर रहा था, मैं केवल यही कह सकता हंू कि किसी मादक अवर्णनीय शक्ति ने मुझे भीतर से जकड़ लिया था।’

सौंदर्य मीमांसा के संबंध में जब मुक्तिबोध, कलाकार की ओर से व्याख्या पर बल देते हैं, तब वे हीगेल के साथ खड़े दिखाई पड़ते हैं, लेकिन जब वे यह भी मान लेते हैं कि पहले क्षण में ‘भोगत्व’ के साथ ‘दर्शकत्व’ के भी बीज होते हैं तब वे कांट को भी तरजीह दे रहे होते हैं। मुक्तिबोध के दूसरे क्षण के मुख्य तत्त्व हैं: ‘तीव्र अनुभव क्षण का अपने मूल से पृथक होकर, वैयक्तिक होते हुए भी नितांत निर्वैयक्तिक हो जाना’, ‘कल्पना द्वारा वास्तविक अनुभव को नया रूप दे देना’ और ‘दर्शक का जीवन के अर्थ खोजने की प्रक्रिया में ‘प्रसन्न भावना’ को जन्म देना’। ये तीनों तत्त्व मुक्तिबोध को कांट की उद्भावनाओं के करीब ले आते हैं। मुक्तिबोध का कहना कि आत्मा, ‘अनुभव-प्रसूत फैंटेसी’ में ‘दार्शनिक/ व्याख्यात्मक ढंग से जीवन-अर्थ नहीं खोजती, वह अपने आप ही नए-नए संकेत और नए-नए आकलन करने लगती है।’ यह स्पष्ट संकेत है कि मुक्तिबोध ‘काव्य-ढांचे’ को किसी दर्शन के सहारे आकलित करने के पक्षधर नहीं थे, ठीक ‘कांट’ की तरह, जो कला को किसी अवधारणा के अधीन करने के पक्ष में नहीं थे। तीसरे क्षण के मुख्य तत्त्वों में, फैंटेसी के शब्दबद्ध होने की प्रक्रिया, फैंटेसी का नवीन रूप धारण करना; फैंटेसी में भावात्मक उद्देश्य और संवेदनात्मक दिशा; भाषा और भाव के बीच द्वंद्व हैं। शैलिंग का ‘तीसरा सोपान’ भी शब्दबद्ध होने की स्थिति का ब्योरा देता है। ‘अंतर्वैयक्तिकता’ का प्रवेश और कलाकृति की सीमा रेखाएं खिंच जाना; ‘निजता’ और ‘वस्तु-निष्ठता’ का संश्लेषण और ‘अन्य’ तथा ‘स्व’ का द्वंद्व, ऐसे बिंदु हैं, जिनकी भाषिक अभिव्यक्ति भले अलग-अलग हो, किंतु बीज रूप में ‘साम्यता’ की छायाएं अवश्य हैं। मुक्तिबोध के पास अगर ‘संवेदनात्मक-ज्ञान’ है तो ‘कांट’ के पास ‘आनुभविक-ज्ञान’ है। अगर मुक्तिबोध के पास ‘ज्ञानात्मक-संवेदन’ है, तो ‘जोहानन फिक्ते’ के पास ‘बौद्धिक-अनुभूति’ है। ये साम्य की छायाएं होना, किसी भी रूप में मुक्तिबोध का अवमूल्यन नहीं, बल्कि उनके ज्ञान-विस्तार की, नई-खिड़की का खुलना है, जो अब तक शायद हमसे ओझल थी।

 

 

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