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हकीकत की अनदेखी

प्रधानमंत्री ने कोरोना के पहले दौर में सारा श्रेय लिया था आसानी से इस महामारी को हराने का, लेकिन जब उन्होंने देखा कि इस बार विजयी होना इतना आसान नहीं होगा, तो फौरन राज्य सरकारों को कह दिया कि टीकाकरण अब उनकी जिम्मेवारी है। अचानक राज्य सरकारों को यह जिम्मेदारी देकर खुद तो बच गए हैं प्रधानमंत्री, लेकिन देश को कौन बचाएगा और कैसे?

बंगाल हिंसा पर फूट-फूट कर रोने लगीं एक्ट्रेस पायल रोहतगी, प्रधानमंत्री को सुनाई खरी-खोटी। फोटो- सोशल मीडिया

संकट की इस घड़ी में प्रधानमंत्री तकरीबन पूरी तरह अपने ‘वर्चुअल’ रूप में ही रहते हैं, लेकिन उनके संदेश हम तक पहुंचाते हैं उनके प्रवक्ता और सोशल मीडिया योद्धा। इस हफ्ते संदेश एक ही है : नकारात्मकता मत फैलाओ। मुझ तक यह संदेश पहुंचाने वाले इतने हैं आजकल कि सोशल मीडिया से मुझे डर-सा लगने लगा है। रोज सुनने को मिलती हैं गालियां। रोज सुनने को मिलते हैं आरोप देशद्रोही और गिद्ध पत्रकार होने के, सो मैंने इस लेख को लिखने से पहले बहुत कोशिश की कोई अच्छी खबर आप तक पहुंचाने की। अफसोस कि ऐसा कर नहीं पाई, बावजूद इसके कि मैंने वे सारी बातें पढ़ीं, जो प्रधानमंत्री के मंत्रियों ने कहीं उनकी शान में।

कई मंत्री सामने आए यह कहने कि प्रधानमंत्री दिन-रात काम कर रहे हैं इन दिनों और रोज समीक्षा कर रहे हैं आक्सीजन के अभाव, उपलब्धता और टीकाकरण के रफ्तार की। उनके स्वास्थ्य और सूचना मंत्रियों ने यहां तक कहा पिछले सप्ताह कि दुनिया में इतनी तेजी से टीके लगाने का काम नहीं हुआ है, जितना भारत में हो रहा है। स्वास्थ्य मंत्री ने बड़े-बड़े आंकड़े पेश किए साबित करने के लिए कि जितनी जल्दी हम टीका लगा रहे हैं अपने लोगों को, उतनी जल्दी तो अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी नहीं हुआ है। जब सोनिया गांधी के इशारे पर विपक्ष के कई राजनेताओं ने अपने दस्तखत किए एक ऐसी चिट्ठी पर, जिसमें नरेंद्र मोदी को सुझाव दिए गए हैं हमारे कोरोना संकट का समाधान निकालने के, तो मोदी के प्रशंसक और भी भड़क गए। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कांग्रेस अध्यक्षा पर आरोप लगाया मायूसी फैलाने का।

उनकी इस बात को सुन कर मैंने और भी मेहनत की कुछ अच्छी बातें ढूंढ़ कर इस लेख द्वारा आप तक पहुंचाने की, लेकिन नाकाम रही। बहुत कोशिश की अपने मन से गंगाजी में उन बहती हुई लाशों की तस्वीरें मिटाने की, लेकिन कर नहीं पाई। बहुत कोशिश की मैंने आक्सीजन न होने के कारण अस्पतालों के अंदर उन लोगों की मौतों को याद न करने की, लेकिन नाकाम रही। इसलिए बेशक मुझे गिद्ध पत्रकार कहा जाए, मैंने फैसला किया है सच बोलने का, चाहे वह सच कड़वा हो।

सच यह है कि संकट की इस घड़ी में जो झूठ फैला रहे हैं देशभक्ति के नाम पर, असली देशद्रोही वही हैं। सच यह है कि अब महामारी फैल रही है डरावने रफ्तार से देहातों में, जहां न कभी आधुनिक स्वास्थ्य सेवाएं थीं और न अब हैं। मैं जब भी ग्रामीण भारत के दौरे करती हूं, हमेशा दो चीजों पर ध्यान देती हूं किसी गांव में दाखिल होने के बाद। एक, वहां के स्वास्थ्य केंद्र को देखना और दूसरा, वहां के स्कूल को। अस्पताल तो होते नहीं हैं गांवों में, लेकिन स्वास्थ्य केंद्र हैं, तो सिर्फ नाम के वास्ते। अक्सर इनमें डॉक्टर नहीं होते हैं, अक्सर इनमें न इलाज होता है और न दवाएं मिलती हैं। सो, दशकों से ग्रामीण भारत में रहने वाले लोग ‘प्राइवेट’ में इलाज कराने पर मजबूर रहे हैं।

आज भी ऐसा कर रहे हैं। आपने भी उत्तर प्रदेश से देखी होंगी वे तस्वीरें, जिनमें कोरोना के मरीज पेड़ों के नीचे लेटे हैं गांव के किसी नीम-हकीम के कहने पर ग्लूकोज लेते हुए या कोई ऐसी दवा लेते हुए जिससे इस बीमारी को हराने की कोई संभावना नहीं है। बेहाल इलाज से अगर उनकी मौत हो जाती है, तो जल्दबाजी में उनके परिजन उनके अंतिम संस्कार करते हैं बिना यह जाने कि उनकी मौत किस वजह से हुई। उत्तर प्रदेश में तो कई श्मशानों को आदेश दिए गए हैं कि मौत का कारण सिर्फ बीमारी लिखा जाए। उत्तर प्रदेश के अस्पतालों का हाल यह है कि पिछले हफ्ते कोई पंद्रह सरकारी डॉक्टरों ने काम पर आना बंद ही कर दिया, यह कह कर कि उनको सरकारी अधिकारी रोज धमका रहे हैं किसी न किसी वजह से। कहने का मतलब यह है कि न ग्रामीण उत्तर प्रदेश में इस बीमारी का इलाज हो सकता है और न ग्रामीण बिहार में, इसलिए कि इन दोनों राज्यों में स्वास्थ्य सेवाएं न के बराबर रही हैं दशकों से।

इसके बावजूद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कहते हैं जब भी किसी पत्रकार से उनकी भेंट होती है कि उनके प्रदेश में न आक्सीजन की कमी है, न दवा की और न ही अस्पतालों में बेड की। योगी आदित्यनाथ अपने आप को संन्यासी मानते हैं, सो उनको इस तरह झूठ बोलना शोभा नहीं देता। लेकिन करें भी क्या, जब ऊपर से आदेश आया है ‘नेगेटिविटी’ न फैलाने का? इसी कोशिश में लगे रहे हैं मोदी के तमाम साथी और प्रशंसक। लेकिन ऐसा करके वे सिर्फ हकीकत को अनदेखा कर रहे हैं। यथार्थ यह है कि इस महामारी को रोकने का एक ही तरीका है और वह है टीकाकरण। जितनी जल्दी हम अपने अधिकतर लोगों को टीके देंगे उतनी जल्दी हम इस संक्रमण से छुटकारा पा सकेंगे। समस्या यह है कि ऐसा करने के लिए हमको जरूरत है अगले दो-तीन महीनों में तीस करोड़ टीकों की। कहां से आएंगे ये टीके? अभी तक न केंद्र सरकार तय कर पाई है और न राज्य सरकारें।

प्रधानमंत्री ने कोरोना के पहले दौर में सारा श्रेय लिया था आसानी से इस महामारी को हराने का, लेकिन जब उन्होंने देखा कि इस बार विजयी होना इतना आसान नहीं होगा, तो फौरन राज्य सरकारों को कह दिया कि टीकाकरण अब उनकी जिम्मेवारी है। अचानक राज्य सरकारों को यह जिम्मेदारी देकर खुद तो बच गए हैं प्रधानमंत्री, लेकिन देश को कौन बचाएगा और कैसे? कौन हैं उनके आसपास, जिनको देश की परवाह ज्यादा और उनकी छवि की कम है? उनकी सख्त जरूरत है।

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