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वक्त की नब्ज: कमजोर पड़ता भरोसा

हो सकता है कि किसानों की चिंताएं बेबुनियाद हों। हो सकता है, नई निजी मंडियों से उनको लाभ हो, लेकिन अगर उनको मोदी सरकार पर विश्वास नहीं है तो दोष किसका है? क्या यह सच नहीं है कि अगर किसानों पर झूठे आरोप लगाने के बदले मोदी सरकर ने शुरू से कोशिश की होती ईमानदारी से उनकी शिकायतें सुनने की, तो यह नौबत न आती?

Jaskaur Meena on Farmers Protest, BJP on Farmers Protest, BJP on Farm Laws, Govind Singh Dotasra on BJP, Govind Singh Dotasra on Jaskaur Meena, jansattaबीजेपी की सांसद जसकौर मीणा ने क़ानूनों का विरोध कर रहे किसानों की तुलना खालिस्तानियों से की है। (file)

अगले सप्ताह गणतंत्र दिवस का जश्न मनाया जाएगा, उस परेड के साथ जो हर छब्बीस जनवरी को होती आई है पिछले इकहत्तर सालों से। इस बार भी हर साल की तरह इसको राजपथ पहुंच कर देख सकेंगे सिर्फ राजनेता, आला सरकारी अफसर और उनके दोस्त, रिश्तेदार और मेहमान। दिल्ली के आम नागरिक राजपथ के नजदीक भी नहीं पहुंच सकेंगे, क्योंकि उस दिन सुरक्षा इतनी कड़ी रहती है। लेकिन एक समय था जब छब्बीस जनवरी की परेड देखने कोई भी जा सकता था।

बचपन में हम बहुत सुबह उठ कर पहुंच जाते थे राजपथ, ताकि हमको अच्छी जगह मिल सके उन लकड़ी के हरे रंग की बेंचों पर, जो राजपथ के दोनों तरफ लगाई जाती थीं। अक्सर बारिश और ठंड होती थी, सो हम साथ लेकर जाते थे थर्मस में भर कर गरम चाय और डिब्बों में आलू के परांठे। तकरीबन इसी तरह का बंदोबस्त करके आया करते थे दिल्ली के आम नागरिक। यानी वह जनता का जश्न होता था, जो अब नहीं है।

इस बार लेकिन जनता ने अपना अलग परेड करने का फैसला किया है, जिसमें होंगे किसान और उनके परिवार ट्रैक्टरों पर सवार होकर। कई हजार ट्रैक्टर चल पड़े हैं पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के गांवों से इस परेड में भाग लेने।

हो सकता है कि इस परेड को दिल्ली के अंदर आने से पहले ही रोका जाएगा सुरक्षा का हवाला देकर, लेकिन जो संदेश किसान देना चाहते हैं इस परेड द्वारा, उस संदेश को प्रधानमंत्री अनसुना न करें तो उनका भला होगा। संदेश किसानों का यही है कि सरकार अपना अहंकार त्याग कर उनकी बात सुनने को तैयार जब तक नहीं होगी, तब तक किसान दिल्ली की सीमाओं पर राजधानी का घेरा डाल कर बैठे रहेंगे।

यह संदेश प्रधानमंत्री तक अगर नहीं पहुंचा है अभी तक, तो इसलिए कि उनके मंत्री शायद वास्तव में मानते हैं कि किसानों का विरोध निराधार है और यही बात वे पत्रकारों से इतनी बार कह चुके हैं कि मीडिया मोदी सरकार का पूरा समर्थन करती आई है। इस हद तक कि कई जानेमाने पत्रकार और टीवी एंकर कह चुके हैं खुल कर कि किसानों का नेतृत्व कर रहे हैं खालिस्तानी और देशद्रोही किस्म के लोग।

यथार्थ यह है कि जबसे मोदी दूसरी बार प्रधानमंत्री बने हैं, उनकी सरकार में इतना अहंकार दिखने लगा है कि जब भी जनता की तरफ से किसी तरह का विरोध सामने आता है, तो इस विरोध को मोदी को बदनाम करने का षड्यंत्र माना जाता है।

यहां तक कि मोदी के समर्थक और भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता कह चुके हैं कई बार कि किसानों का विरोध शाहीनबाग की दूसरी कड़ी है, और कुछ नहीं। सो, ऐसा लगने लगा है कि प्रधानमंत्री निवास तक यह संदेश पहुंचा ही नहीं अभी तक कि शाहीनबाग वाला विरोध प्रदर्शन भी असली था और किसानों का विरोध भी असली है।

शाहीनबाग में रात-दिन बैठी रहीं मुसलिम महिलाएं कई हफ्तों तक तो इसलिए कि उनको नागरिकता कानून में संशोधन से असली चिंता थी कि उनकी नागरिकता को खतरा रहेगा, अगर उनके पास उसको साबित करने के लिए दस्तावेज न हों।

किसानों का विरोध चल रहा है दिल्ली कि सीमाओं पर पिछले दो महीनों से, क्योंकि किसानों को असली चिंता है कि जो तीन कृषि कानून मोदी सरकार लाई है अजीब जल्दबाजी दिखा कर, उनके लागू होने के बाद वर्तमान सरकारी मंडियों की व्यवस्था टूट जाएगी और उनको अपना उत्पाद बेचना होगा उसी दाम पर, जो व्यापारी तय करेंगे निजी मंडियों में। ऐसा हुआ है बिहार में, जबसे उस राज्य में बिल्कुल इसी किस्म के कानून लाए गए हैें।

हो सकता है कि किसानों की चिंताएं बेबुनियाद हों। हो सकता है, नई निजी मंडियों से उनको लाभ हो, लेकिन अगर उनको मोदी सरकार पर विश्वास नहीं है तो दोष किसका है? क्या यह सच नहीं है कि अगर किसानों पर झूठे आरोप लगाने के बदले मोदी सरकर ने शुरू से कोशिश की होती ईमानदारी से उनकी शिकायतें सुनने की, तो यह नौबत न आती? क्या यह सच नहीं है कि किसानों को बदनाम करने की साजिश उनके अपने मंत्रियों ने रची है? इन सवालों के जवाब जो भी हों, हकीकत यह है कि मोदी सरकार पर जो विश्वास था जनता का, वह टूटने लगा है।

पिछले सप्ताह इंडिया टुडे ने एक सर्वेक्षण प्रकाशित किया, जिसके मुताबिक मोदी की लोकप्रियता आज भी इतनी है कि तिहत्तर प्रतिशत लोग मानते हैं कि उन्होंने कोरोना महामारी का काल समझदारी और सफलता के साथ गुजारा है। सर्वेक्षण करने वाले शायद उन प्रवासी मजदूरों के पास नहीं पहुंचे, जिनको कोसों पैदल चलना पड़ा अपने ग्रामीण घरों तक, क्योंकि मोदी के पहले लॉकडाउन में अचानक बंद कर दी गई थीं रेल और बस सेवाएं।

शायद सर्वेक्षण करने वाले उन किसानों के पास नहीं गए, जो आज भी ठंड में सड़कों पर धरना दे रहे हैं। शायद उन मुसलिम मर्दों से उन्होंने बात करने की तकलीफ नहीं की, जिनको जेल में डाल दिया जाता है सिर्फ इसलिए कि उन्होंने किसी हिंदू लड़की से शादी करने की गलती की है।

सर्वेक्षण जो भी बताते हों, पर एक बात जमीनी तौर पर दिखने लगी है कि आम लोगों से नरेंद्र मोदी का जो रिश्ता था उनके पहले कार्यकाल में, वह आज नहीं रहा है। मोदी ने वादा तो किया था ‘सबका साथ, सबका विश्वास’ हासिल करने का, लेकिन विश्वास का पुल इतना कमजोर हो गया है कि मोदी का असली विपक्ष अब संसद में नहीं, देश की सड़कों पर नजर आने लगा है। लोकतंत्र में जब ऐसा होने लगता है तो असली नुकसान लोगों का नहीं, शासकों का होता है।

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