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दूसरी नजर: सही शब्द है विश्वासघात

इस स्तंभ का मकसद किसी पर आरोप लगाना या अपमानित करना नहीं है। मकसद सीधा-सीधा यह सवाल पूछना है कि क्या सरकार के संवेदनशील और संरक्षित फैसलों को किसी ऐसे व्यक्ति के साथ साझा किया गया था, जो निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा नहीं था? साथ ही एक और सवाल कि क्या इनमें से कुछ फैसले ‘सरकारी गोपनीयता’ के तहत आते हैं?

J&K में LoC के पास गश्त करते भारतीय सेना के जवान। (Express photo by Shuaib Masoodi)

टीवी चैनल का नाम महत्त्वपूर्ण नहीं है। पत्रकार का नाम भी अहमियत नहीं रखता। चैनल के खिलाफ कुछ अन्य मामलों में लगे इल्जाम आज के स्तंभ के संदर्भ में प्रासंगिक नहीं हैं। जो प्रासंगिक और महत्त्वपूर्ण है वह निर्णय लेने की प्रक्रिया और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित सरकार में सर्वोच्च स्तर पर किए गए निर्णय हैं।

इस स्तंभ का मकसद किसी पर आरोप लगाना या अपमानित करना नहीं है। मकसद सीधा-सीधा यह सवाल पूछना है कि क्या सरकार के संवेदनशील और संरक्षित फैसलों को किसी ऐसे व्यक्ति के साथ साझा किया गया था, जो निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा नहीं था? साथ ही एक और सवाल कि क्या इनमें से कुछ फैसले ‘सरकारी गोपनीयता’ के तहत आते हैं?

जुकरबर्ग के लिए बुरी खबर
ये मामले बाहर कैसे आए, यह एक रहस्य है। माना जा रहा है कि ये वाट्सऐप पर हुई ‘चैट’ (बातचीत) रहे होंगे। वाट्सऐप के मालिकों का अरसे से दावा रहा है कि वाट्सऐप पर सारी बातचीत शुरू से अंत तक पूरी तरह से कूट भाषा में रहती है और कोई भी इन तक पहुंच नहीं सकता। यह दावा भी किया गया था कि मालिक बातचीतों का कोई रिकार्ड नहीं रखते हैं और इन्हें किसी से साझा भी नहीं कर सकते हैं।

मुझे नहीं मालूम कि ये दावे सही हैं कि नहीं, लेकिन संदेह बढ़ रहा है। क्या दो लोगों के बीच हुई बातचीत में सेंध लगाई जा सकती है, जैसे कि कोई चोरी-छिपे घुसता है और चोरी कर लेता है? मुझे इस सवाल का जवाब भी पता नहीं है, लेकिन यह संदेह बढ़ता जा रहा है कि ऐसी बातचीत में सेंध लगाई जा सकती है।

फेसबुक, इंस्टाग्राम और वाट्सऐप के मालिक और दुनिया के सबसे अमीरों में से एक मार्क जुकरबर्ग के लिए यह सब बुरी खबर है। जो भी हो, दो लोगों के बीच खास तरह का संवाद सार्वजनिक हो गया है। जहां तक मेरी जानकारी है कि प्रकाशित सामग्री (प्रिंट में और सोशल मीडिया पर) से संबंधित व्यक्तियों ने इनकार भी नहीं किया है। जहां तक मेरे स्तंभ का संबंध है, अगर वे इनकार करते हैं तो मामला खत्म हो जाता है। और नहीं करते हैं तो निश्चित तौर पर कुछ सवाल खड़े होते हैं।

सरकारी राज
पुलवामा में 14 फरवरी 2019 को भारतीय सैनिकों के काफिले पर हमला हुआ था। ‘पत्रकार’ व ‘अन्य’ के बीच 23 फरवरी को बातचीत हुई:

23 फरवरी 2019
10.31 (रात) : पत्रकार: एक अन्य मामले में कुछ बड़ा होने वाला है।
10.33 (रात) : अन्य: मुझे यकीन है और मैं आपकी सफलता की कामना करता हूं
10.34 (रात) : अन्य: आपकी कामयाबी के लिए।
10.36 (रात) : पत्रकार: नहीं सर, पाकिस्तान। इस बार कुछ बड़ा किया जाएगा।
10.37 (रात) : अन्य: इस बार बड़े शख्स के लिए यह अच्छा रहेगा।
तब तो वे चुनावों में गजब कर देंगे??
हमला? या और बड़ा
10.40 (रात) : पत्रकार: सामान्य हमले से कहीं बड़ा हमला। और उसी समय कश्मीर
पर भी कुछ बड़ा (होगा)। पाकिस्तान पर हमले को लेकर
सरकार को पक्का भरोसा है कि लोग उससे खुश होंगे।
बिल्कुल उन्हीं शब्दों का उपयोग किया गया है, हालांकि यह अनुवाद है।

पुलवामा का हमला आतंकी कार्रवाई थी, जिसमें चालीस जवान मारे गए थे। रक्षा बलों में भारी गुस्सा था। ऐसा माना गया कि इस हमले के लिए पाकिस्तान ने हमलावर को भर्ती कर उसे प्रशिक्षित किया और हमले को अंजाम दिया। जवाबी कार्रवाई होनी ही थी। ‘बातचीत’ 23 फरवरी को हुई। तीन दिन बाद 26 फरवरी को भारतीय वायुसेना के विमानों ने पाकिस्तान में बालाकोट पर हमला बोला।

उन ‘शब्दों’ को किसने सुना, इससे मेरा कोई संबंध नहीं है। मैं मानता हूं कि वह व्यक्ति भाग्यशाली था, वह सही वक्त पर सही जगह पर था! मेरा सरोकार तो उससे है जिसने ये शब्द कहे। एक गैर-सरकारी व्यक्ति की मौजूदगी में ये शब्द क्यों कहे गए? क्या संरक्षित बातचीत को साझा करने के इरादे से ये शब्द कहे गए थे? जब व्यापक रूप से यह अपेक्षित था कि रक्षा बल पुलवामा हमले का जवाब देंगे, तो किसी ने भी भावी जवाबी कार्रवाई को लेकर ‘सही शब्दों’ का इस्तेमाल करने की कल्पना नहीं की होगी। जाहिर है, किसी ने संवेदनशील और संरक्षित सूचना को साझा किया। कौन था वह व्यक्ति?

कुछ फैसले गोपनीय होते हैं, कुछ राज होते हैं, कुछ अति गंभीर राज होते हैं और कुछ संबंधित व्यक्ति के लिए होते हैं। पाकिस्तान में किसी लक्ष्य पर जवाबी हमले का फैसला सिर्फ संबंधित व्यक्ति की जानकारी के लिए होगा। मुझे पक्का भरोसा है कि इस फैसले को लेने की प्रक्रिया में सिर्फ प्रधानमंत्री, रक्षामंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, थल और वायु सेना प्रमुख और पश्चिमी वायु कमान के कमांडर रहे होंगे।

यहां तक कि हमला करने वाले पायलटों को भी सिर्फ कुछ घंटे पहले इस बारे में बताया गया होगा और हमला करने तक उन्हें अलग रखा गया होगा। आप अपने नतीजे निकाल सकते हैं कि किसने ‘सही शब्दों’ का इस्तेमाल किया और संरक्षित सूचनाओं को साझा किया।

मेरी चिंता यह है कि अगर किसी व्यक्ति के साथ सूचना साझा की गई (जो संभवत स्रोत से अनजान था), कहीं वह पाकिस्तान का जासूस तो नहीं रहा होगा? मेरी दूसरी चिंता बातचीत में शामिल अन्य व्यक्ति को लेकर है। उसकी सुरक्षा का स्तर क्या है और क्या उसने किसी के साथ कोई सूचना साझा की?

मौत का इंतजार
ऐसी ही बातचीत से स्वर्गीय वित्तमंत्री अरुण जेटली (ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें) की प्रतिष्ठा को भी गहरा धक्का पहुंचा है।
10 अप्रैल 2019
12.45 (दोपहर): अन्य: जेटली की यह सबसे बड़ी नाकामी है
पत्रकार: मैं इससे पूरी तरह सहमत हूं
यह बेहद दुख की बात की बात है कि एक बीमार व्यक्ति की मौत का इंतजार किया जा रहा था-
19 अगस्त 2019
10.08 (सुबह) : पत्रकार: जेटली खींच रहा है। ऐसे में क्या करें, पीएमओ को समझ
नहीं आ रहा। पीएम बुधवार को फ्रांस रवाना हो रहे हैं
10.09 (सुबह) : अन्य: तो क्या वह अभी तक मरा नहीं?
10.55 (सुबह) : पत्रकार: उसे बचाए रखा जा रहा है। इस हफ्ते दिल्ली में हुई मेरी
बैठकों में एक इसी कारण आगे बढ़ा दी गई।
मुझे अपने देश, अपनी सशस्त्र सेना और उनके राज के लिए अफसोस है। यही नहीं, अरुण जेटली और उनके परिवार के लिए भी, जिन्होंने 1975 से निष्ठापूर्वक भाजपा (और इससे पहले जनसंघ) की सेवा की।

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