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भाषा संस्कृति: भाषाई पितृसत्ता

हिंदी में संज्ञा पदों के नाम-निर्धारण की पद्धति का अगर विश्लेषण किया जाए, तो एक बात बहुत स्पष्ट है। अगर कोई वस्तु कमजोर, कोमल, लचीली, तुलनात्मक रूप से छोटी होगी, तो वह स्त्रीलिंग होगी अन्यथा पुल्लिंग।

Promotionहिंदी को आगे बढ़ाने की आवश्‍यकता। फाइल फोटो।

भाषा मूलत: एक सामाजिक उत्पाद है। समाज के साथ ही इसका विकास हुआ है। बिना वाचिक सामूहिकता के किसी भाषा के भविष्य की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। समाज जैसे-जैसे भौतिक संसाधनों से घिरता जा रहा है वैसे-वैसे भाषा में नई शब्दावली बढ़ती जाती है और संदर्भों से बाहर के शब्दकोशों तक सीमित होते जाते हैं। वैसे एक जड़ समाज में भाषा भी अपनी नियत सीमा में कार्यशील रहती है, लेकिन कुएं के पानी जैसे। भाषा और समाज अलग-अलग एक स्वायत्त व्यवस्था होने के बावजूद परस्पर अन्योन्याश्रयी होते हैं। इसलिए सामाजिक व्यवस्था को भाषा के माध्यम से और भाषिक व्यवस्था को समाज के माध्यम से समझा जा सकता है।

परंपराएं, मिथक, लोकोक्तियां, जीवन के वाक्-व्यवहार जैसे भाषिक दैनंदिनी में समाज का मूल चरित्र पढ़ा जा सकता है। यद्यपि भाषा कैसे सत्ताई आवरण में आकर समाज के वंचित-शोषित तबके के शोषण के माध्यम से और निम्नतर बनाने में एक साधन का काम करने लगती है, यह आसानी से पकड़ में नहीं आता। धर्म, जाति, जेंडर, स्थान आदि के आधार पर ऐसी अधीनस्थताएं बनती रहती हैं। ऐसे में जिस पितृसत्तात्मक समाज में हम रह रहे हैं, उसका प्रभाव समाज की भाषा पर न पड़े, यह संभव नहीं है।

अंग्रेजी में ‘चेयरपरसन’ शब्द का उभार बड़े नारीवादी आंदोलनों के बाद हुआ है, अन्यथा महिला और पुरुष सभी ‘चेयरमैन’ ही होते थे। यही हाल हिंदी में ‘अध्यक्षा’ शब्द के साथ रहा है। ‘चेयरपरसन’ तो फिर भी व्यवहार में आ गया है, लेकिन ‘अध्यक्षा’ अभी स्वाभाविक प्रयोग का रूप नहीं बन पाया है। भाषा व्यक्ति के साथ-साथ समाज को भी अभिव्यक्त करती रहती है।

इसलिए हिंदी समाज भी गाहे-बगाहे भाषा की परिधि में बेपर्द होता रहता है। ऐसा एक प्रसंग तब अधिक चर्चित हुआ था, जब प्रतिभा देवी सिंह पाटील के रूप में किसी महिला ने ‘राष्ट्रपति’ का पद ग्रहण किया था। आज भी हमारी शब्दावली की क्षमता यहां आकर कमतर दिखने लगती है और समाज का पितृसत्ताई चेहरा सामने आ जाता है, क्योंकि हमने संभवत: यह सोचा ही नहीं था कि भारतीय गणतंत्र के शीर्ष पर कोई महिला भी बैठ सकती है और आज भी ‘राष्ट्रपति’ के सापेक्ष हिंदी में स्त्रीलिंग शब्द व्यवहार में नहीं है।

ऐसे सैकड़ों उदाहरण मिल जाएंगे, जहां स्त्रियों को सिर्फ भाषिक प्रतीकों के माध्यम से द्वितीयक होना पड़ता है। ‘पुरुषार्थ’ शब्द पितृसत्ता के पल्लवन में बड़ा रूपक है, इस बोध के लिए कोई भी स्त्रीवाची शब्द नहीं है। इसके विपरीत ‘स्त्रैण चरित्र’ कह कर हम किसी बड़े से बड़े ‘पुरुषार्थी’ का भी मान-मर्दन कर सकते रहे हैं।

वह तो भला हो महारानी दुर्गावती और रानी लक्ष्मीबाई जैसी इतिहास की कुछ संघर्षशील महिलाओं का, वरना हिंदी का ‘वीरांगना’ शब्द भी हमारी शब्द-राशि में नहीं होता और हमारा आधुनिक इतिहास सिर्फ ‘वीरों’ से भरा होता। हालांकि ‘वीरांगना’ शब्द का मूल भी ‘वीर’ ही है।

फिर वीरांगना के स्वतंत्र प्रयोग के बाहुल्य की स्वीकृति मिली हुई है, जो संतोष की बात है। इसके विपरीत भारत के तिब्बती-बर्मी भाषा परिवार की एक महत्त्वपूर्ण भाषा ‘खासी’ का स्वभाव पूरी तरह से मातृसत्तात्मक है, क्योंकि खासी समाज भी स्वाभाविक रूप से मातृसत्तात्मक है। इसका प्रभाव भाषा पर पड़ना अवश्यंभावी है। यहां तक कि स्वयं ‘खासी’ शब्द का अर्थ ‘माता से उत्पन्न’ होता है। इसमें ‘खा’ का अर्थ होता है ‘पैदा होना’ और ‘सी’ का तात्पर्य ‘प्राचीन माता’ से है।

हिंदी में संज्ञा पदों के नाम-निर्धारण की पद्धति का अगर विश्लेषण किया जाए, तो एक बात बहुत स्पष्ट है। अगर कोई वस्तु कमजोर, कोमल, लचीली, तुलनात्मक रूप से छोटी होगी, तो वह स्त्रीलिंग होगी अन्यथा पुल्लिंग। खेत-क्यारी, पेड़-डाली, फूल-कली, रास्ता-गली, दरवाजा-खिड़की, बिस्तर-तकिया, चाट-चटाई आदि।

वहीं दूसरी तरफ भाषा संरचना में जब कोई वंचित वर्ग का पुरुष होता है, तो शब्द पुल्लिंग भले हो, उसका अर्थबोध दूसरा होता है, जिसके मूल में सदियों की सोच और उसका विस्तार होता है।

इसी क्रम में समाज में व्याप्त गालियों को देखा जा सकता है, क्योंकि समाज के औपचारिक और अनौपचारिक प्रसंगों में प्रयुक्त इन गालियों मे से अधिकांश की अंतिम शिकार महिलाएं ही होती हैं। हालांकि लोक-व्यवहार में शादी-विवाह जैसे शुभ अवसरों पर गालियों को गीत में पिरो कर गाया जाता है, जिसे शुभ भी माना जाता है। लेकिन इन गालियों के अर्थ को परखा जाएगा, तो उसमें शादी में स्त्री-पक्ष और वधू के सगे-संबंधियों को नीचा दिखाने का उपक्रम होता है।

गालियों के गायन के चलन में यह संभव हो कि कुछ समय तक उसका शिकार पुरुष हो, लेकिन वह पुरुष वधू पक्ष का ही होगा, यानी संबंध जुड़ने के क्रम में जो निर्णायक होता है, वह कोई महिला ही होती है। हालांकि यह भी स्वीकार करना होगा कि सामान्य व्यवहार में गालियां हाशिए के समाजों में ही अधिक व्यहृत होती हैं, लेकिन इससे सबसे बड़ा तथ्य उभर कर सामने आता है कि समाज में महिलाओं का स्थान सबसे अंतिम पायदान पर होता है, क्योंकि जो तबका उच्च वर्ग से शोषित है, वह महिलाओं के शोषण में शामिल होता है। इसलिए महिला समाज की सबसे शोषित वर्ग है।

भाषा का वर्गीय चरित्र होता है, जिसमें सत्ता की सापेक्षता एक अनिवार्य तत्त्व होता है। जिसे प्रसिद्ध समाजभाषा विज्ञानी बेसिल बर्नस्टीन ने 1958 में ही यह सिद्ध किया था। जिसमें सीमित कोड और विस्तृत कोड के रूप में भाषिक प्रयोग तथा संरचना के धरातल पर स्पष्ट अंतर होता है। जिसका तात्पर्य यह है कि गरीब लोगों का पूरा जीवन सीमित शब्दावली और सीमित संरचनात्मक प्रयोगों में व्यतीत हो जाता है। भाषिक विकल्पन और शैली विभेद आदि के माध्यम से समाज के विभिन्न रूप दिखते हैं, जिसमें शोषक और शोषित के भेद खोजे जा सकते हैं।

शब्द महज एक संरचना होते हैं, जो यादृच्छिकता से परंपरित होते हुए प्रयोग के स्तर पर आगे बढ़ते हैं, लेकिन उसी शब्द का अर्थ समाज की मानसिक प्रक्रिया से आगे बढ़ता है। वंचितों-शोषितों के प्रति जो हमारी सोच होती है, उसी को शब्द स्वरूप देते हैं।

ऐसे ही शब्द मिलकर एक भाषा गढ़ते हैं। लेकिन इसका दूसरा रूप भी है, जिसमें किसी भाषा के अपने स्वरूप ग्रहण में समाज के अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है, क्योंकि थोक में शब्दों का विकास इसी बहुसंख्यक समाज से होता है, लेकिन अंत में सत्तावान वर्ग उस भाषा को अपने संस्कार में ढालता है और इसी भाषा को उस भाषा के मुख्य रूप में मान्यता मिलती है।

अगर हम समाज में नए बदलाव चाहते हैं, तो उसकी शुरुआत भाषा से करनी पड़ेगी। लेकिन यह दुखद है कि हिंदी के दलित और स्त्री विमर्श ने भाषा की इस महत्ता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, जबकि सुजेन रूमाइन का कहना है कि ‘इस पुरुष निर्मित विश्व-दृष्टि में महिलाओं को कुटिल और निम्नतर रूप में देखा जाता है, जिसमें भाषा इस पुरुष आधिपत्य को चुनौती देने और बदलने की कुंजी रखती है।’

जिस भाषा को प्रभुवर्ग ने वंचित तबकों के शोषण का एक हथियार बना रखा है, उसी भाषा के माध्यम से मुक्ति का मार्ग भी खोजा जा सकता है, बशर्ते दिन-प्रतिदिन के व्यवहार को सजग भाषिक अभिव्यक्तियों से सजाया और समाज को ऊंच-नीच से अलग, समान नजरिए से देखा जाए।

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