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जवाबदेही किसकी है?

सच तो यह है कि भारतीय जनता पार्टी खुद बंगाल की सभ्यता नहीं समझ पाई है। इस राज्य के इतिहास में हिंदुओं और मुसलमानों को आपस में लड़ा कर चुनाव नहीं जीते जाते हैं।

भारत निर्वाचन आयोग।

पश्चिम बंगाल के लिए प्रधानमंत्री ने भारत को दांव पर लगा दिया था? क्या यही मुख्य कारण है कि आज देश का इतना बुरा हाल है? जानते थे प्रधानमंत्री और उनके आला सलाहकार कि महाराष्ट्र में कोरोना का एक नया रूप और नई लहर आ पहुंची थी फरवरी में ही, लेकिन इसके बावजूद चुनाव आयोग ने आठ दौर में करवाने का निर्णय लिया। विपक्ष ने जब कम समय में कराने की गुहार लगाई, तो उनकी शिकायत को अनदेखा कर दिया गया। 17 अप्रैल को मालूम हुआ कि देश में ढाई लाख तक पहुंच गए थे कोरोना के मामले और फिर से चुनाव अभियान को कम करने की गुहार लगाई तृणमूल कांग्रेस के नेताओं ने। लेकिन गृहमंत्री ने टीवी पर दिए अपने हर इंटरव्यू में मुस्करा कर कहा कि महामारी अगर चुनाव प्रचार की वजह से फैल रही है, तो ऐसा क्यों है कि महाराष्ट्र में फैल रही है, जहां कोई चुनाव नहीं हो रहे हैं। आगे यह भी कहा उन्होंने मुस्कुरा कर कि ‘दीदी’ हार रही हैं, इसलिए ऐसा कह रही हैं।

विश्वास इतना था गृहमंत्री को अपनी जीत पर कि बार-बार कहते रहे कि भारतीय जनता पार्टी ‘दो सौ पार’ आसानी से कर पाएगी। इतने में कोरोना की दूसरी लहर दिल्ली ऐसे पहुंची कि लोग अस्पतालों के आइसीयू में आॅक्सीजन न मिलने से दम तोड़ रहे थे, अस्पतालों के बाहर लोग बेड न मिलने के कारण अपने बीमार परिजनों को जमीन पर लिटा कर किसी न किसी तरह इलाज कर रहे थे और श्मशानों में लगने लगी थीं शवों कि कतारें। क्या सोच रहे थे प्रधानमंत्री, जब उन्होंने बंगाल जीतने के लिए देश को अपने हाल पर छोड़ दिया था? क्या सोच रहे थे गृहमंत्री, जिनके मंत्रालय के हाथों में होती है देश की बागडोर गंभीर आपदा के समय? कह नहीं सकते हैं, इसलिए कि गृहमंत्री दिखे ही नहीं हैं बंगाल के परिणाम आने के बाद। रही बात प्रधानमंत्री की, तो वे अब अपनी आला स्तर के भेंटें करते हैं वर्चुअल तरीके से।

देश के इन दोनों सबसे ताकतवर राजनेताओं की तरफ से जो बोल रहे हैं वे हैं भारतीय जनता पार्टी की सोशल मीडिया पर ट्रोल सेना और मोदी के अंधभक्त। उनकी भाषा अब भी वही है जो पहले थी। जिन पत्रकारों ने अस्पतालों और श्मशानों का हाल दिखाने की कोशिश की है, उनको ‘गिद्ध’ कहा जा रहा है और गंदी-गंदी गालियां दी जा रही हैं। मेरी ट्विटर पर झड़प हुई भारत सरकार के एक आला अधिकारी की पत्नी के साथ, जिसमें श्रीमतीजी ने मुझ पर कई सारे झूठे आरोप लगाने के बाद सुझाव दिया कि किसी मानसिक चिकित्सक के पास मुझे जाना चाहिए।

इतनी बुरी तरह हारने के बाद अक्सर राजनीतिक दल थोड़ी विनम्रता दिखाते हैं। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने इसका उल्टा किया। नड््डा साहब बंगाल पहुंचे इस बहाने कि उनके कार्यकर्ताओं को तृणमूल कांग्रेस के लोग जान से मार रहे हैं। तब तक भारतीय जनता पार्टी की ट्रोल सेना ने जलते हुए घरों और हिंसक भीड़ों की कई झूठी तस्वीरें सोशल मीडिया पर डाल दी थीं। नड्डा साहब ने पीड़ित परिवारों से अफसोस करने के बाद पत्रकारों से भेंट की, जिसमें उन्होंने कहा अहंकारी ढंग से, कि इस हिंसा के पीछे ममता दीदी का हाथ है। आगे कहा कि इस तरह की हिंसा न होती अगर ममता बंगाल की सभ्यता को समझ पातीं।

सच तो यह है कि भारतीय जनता पार्टी खुद बंगाल की सभ्यता नहीं समझ पाई है। इस राज्य के इतिहास में हिंदुओं और मुसलमानों को आपस में लड़ा कर चुनाव नहीं जीते जाते हैं। उनके सामने हिंदू राष्ट्र का सपना ‘सोनार बांग्ला’ में छिपा कर प्रचार किया था प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और योगी आदित्यनाथ ने। जय श्रीराम का नारा हथियार बना कर इस्तेमाल किया गया था और योगीजी ने तो यहां तक कह दिया कि उनकी सरकार जब बनेगी तो रोमियो स्क्वॉड बनेंगे बंगाल में।

इनको जवाब पिछले हफ्ते तृणमूल सांसद महुआ मोइत्रा ने दिया न्यूयॉर्क टाइम्स के अपने लेख में। याद दिलाया कि बंगाल की सभ्यता में वे सारी चीजें हैं, जो भारतीय जनता पार्टी के वर्तमान नेता महापाप मानते हैं। महुआ जी ने याद दिलाया कि बंगाली प्यार करते हैं किसी को पूछे बिना और न ही किसी को अधिकार देते हैं खाने-पीने पर प्रतिबंध लगाने का। इस लेख में उन्होंने कहा कि हम सिनेमा भी जाते हैं, शराब भी पीते हैं और हर रविवार गोश्त खाना नहीं भूलते हैं। यह भी लिखा इस महिला सांसद ने कि हम महिलाओं का अपमान नहीं बर्दाश्त करते हैं, सो जब प्रधानमंत्री ने ‘दीदी ओ दीदी’ कह कर बंगाल की महिला मुख्यमंत्री का मजाक उड़ाया, मर्द बेशक हंस दिए होंगे उनकी सभाओं में, लेकिन महिलाओं को बुरा लगा। सो, बहुत बड़ी तादाद में महिलाओं का वोट उस ‘दीदी ओ दीदी’ को गया।

अपना सारा समय बंगाल को देकर मोदी और अमित शाह ने देश के हाल पर इतनी लापरवाही दिखाई है कि अब ‘आत्मनिर्भरता’ को कूड़ेदान में फेंक कर प्रधानमंत्री विदेशों से दवाइयां, टीके और आॅक्सीजन मंगवाने पर मजबूर हैं। भारत सरकार के आला अधिकारी गिड़गिड़ा रहे हैं विदेशी राजनेताओं के सामने यह कह कर कि ये महामारी वैश्विक समस्या है और भारत में अगर इस तरह फैलती रही और मौतों का आंकड़ा बढ़ता रहा तो सारे विश्व को नुकसान हो सकता है। कई देशों ने अब भारतीय नागरिकों के लिए अपने दरवाजे बंद कर दिए हैं। हमारे विदेश मंत्री लंदन पहुंचे जी-7 के मंत्रियों के सम्मेलन में भाग लेने, तो वहां पता लगा कि उनके दो अफसरों के संक्रमित पाए जाने के बाद उनको सम्मेलन को वर्चुअल तरीके से संबोधित करना पड़ा। जवाबदेही किसकी है भारत को इस हाल में लाने की? जवाब दें प्रधानमंत्री जी?

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