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तीरंदाज: वर्चस्व की सियासत

चीन सालों से अश्वमेध यज्ञ करने का संकल्प करके धीरे-धीरे अपना प्रभाव हर तरफ बढ़ा रहा था। दुनिया के हर कोने में- यूरोप, अमेरिका, अफ्रीका, एशिया और आॅस्ट्रेलिया तक में चीन ने अपना प्रभाव बढ़ाया था और आज वह सब जगह अपना वर्चस्व बना चुका है।

चीन का राष्ट्रीय ध्वज

चीन की सौ साल की मैराथन दौड़ अब खत्म ही होने वाली है। लगभग अस्सी साल पहले जब उसने इस दौड़ को अकेले दौड़ने का संकल्प लिया था, तब उसके पास ऐसा कोई सामर्थ्य नहीं था, जिसकी वजह से भरोसा हो सके कि वह दौड़ पूरी कर पाएगा। यों किसी को मालूम भी नहीं था कि उसने कोई ऐसा इरादा किया भी है। अगर मालूम भी होता तो दुनिया उसको खामखयाली कह कर मजाक में उड़ा देती, क्योंकि पिछली सदी की शुरुआत में चीन में बेहाली और भुखमरी हर तरफ व्याप्त थी। इससे कुछ साल पहले यूरोप की विभिन्न औपनिवेशिक शक्तियों ने चीन पर अपना दबदबा पूरी तरह से बना लिया था। ‘ओपियम वार’ ने बेहद पुराने सम्राज्य को पूरी तरह से नष्ट कर दिया था। हालात यहां तक पहुंच गए थे कि उसका छोटा-सा पड़ोसी देश जापान उस पर काबिज हो गया था। चीनी लोगों को हेय की दृष्टि से देखा जाता था।

चीन की सभ्यता विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है। वहां कई चक्रवर्ती राजा हुए और उनके शासन काल में हर क्षेत्र में उच्चतम उपलब्धियों की एक लंबी शृंखला इतिहास में दर्ज है। वक्त ने करवट ली थी और चीन परतंत्रता से बच नहीं पाया था। मगर 1927 में माओ के उदय से एक नई सोच और क्रांति की शुरुआत हुई। माओ ने उस साल अपने देश में कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की थी और अपनी विचारधारा को मार्क्सिस्ट-लेनिनिस्टों के साथ जोड़ा था। माओ को यकीन था कि चीन में आर्थिक विषमताएं तभी खत्म हो पाएंगी, जब किसानों और मजदूरों को अपना पूरा हक मिलेगा। ‘आॅटम हार्वेस्ट अप राइजिंग’ से चीन में क्रांति की नींव पड़ी थी।

1 अक्तूबर 1949 को माओ ने कड़े संघर्ष के बाद चीन में कम्युनिस्ट पार्टी का एकाधिकार स्थापित कर दिया और खुद पार्टी के अध्यक्ष बन गए थे। माओ ने देश बढ़ाने के लिए कई विवादास्पद कार्यक्रम चलाए थे, जिनमें 1957 का ‘ग्रेट लीप फॉरवर्ड’ के परिणाम सबसे घातक थे। चीन की अर्थव्यवस्था को कृषि प्रधान से उद्योग प्रधान बनाने की कोशिश ने देश को भयानक भुखमरी की कगार पर पहुंचा दिया था। एक आकलन के मुताबिक लगभग पांच करोड़ लोग इस दौरान भूख से मरे थे। पर कई और बुरी तरह से असफल नीतियों के बावजूद माओ और कम्युनिस्ट पार्टी धीरे-धीरे अपने छिपे हुए संकल्प पर काम करते रहे। उनका संकल्प चीन को दुनिया के देशों में वह बुलंदी देना था, जो अपने में बेनजीर हो। एक लंबी अथक और बेहद बारीकी से सोची हुई रणनीति के तहत उसे अपनी प्रभुता स्थापित करनी थी। इस नीति का पहला सूत्र छल और छलावरण था।

1950 के दशक में चीन को आर्थिक, सैन्य और औद्योगिक सहायता की जरूरत थी। चूंकि वह कम्युनिस्ट देश था, इसलिए उसका स्वाभाविक साथी रूस था। स्टालिन से माओ ने दोस्ती बढ़ाई और चीन को उसका आश्रित देश होने का यकीन दिलवा दिया था। लेकिन जैसे-जैसे रूस की मदद मिलती गई और चीन की तात्कालिक जरूरतें पूरी होती गर्इं, उसने रूस और अपनी सीमाओं को लेकर झगड़े खड़े करने शुरू कर दिए थे। पर यह काम उसने बड़ी सूझ-बूझ के साथ किया था। रूस और चीन दोनों अंतर्मुखी देश थे। उनका पश्चिमी देशो से संपर्क न के बराबर था। रूस का ‘आयरन कर्टेन’ और चीन का ‘बैम्बू कर्टेन’ किसी को ताकझांक की अनुमति नहीं देता था। ऐसी स्थिति में पश्चिमी देशों को इनमें हो रहे बदलाव की सूचना बमुश्किल मिलती थी। दो-एक जासूस जो रूस या चीन से अमेरिका और इंग्लैंड पहुंच पाते थे, इन देशों के हालत का वर्णन कर पाते थे। चीन ने अपने प्रायोजित जासूसों को अमेरिका और इंग्लैंड भेजा था, जिससे वे वहां के नीति-निर्माताओं में भ्रम फैला सकें कि कम्युनिस्ट ब्लॉक कैपिटलिस्ट ब्लॉक के खिलाफ एकजुट है। सोवियत रूस से चीन को तोड़ने की कोशिश पर आतुर पश्चिमी देशों को अपने प्रयासों को दुगना करने के लिए मजबूर करना ही इस छल का उद्देश्य था और इसमें चीन सफल भी हुआ था। 1972 में अमेरिका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन चीन को खोलने के प्रयास में बेहद उत्साहित होकर चेयरमैन माओ से मिलने
आए थे।

वास्तव में चीन की दूरगामी नीति के दो खास बिंदु हैं। पहला और सबसे अहम बिंदु है उसकी सोच, जो 1930 और 1940 के बीच पुख्ता हुई थी कि अगले सौ सालों में विश्व में संघर्ष ‘सफेद’ और ‘पीली चमड़ी’ वालों के बीच में होगा। बाकी सब नस्लें इस संघर्ष की मूकदर्शक होंगी। दूसरा बिंदु विख्यात चीनी दार्शनिक कन्फ्यूशियस का सूत्र था- ‘आकाश में दो सूरज और पृथ्वी पर दो राजा नहीं हो सकते हैं।’ यानी अमेरिका को चीन के सामने कोर्निश करवानी थी। इन दोनों बिंदुओ को साथ मिला कर अगर समझा जाए तो साफ हो जाता है कि चीन सालों से अश्वमेध यज्ञ करने का संकल्प करके धीरे-धीरे अपना प्रभाव हर तरफ बढ़ा रहा था। दुनिया के हर कोने में, यूरोप, अमेरिका, अफ्रीका, एशिया और आॅस्ट्रेलिया तक में चीन ने अपना प्रभाव बढ़ाया था और आज वह सब जगह अपना वर्चस्व कायम कर चुका है।

चीन के छलावरण की नीति का सबसे अच्छा उदाहरण उसका ‘वर्ल्ड ट्रेड आॅर्गनाइजेशन’ में 2001 में शामिल होना है। उसने अपना विशाल बाजार दिखा कर पश्चिमी देशों को इतना ललचा दिया था कि वे उसे डब्ल्यूटीओ में शामिल करने के लिए हर शर्त मानने को तैयार हो गए थे। चीन ने इस संस्था में शामिल होते ही इसे ऐसा दूहा कि महज अठारह सालों में चीन की प्रति व्यक्ति आय अमेरिका जैसे पुराने विकसित देशों के करीब पहुंच गई है। आज अकेले चीन के उद्योग और निर्यात के बूते पर अंतरराष्ट्रीय व्यापार होता है। पश्चिमी देश पिछड़ गए हैं और उनके अंदरूनी आर्थिक हालात खराब होते जा रहे हैं। चीन ने उन्हें खोखला कर दिया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की चीन पर खीझ तेजी से बदलते हुए परिदृश्य का नतीजा है। ‘सफेद चमड़ी’ वाले ‘पीली चमड़ी’ वालों की गिरफ्त में पूरी तरह से आ गए हैं। सौ साल की मैराथन दौड़ समाप्ति की ओर है। हां, चीन में लोकतंत्र नहीं है और न आगे कभी होगा। वहां के लोगों के पास नागरिक अधिकार भी नहीं हैं और जीवनशैली के हर पहलू पर पार्टी का बर्बर अंकुश है। कोई भी समाज अपने मौलिक अधिकारों को ताक पर रख कर तरक्की करना पसंद नहीं करेगा, पर चीन के नेतृत्व के लिए यह सब दीगर सवाल है। उसने चीन को दुनिया में सबसे शक्तिशाली राष्ट्र बनाने की राष्ट्रवादी मुहिम उठाई थी और उसमें वह कामयाब हो गया है।

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