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यह जो बात निकली है …

अभी से बातें होने लगी हैं ताजमहल और कुतुब मीनार की और सुनने में आने लगी हैं बातें मध्यप्रदेश के महाकाल मंदिर और कर्नाटक के किसी जामिया मस्जिद की। यह मुहिम बहुत बड़े पैमाने पर अगर चलती रही, तो यकीन कीजिए कि हम उस संपन्न भारत का सपना, जो प्रधानमंत्री ने हमको दिखाया था, पूरी तरह भूलने पर मजबूर हो जाएंगे और उलझे रहेंगे इस पूरी सदी इतिहास के घावों को भरने में।

Gyanvapi Mosque| Kashi| varanasi|
ज्ञानवापी मस्जिद (फोटो सोर्स: PTI)

जैसे हर शाम होता है आजकल, किसी हिंदी समाचार चैनल पर चर्चा चल रही थी मंदिर-मस्जिद की समस्याओं की। भारतीय जनता पार्टी की प्रवक्ता एक महिला थी इस बहस में और खूब जोश से साबित करने की कोशिश कर रही थी कि मुसलमान हमलावर जब भारत आए, तो उनका मकसद था प्राचीन भारतीय संस्कृति को पूरी तरह मिटा देना।

फिर उसने बिना सोचे-समझे अल्लामा इकबाल के शब्दों में कहा- ‘कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।’ क्या देवीजी जानती हैं कि एक तरह से उन्होंने अपने ही पक्ष का गलती से विरोध किया?

इकबाल के ये शब्द उस शेर से हैं, जो वैसे तो ‘सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा’ का हिस्सा है, लेकिन भुला दिए गए हैं गाने में। पूरा शेर है, ‘कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-जमां हमारा।’

माना कि ऐसा कहने के बाद इकबाल साहब ने पाकिस्तान बनाने में अपना पूरा जोर लगा दिया था, लेकिन भारतीय जनता पार्टी की इस महिला प्रवक्ता को शायद मालूम नहीं था कि इस शेर में छिपा हुआ है सबूत कि मुसलमान हमलावर भारत को लूट कर कहीं और नहीं चले गए थे अंग्रेजों के जैसे।

वे इस देश के हो गए थे, इस हद तक कि उनकी जबान भारतीय भाषाओं का हिस्सा बन गई और उनका रहन-सहन, सोच-समझ, उनका इतिहास भारत के इतिहास में शामिल हो गया था। अंग्रेज आए और भारत को लूट कर चले गए।

मुसलमानों ने ऐसा नहीं किया था, लेकिन इस सबसे महत्त्वपूर्ण बात को भूल गए हैं वे राजनेता, कट्टरपंथी हिंदू और कुछ सिरफिरे लोग, जिनका अस्तित्व कायम है नफरत पर। पिछले सप्ताह संघ परिवार के सरदार, मोहन भागवत, ने एक बयान देकर साबित किया कि जो लोग लगे हुए हैं मस्जिदों को तोड़ कर मंदिर बनवाने में, उनको संघ परिवार का पूरा समर्थन है। इस बयान में उन्होंने कहा कि समय आ गया है इतिहास को कुरेद कर सत्य को पहचानने का।

सो, अगर आप उनमें से हैं, जो तय कर चुके हैं कि ज्ञानवापी मस्जिद को हासिल करने के बाद रुख फौरन नहीं किया जाएगा मथुरा की तरफ, तो आप गलती कर रहे हैं। काशी के बाद बारी जरूर आएगी कृष्ण जन्मभूमि की और उसके बाद हो सकता है कि जो राजनेता कहते हैं अभी से, उनकी सूची में हैं छत्तीस हजार मंदिर, जो औरंगजेब ने तुड़वाए थे।

अभी से बातें होने लगी हैं ताजमहल और कुतुब मीनार की और सुनने में आने लगी हैं बातें मध्यप्रदेश के महाकाल मंदिर की और कर्नाटक के किसी जामिया मस्जिद की। यह मुहिम बहुत बड़े पैमाने पर अगर चलती रही, तो यकीन कीजिए कि हम उस संपन्न भारत का सपना, जो प्रधानमंत्री ने हमको दिखाया था, पूरी तरह भूलने पर मजबूर हो जाएंगे और उलझे रहेंगे इस पूरी सदी इतिहास के घावों को भरने में।

परिणाम यह भी होगा कि भारत के बीस करोड़ मुसलमान अपने आप को लावारिस समझने लग जाएंगे, क्योंकि इस पूरी मुहिम का असली मकसद लग रहा है मुसलमानों को दिखाना कि इस ‘न्यू इंडिया’ में उनकी जगह हिंदुओं से कम होने वाली है।

क्या चुप करके इस बात को बर्दाश्त कर लेंगे? क्या इतना डर गए हैं अब कि दंगों का होना भी मुश्किल हो गया है? ऐसा बिल्कुल नहीं है। जहां तक मेरी जानकारी है, और कुछ जानकारी बनारस के महंतों से भी है, मुसलमानों में आक्रोश दिखने लगा है इतना कि कभी भी बेकाबू हो सकता है।

माना कि कुछ गलतियां मुसलिम समाज भी कर चुका है। मेरी नजर में मुसलिम लड़कियों का हिजाब पहन कर स्कूल जाना गलत है और कर्नाटक में जिन लड़कियों ने अभियान शुरू किया था उनके बारे में साबित हो चुका है कि वे पापुलर फ्रंट आफ इंडिया नाम की एक जिहादी संस्था के हाथों में प्यादा थीं।

मैंने जब अपने एक पढ़े-लिखे, तहजीबदार मुसलिम दोस्त से पूछा हिजाब की इस मांग के बारे में तो उसने कहा, ‘बेमतलब है यह हिजाब का सारा मामला, लेकिन मुसलिम लोग इसको उठा रहे हैं, क्योंकि उनको ऐसा लग रहा है कि उनका अस्तित्व पूरी तरह से मिटाया जा रहा है भारत में।

शहरों के नाम बदले जा रहे हैं, सड़कों के नाम बदले जा रहे हैं, उर्दू को एक विदेशी भाषा साबित करने की कोशिश हो रही है और फिर ऊपर से भारतीय जनता पार्टी के बड़े-बड़े नेता मुसलमानों को देश के गद्दार कहने में लगे हुए हैं, तो आक्रोश बढ़ता जा रहा है।’

दूसरी तरफ मेरी जानकारी के कई हिंदू हैं, जो मुसलमानों से इतनी नफरत दिखाने लगे हैं इन दिनों कि मैं हैरान रह जाती हूं उनकी बातें सुन कर। मैं उन लोगों की बातें नहीं कर रही हूं, जो अपने प्रिय प्रधानमंत्री की तरह संघ परिवार के साए में बड़े हुए हैं। मैं उनकी बात कर रही हूं, जो खान मार्केट गैंग में गिने जाते थे कभी और जिनकी मातृभाषा अंग्रेजी है।

कुछ तो दिखते हैं हर शाम अंग्रेजी समाचार चैनलों पर मुसलमानों के खिलाफ नफरत उगलते हुए, लेकिन इनके अलावा और भी हैं, जो दिल्ली के आलीशान ड्राइंगरूमों में स्काच विस्की और फ्रेंच वाइन पीते हुए कहने लगे हैं कि मुसलमान कभी भी देशभक्त नहीं हो सकते हैं, क्योंकि वे इस्लाम को भारत से ऊपर मानते हैं।

इस किस्म के लोगों के बीच मेरी सारी जिंदगी गुजरी है, लेकिन आज उनकी बातें सुन कर मेरे लिए मुश्किल हो गया याद करना कि ये कभी बिल्कुल अलग थे। ये कभी जानते थे कि जिस ‘हस्ती’ के न मिटने की बात इकबाल ने कही थी, उस हस्ती में मुसलमान भी शामिल हैं। आज जब इनकी बातें सुनती हूं मैं तो क्षितिज पर दिखने लगते हैं घने, काले बादल, जो धीरे-धीरे करीब आ रहे हैं बुरे दिनों का संकेत लेकर।

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